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Kota News

मानवीय मूल्यों का विकास

डॉ.अपर्णा पाण्डेय

मुख्य बिंदु
  • आज के आधुनिक समाज को आईना दिखाती यह कहानी बच्चों में दान, दया, करुणा, उदारता जैसे मानवीय मूल्यों का विकास कर एक अच्छा इंसान बनने की प्रेरणा देती है।
  • समाज को सोचना होगा बच्चों का भौतिक विकास ही पर्याप्त नहीं है वरन हमें उनमें मानवीय गुणों का भी विकास करना होगा।
  • पढ़िए कहानी..............
  • एक गांव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था, नाम था तुलसीराम।
  • उनके तीन बेटे थे सीताराम, राधेश्याम, रास बिहारी।
  • ब्राह्मण बहुत मेहनती और ईमानदार था।
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मानवीय मूल्यों का विकास

आज के आधुनिक समाज को आईना दिखाती यह कहानी बच्चों में दान, दया, करुणा, उदारता जैसे मानवीय मूल्यों का विकास कर एक अच्छा इंसान बनने की प्रेरणा देती है।

समाज को सोचना होगा बच्चों का भौतिक विकास ही पर्याप्त नहीं है वरन हमें उनमें मानवीय गुणों का भी विकास करना होगा। पढ़िए कहानी.............. एक गांव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था, नाम था तुलसीराम।

उनके तीन बेटे थे सीताराम, राधेश्याम, रास बिहारी। ब्राह्मण बहुत मेहनती और ईमानदार था।

दिनभर की मेहनत से जो कुछ मिल जाता था, उसी से उनके घर का ख़र्च चलता था। तीनों बेटे दिन भर इधर-उधर टाइम पास करते थे,पर कोई काम नहीं करते थे,इस बात से तुलसीराम बहुत दुःखी रहते थे।

एक बार उन्होंने अपने बेटों की परीक्षा लेने की बात सोची। उन्होंने बीमार होने का नाटक किया और तीनों को बुलाकर कहा- -आज तुम लोग घर के लिए कुछ कमाकर लाओ।

तीनों ने एक स्वर में कहा -जी ,पिताजी! और तीनों बेटे कुछ पैसे लेकर कमाने के लिए निकल गए।

बड़े बेटे ने अपने पास जमा पैसे से कुछ फल खरीदे, कि इन्हें बेच कर कुछ पैसे कमाऊंगा, पर शाम तक उसके फल नहीं बिके।

दूसरा लड़का मजदूरी की सोच कर गया, पर शाम तक उसको कोई काम नहीं मिला,जो पैसे घर से लेकर गया था ,उतने ही पैसे लेकर लौटा।

तीसरा लड़का बाजार की ओर जा रहा था , कि उसे रास्ते में कुछ संन्यासी जाते हुए दिखे, जो कई दिन से भूखे थे उसने सबको भोजन करवाया और ओढ़ने के लिए वस्त्र दिए। संन्यासियों ने उसे बहुत सारा आशीर्वाद दिया।

शाम को तीनों लड़के घर लौटकर आए और पिता को अपनी कमाई के बारे में बताया।बड़े बेटे ने बड़े दुःखी होकर बताया उसका एक भी फल नहीं बिका, जो पैसे लेकर गया था, वह और ख़र्च हो गए ।

दूसरे लड़के ने भी दुःखी होकर कहा -मैं शाम तक मजदूरी के लिए इंतजार करता रहा पर, मुझे कोई काम नहीं मिला।

तीसरे पुत्र से पिता ने पूछा- तुम क्या कमाकर लाए हो, उसने कहा मैं कुछ कमाकर तो नहीं लाया ,पर मुझे कुछ संन्यासी भूखे मिले, मेरे पास जो पैसे थे उनसे मैंने उन्हें भोजन करवाया और ओढ़ने के लिए वस्त्र ख़रीद दिए, जिंससे वे संन्यासी बहुत संतुष्ट हुए और उन्होंने मुझे बहुत सारा आशीर्वाद दिया।बस आज की मेरी यही कमाई है।

पिता ने गंभीरता से सबकी बात सुनी और बड़े पुत्र से कहा -बस मैं अपने पुत्रों को यही शिक्षा देना चाहता था । अगर तुम वाणी में मिठास और व्यवहार में सरलता लाओगे,तो तुम्हारे पत्थर भी बिक जाएंगे।पर अगर कठोरता से बात करोगे ,तो आते हुए ग्राहक भी लौट जाएंगे।

दूसरे पुत्र से कहा -अगर तुम ये सोचोगे कि कोई घर आकर तुम्हें काम देगा, तो तुम्हें कभी काम नहीं मिलेगा। काम ढूंढने के लिए मेहनत करनी होगी, ,तब काम मिलेगा।

तीसरे पुत्र से कहा -तुम पैसा तो बहुत कमा सकते हो, पर दान, दया, करुणा, उदारता जैसे मानवीय मूल्यों का संरक्षण कैसे कर सकते हो ,यह तुम्हारे व्यवहार से पता चलता है। यही मनुष्य होने की असली पहचान है।

वर्तमान समय में भी हमें यह सोचना है कि हम अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियरिंग, उद्योगपति , नेता, आई .ए .एस अफसर तो बना रहे हैं परंतु क्या अच्छा इंसान भी बना रहे हैं ? संवेदनशील मनुष्य बना रहे हैं?

भौतिकता के इस युग में मानवीय मूल्यों का संरक्षण और विकास वर्तमान समय की महती आवश्यकता है।