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मोर्चरी में अंधकार, फ़िर मोबाइल की रोशनी में हुआ 18 वर्षीय अर्जुन का नेत्रदान

दीपावली की पूर्व संध्या पर, एक घर के चिराग बुझने से दो घर में होगा उजाला

मुख्य बिंदु
  • दीपावली का पर्व, जब हर घर में खुशियों के दीप जल रहे थे, तब बूंदी के एक परिवार के घर का चिराग सड़क दुर्घटना में हमेशा के लिए बुझ गया।
  • महज 18 वर्ष की उम्र में अर्जुन धाकड़ इस दुनिया को अलविदा कह गया।
  • जिस उम्र में उसके सपनों को नई उड़ान मिलनी थी, उस उम्र में एक सड़क दुर्घटना ने परिवार की खुशियां छीन लीं।
  • लेकिन इस असहनीय दुख और पीड़ा के बीच अर्जुन के पिता रामराज नागर ने ऐसा निर्णय लिया, जिसने उनके बेटे की विदाई को मानवता की एक अविस्मरणीय मिसाल बना दिया।
  • अपने जवान बेटे को खोने के बावजूद परिवार ने उसके नेत्रदान की सहमति दी, ताकि उसकी आंखों से किसी दृष्टिहीन व्यक्ति की दुनिया रोशन हो सके।
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मोर्चरी में अंधकार, फ़िर मोबाइल की रोशनी में हुआ 18 वर्षीय अर्जुन का नेत्रदान

बूंदी। दीपावली का पर्व, जब हर घर में खुशियों के दीप जल रहे थे, तब बूंदी के एक परिवार के घर का चिराग सड़क दुर्घटना में हमेशा के लिए बुझ गया। महज 18 वर्ष की उम्र में अर्जुन धाकड़ इस दुनिया को अलविदा कह गया। जिस उम्र में उसके सपनों को नई उड़ान मिलनी थी, उस उम्र में एक सड़क दुर्घटना ने परिवार की खुशियां छीन लीं।

लेकिन इस असहनीय दुख और पीड़ा के बीच अर्जुन के पिता रामराज नागर ने ऐसा निर्णय लिया, जिसने उनके बेटे की विदाई को मानवता की एक अविस्मरणीय मिसाल बना दिया। अपने जवान बेटे को खोने के बावजूद परिवार ने उसके नेत्रदान की सहमति दी, ताकि उसकी आंखों से किसी दृष्टिहीन व्यक्ति की दुनिया रोशन हो सके।

पिता रामराज,करीबी रिश्तेदार सुरेश व श्याम नागर से नेत्रदान के लिये सहमति मिलने के बाद, संस्था शाइन इंडिया के ज्योति मित्र राजेश खोईवाल और इदरिस बोहरा की सूचना पर, देर रात 1:00 बजे कोटा से डॉ कुलवंत गौड़ और उनके सहयोगी मार्कण्डेय दाधीच के नेतृत्व में जिला अस्पताल बूंदी की मोर्चरी में नेत्रदान का कार्य संपन्न हुआ।

*अंधेरी,धूल भरी,गन्दी और बंद लाइट की मोर्चरी में, मोबाइल टॉर्च की रोशनी में हुआ नेत्रदान* इस नेत्रदान की कहानी जितनी प्रेरणादायक है, उतनी ही बूंदी जिला चिकित्सालय की मोर्चरी की व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल भी खड़े करती है।

रात्रि करीब 1 बजे जब नेत्रदान के लिए शाइन इंडिया फाउंडेशन की टीम बूंदी जिला चिकित्सालय की मोर्चरी पहुंची, तो वहां की स्थिति बेहद निराशाजनक थी। मोर्चरी के कमरे में पर्याप्त लाइट की व्यवस्था नहीं थी। पूरे कमरे में धूल जमी हुई थी और साफ-सफाई की स्थिति भी संतोषजनक नहीं थी। आवश्यक रोशनी के अभाव में नेत्रदान की पूरी प्रक्रिया मोबाइल फोन की टॉर्च जलाकर संपन्न करनी पड़ी।

इस पुनीत कार्य में जिला चिकित्सालय के मेडिकल ज्यूरिस्ट डॉ. आशीष शर्मा एवं पुलिस चौकी स्टाफ के नवदीप मीणा का भी सराहनीय सहयोग रहा। अर्जुन के पिता रामराज नागर ने शहरवासियों को यह संदेश दिया कि,सच्चा प्रेम केवल अपने प्रियजन को अपने पास रखने में नहीं, बल्कि उसके जाने के बाद भी उसके माध्यम से किसी दूसरे को जीवन की खुशियां देने में है।

शाइन इंडिया के डॉ कुलवंत गौड़ ने कहा कि जिस स्थान पर किसी परिवार को अपने दिवंगत परिजन के अंतिम दर्शन करने होते हैं, जिस जगह शोकाकुल परिजन अपने प्रियजन के पार्थिव शरीर को कुछ समय के लिए रखते हैं, उस स्थान की ऐसी बदहाल स्थिति आखिर क्यों है?

मोर्चरी जैसे संवेदनशील स्थान पर पर्याप्त लाइट, नियमित सफाई, धूल-मुक्त वातावरण और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध करवाना क्या अस्पताल प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी नहीं है?

किसी परिवार के लिए अपने प्रियजन को खोना ही सबसे बड़ी पीड़ा होती है। ऐसे में उन्हें गंदगी, धूल और अंधेरे से भरे कमरे में अपने दिवंगत परिजन के पार्थिव शरीर को रखने की मजबूरी क्यों झेलनी पड़े ?