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माँ चंद्रघंटा सेवा, करुणा और वात्सल्य की देवी: प्रशांत अग्रवाल

राजा सुरथ और वैश्य समाधि की कथा ने दिया मोह से मुक्ति, करणी माता की गाथा ने जगाया जीवों के प्रति सम्मान का भाव

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माँ चंद्रघंटा सेवा, करुणा और वात्सल्य की देवी: प्रशांत अग्रवाल

उदयपुर। नारायण सेवा संस्थान के सेवातीर्थ स्थित वर्ल्ड ऑफ ह्यूमैनिटी में आयोजित श्रीमद् देवी भागवत कथा एवं ‘अपनों से अपनी बात’ कार्यक्रम के तीसरे दिन संस्थान अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने माँ चंद्रघंटा की आराधना के साथ प्रेरक कथाओं का भावपूर्ण वर्णन किया।

उन्होंने माँ चंद्रघंटा के स्वरूप को सेवा, करुणा और वात्सल्य की प्रेरणा बताते हुए राजा सुरथ एवं वैश्य समाधि की कथा और करणी माता की महिमा के माध्यम से श्रद्धालुओं को मानवीय संवेदनाओं का संदेश दिया।अग्रवाल ने कथा का रसास्वादन कराते हुए बताया कि राज्य खो चुके राजा सुरथ और अपने ही परिवार द्वारा त्याग दिए गए वैश्य समाधि के मन में अपनों के प्रति मोह बना हुआ था।

महर्षि मेधा ने उन्हें महामाया की शक्ति का महत्व समझाया। उन्होंने बताया कि मनुष्य का मन कई बार उन लोगों के प्रति भी आसक्त रहता है, जिनसे उसे दुख मिलता है।

माँ की आराधना से राजा सुरथ को अपना राज्य पुनः प्राप्त करने और वैश्य समाधि को मोह से मुक्ति का वरदान मिला।

मन की व्यथा को स्वीकार कर ईश्वर के चरणों में समर्पित करने से शांति का मार्ग प्रशस्त होता है।उन्होंने राजस्थान के देशनोक स्थित करणी माता मंदिर की मान्यता का भी वर्णन किया।

अपने प्रिय भांजे लक्ष्मण की मृत्यु से व्यथित करणी माता ने यमराज से अपने कुल के लोगों की रक्षा का वचन लिया। इसी मान्यता के चलते मंदिर में चूहों को ‘काबा’ कहकर सम्मान दिया जाता है।

इस प्रसंग के माध्यम से बताया गया कि प्रेम और वात्सल्य रिश्तों की सीमाओं से परे होते हैं।

सच्चा मातृत्व वही है, जिसमें दूसरे के बच्चे को भी अपना मानकर उसके सुख-दुख की जिम्मेदारी निभाई जाए।अग्रवाल ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे पूजा-अर्चना के साथ जरूरतमंदों की सेवा को भी अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएँ।

बेसहारा वृद्धों को सहारा देने, अनाथ एवं दिव्यांग बच्चों की मदद करने तथा उनकी शिक्षा, उपचार और कृत्रिम अंगों की व्यवस्था में सहयोग करने की प्रेरणा दी गई।

कार्यक्रम में सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भाग लेकर देवी भागवत कथा का श्रवण किया।