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Literature News

पापा, मुझसे न हो पाएगा… से डॉ. तक

डॉ. विकास कुमार उज्जैनिया

मुख्य बिंदु
  • दो हज़ार पंद्रह का वह साल था, आँखों में सपने, दिल में सवाल था।
  • स्नातक की पहली परीक्षा ने रुलाया, एक विषय के कम अंकों ने हौसला गिराया।
  • पापा को फ़ोन किया, रोते हुए बताया— “पापा, मुझसे न हो पाएगा, मैं सब छोड़कर घर लौट आऊँगा।
  • लोग मेरा मज़ाक उड़ाते हैं, आपके नाम से मुझे चिढ़ाते हैं।
  • ” पापा ने कहा, “बेटा, हार मत मानना, मुश्किल हो राह, फिर भी रुक मत जाना।
  • आज आँसू हैं, कल मुस्कान होगी, तेरी मेहनत ही तेरी पहचान होगी।
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दो हज़ार पंद्रह का वह साल था, आँखों में सपने, दिल में सवाल था।

स्नातक की पहली परीक्षा ने रुलाया, एक विषय के कम अंकों ने हौसला गिराया।

पापा को फ़ोन किया, रोते हुए बताया— “पापा, मुझसे न हो पाएगा, मैं सब छोड़कर घर लौट आऊँगा।

लोग मेरा मज़ाक उड़ाते हैं, आपके नाम से मुझे चिढ़ाते हैं।”

पापा ने कहा, “बेटा, हार मत मानना, मुश्किल हो राह, फिर भी रुक मत जाना।

आज आँसू हैं, कल मुस्कान होगी, तेरी मेहनत ही तेरी पहचान होगी।”

पापा के शब्दों ने हौसला जगाया, गिरते हुए मन ने फिर सिर उठाया।

स्नातक किया, फिर परास्नातक की राह, हर मुश्किल से सीखा, हर ठोकर से चाह।

फिर एक सपना दिल में समाया, जिस संस्थान ने पापा को डॉक्टर बनाया, उसी आईसीएआर–सीआईएफई, मुंबई की धरती पर, अपना भी नाम लिखने का संकल्प उठाया।

राह में क्षेत्रीयता, उपेक्षा के ताने मिले, हर मोड़ पर मुश्किलों के नए बहाने मिले।

जिसे कभी कहा गया था पराया और बाहरी, वही बना विद्यार्थी संघ का अध्यक्ष एक दिन, मेहनत से लिख दी अपनी पहचान सुनहरी।

आँसू सीढ़ी बने, ठोकरें हथियार, पापा की सीख बनी मेरी पतवार।

वर्षों का संघर्ष आखिर रंग लाया, पीएच.डी. का सपना हक़ीक़त बन आया।

जिस बेटे ने रोकर कभी कहा था— “पापा, मुझसे न हो पाएगा…” आज वही गर्व से कहता है— “पापा, देखिए… आपका बेटा कर दिखाएगा!”

डॉ. विकास कुमार उज्जैनिया— यह नाम केवल मेरी जीत नहीं, इसमें पापा का विश्वास है, माँ की दुआओं का आशीर्वाद है।

पापा, आपने जो सपना दिखाया, आपके विश्वास ने उसे सच बनाया।

आज नाम के आगे लगा “डॉ.” तो दिल ने बस इतना दोहराया— गिरा, सँभला, चलता गया, हर मुश्किल से लड़ता गया।

“पापा, मुझसे न हो पाएगा” से “डॉ. विकास कुमार उज्जैनिया” बन गया!