साइकिल की दुकान में काम करने वाले श्यामू की उम्र अब लगभग अस्सी वर्ष की हो चुकी थी। शरीर जवाब देने लगा था, हाथों में पहले जैसी ताकत नहीं रही थी, आँखों की रोशनी भी कमजोर पड़ गई थी, लेकिन काम के प्रति उसका जुनून आज भी वैसा ही था।
सुबह दुकान में वह झाड़ू लगाता, साइकिलों की सफाई करता और दिनभर ग्राहकों की साइकिलें ठीक करने में लगा रहता। उम्र उसके शरीर पर भले ही भारी पड़ रही थी, लेकिन उसे अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटना मंजूर नहीं था।
राकेश अक्सर उसे समझाता— “श्यामू, अब आराम कर लिया कर। उम्र हो गई है।”
श्यामू मुस्कुराकर कहता “जब तक हाथ-पैर चल रहे हैं, किसी के भरोसे क्यों बैठूँ?”
एक दिन काम करते-करते अचानक श्यामू को चक्कर आया और वह दुकान में ही गिर पड़ा।
राकेश घबरा गया। उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया।
पाँच दिन बाद अस्पताल से छुट्टी मिली तो राकेश उसे अपने घर ले आया। डॉक्टर ने आराम करने की सलाह दी थी, लेकिन एक सप्ताह भी पूरा नहीं हुआ था कि श्यामू फिर दुकान जाने की जिद करने लगा।
“राकेश, मुझे दुकान पर जाना है।” “नहीं श्यामू, अभी तुम्हें आराम की जरूरत है।”
“नहीं... मैं ठीक हूँ। मुझे दुकान पर ले चल।”
आखिर श्यामू की जिद के आगे राकेश को हार माननी पड़ी।
एक सप्ताह बाद श्यामू लड़खड़ाते कदमों से दुकान पर पहुँचा।
उसने दुकान में कदम रखा ही था कि मोहित की कड़क आवाज सुनाई दी “अब तुम्हारी इस दुकान पर कोई जरूरत नहीं है। अब तुम जा सकते हो।”
श्यामू कुछ पल उसे देखता रहा।
“मुझे नौकरी से मत निकालिए साहब।” मोहित ने गुस्से में कहा— “तुझे समझ में क्यों नहीं आता? मैंने कहा अब तुझे यहाँ आने की जरूरत नहीं है।”
श्यामू की आँखें भर आईं। “बेटा... ऐसा मत करो। तुम मेरे बेटे हो। मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकता।”
मोहित ने बेरुखी से कहा “बेटा नहीं... साहब कहो।”
श्यामू का दिल जैसे वहीं टूट गया। काँपती आवाज में बोला— “बेटा, अगर तुम केवल मेरे साहब होते तो नौकरी छोड़ना मेरे लिए आसान होता... लेकिन तुम तो मेरा खून हो। मेरे बेटे हो। मैं तुम्हें कैसे छोड़ दूँ?”
मोहित ने मुँह फेर लिया। “बस बहुत हुआ! अब मुझे कुछ भी नहीं सुनना। अस्सी साल की उम्र में तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है। चले जाओ यहाँ से।”
श्यामू की आँखों से आँसू बहने लगे। वह अपनी काँपती टाँगों पर किसी तरह खड़ा हुआ और धीरे-धीरे दुकान से बाहर निकलने लगा।
दुकान के बाहर राकेश खड़ा था। उसने सब कुछ अपनी आँखों से देख लिया था।
वह दौड़कर श्यामू के पास पहुँचा और उसे गले लगा लिया।
“श्यामू... मेरे साथ घर चल।” श्यामू ने आँसू पोंछते हुए सिर हिला दिया। “नहीं राकेश... मैं तुम्हारे घर नहीं चलूँगा।”
“क्यों?” श्यामू ने दुकान की ओर देखते हुए कहा “जब मेरा अपना बेटा ही मुझे नहीं समझ पा रहा... तो मेरे लिए अब कुछ भी शेष नहीं है।”
राकेश की आँखें भी नम हो गईं। उसने श्यामू का हाथ थाम लिया। “श्यामू, तू मेरा जिगरी यार है। मैं तुझे ऐसे नहीं छोड़ सकता। चल... मेरे साथ मेरे घर।”
दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे। श्यामू ने राकेश को कसकर गले लगाया और टूटती हुई आवाज में कहा “राकेश... अब मेरा घर तुम्हारा घर नहीं... वृद्धाश्रम है।”
डॉ.प्रेरणा गौड़ लेखिका
