पूर्व के दशकों में भारतीय परिवारों में बहुओं को लेकर एक गहरी, हद दर्जे की असुरक्षा व्याप्त थी। शादी होते ही थोड़े दिनों में घर में एक अजीब-सी खामोशी और सतर्कता छा जाती थी। सास, ननद, यहाँ तक कि बड़े-बुजुर्ग सबके मन में एक ही भय घूमता रहता था—“बहू बेटे को छीन लेगी” और “बहू घर तोड़ देगी।” यह सिर्फ व्यक्तिगत स्वभाव नहीं था। यह उस समय की सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक संरचना का सीधा परिणाम था।
क्यों इतनी गहरी असुरक्षा थी? सबसे बड़ा कारण था संयुक्त परिवार व्यवस्था और बेटे पर टिकी आर्थिक-भावनात्मक निर्भरता।
उस दौर में अधिकांश परिवार संयुक्त रहते थे। बेटा परिवार का मुख्य कमाने वाला और बुढ़ापे का सहारा माना जाता था।
माँ का पूरा अस्तित्व, उसकी पहचान और सुरक्षा उसके बेटे से जुड़ी होती थी। जब कोई नई लड़की घर में आती, तो वह सिर्फ बहू नहीं, बल्कि एक “प्रतिद्वंद्वी” लगती थी—जो बेटे का समय, स्नेह और फैसले अपने पास खींच सकती थी।
यह डर वास्तविक था क्योंकि महिलाओं के पास खुद के आर्थिक संसाधन बहुत कम थे। विधवा होने या बेटे के अलग हो जाने का मतलब अक्सर आर्थिक संकट और सामाजिक असुरक्षा होता था।
दूसरा बड़ा कारण था कल्चरल कंडीशनिंग। पीढ़ी-दर-पीढ़ी यही सिखाया जाता था कि “बहू घर तोड़ती है।” लोककथाओं, फिल्मों, टीवी धारावाहिकों और घर की बातचीत में सास-बहू का रिश्ता हमेशा संघर्षपूर्ण दिखाया जाता था।
लड़कियों को छोटी उम्र से ही यह संदेश मिलता था कि ससुराल में उन्हें “अपना स्थान बनाना” होगा जबकि सास को उनके समय की सास पूरी तरह नियंत्रण में रखती थी।
उन सासों को कभी भी मनमर्ज़ी करने नहीं दी जाती थी। जैसे ही वो सास बनतीं वो भी उसी तरह का व्यवहार शुरू कर देती थीं ।
इस पूरे माहौल में विश्वास की जगह संदेह और प्यार की जगह भय और नियंत्रण ने ले ली थी।
तीसरा कारण था सही शिक्षा और अनुभव की कमी। 70-90 के दशक में अधिकांश महिलाओं का संसार घर की चारदीवारी तक सिमटा रहता था। बाहरी दुनिया, व्यक्तिगत स्वतंत्रता या समानता की अवधारणाएँ बहुत कम पहुँचती थीं। ऐसे में “नियंत्रण” ही सुरक्षा का एकमात्र तरीका लगने लगा। सास अक्सर वही करतीं जो उनके साथ हुआ था—वे भी कभी बहू थीं और उसी असुरक्षा का शिकार हुई थीं। यह एक दुष्चक्र था।
नई जनरेशन की सासें क्यों बदलीं 2015 के आसपास भारतीय समाज में एक स्पष्ट बदलाव दिखाई देने लगा। जो लड़कियाँ 80 के दशक के अंत और 90 के दशक में बड़ी हुईं, वे अब खुद सास बनने लगीं। ये नई सासें पुरानी पीढ़ी से कई मायनों में अलग थीं।
उन्होंने शिक्षा, नौकरी और आर्थिक स्वतंत्रता का अनुभव किया था। कई ने खुद काम किया, खुद फैसले लिए और पति के साथ समान साझेदारी का महत्व समझा। वे जानती थीं कि बेटा “छीना” नहीं जाता—वह अपना जीवन साथी चुनता है। वे यह भी समझती थीं कि घर “तोड़ने” वाली बहू नहीं होती, बल्कि असुरक्षा, अविश्वास और नियंत्रण की मानसिकता घर तोड़ती है।
सोशल मीडिया, बढ़ती जागरूकता और एकल परिवारों की बढ़ती संख्या ने भी सोच बदली। अब बहुएँ सिर्फ “घर की बहू” नहीं रहीं—वे प्रोफेशनल, माँ, साथी और स्वतंत्र व्यक्ति भी हैं। नई सासें अक्सर खुद को “दोस्त” या “मार्गदर्शक” के रूप में देखना पसंद करती हैं, न कि नियंत्रणकर्ता के रूप में। वे जानती हैं कि अगर बहू खुश और सुरक्षित महसूस करेगी, तो पूरा परिवार मजबूत रहेगा।
असल में क्या बदला बदलाव सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, संरचनात्मक है। जब महिलाएँ आर्थिक रूप से सक्षम होती हैं, जब परिवार संयुक्त से एकल की ओर बढ़ते हैं, जब बेटे और बहू दोनों की समान जिम्मेदारी स्वीकार की जाती है—तब असुरक्षा कम होती है।
पुरानी पीढ़ी की सासें गलत नहीं थीं; वे उस समय की परिस्थितियों की उपज थीं। नई पीढ़ी की सासें भी सिर्फ़ इसीलिए सही नहीं हैं कि वे “आधुनिक” हैं—वे इसलिए अलग हैं क्योंकि उन्होंने अलग अनुभव जिया है।
आज भी कई घरों में पुरानी मानसिकता बाकी है। लेकिन दिशा साफ है—जहाँ पहले “बहू घर तोड़ेगी” का डर था, वहाँ अब कई परिवार यह समझने लगे हैं कि घर तभी टूटता है जब उसमें विश्वास की जगह नहीं बचती।
अंत में यही कहा जा सकता है कि सास-बहू का रिश्ता कभी भी आसान नहीं रहा, लेकिन अब कम से कम हम यह समझने लगे हैं कि असुरक्षा से ज्यादा खतरनाक कोई चीज नहीं होती।
जब माँ बेटे को “अपना” समझने की जगह उसे एक वयस्क व्यक्ति मानने लगती है, और बहू को “प्रतिद्वंद्वी” की जगह परिवार का हिस्सा मानने लगती है—तब घर सचमुच मजबूत होता है।
यहाँ मैं एक बात और कहना चाहूँगी कि पतियों को बैलेंस रखना बहुत ज़रूरी है । आपस की बातों को सार्वजनिक करना और रिश्तेदारों या दोस्तों का हद से ज़्यादा घर के मामलों में दख़ल देना भी पुरानी पीढ़ी की बहुत बड़ी गलती रही है।
पति पत्नी की आपसी लड़ाई में किसी भी बाहरी व्यक्ति को दखल नहीं देना चाहिए। आपसी समझ बातचीत से आती है।
एक पूर्वाग्रह और भी था की औरतों की अक्ल घुटने में होती है जिसकी वजह से कई परिवार अपने घर की औरतों की इज्जत नहीं करते थे । यही मानसिकता घर के अन्य सदस्यों की भी होती थी।
आज मैं स्वयं एक सास हूँ और मुझे कहते हुए बहुत अच्छा लगता है कि मेरे घर एक बेटी आई है जिसको मैं अपने बेटे से ज़्यादा प्यार करती हूँ । इसमें उसका व्यवहार बहुत महत्वपूर्ण है और मेरा उस पर भरोसा। बेटे ने कभी फालतू शिकायतें नहीं की और कभी उसके सम्मान में कमी नहीं आने दी। अगर परिवार में प्यार बनाये रखना है तो सबको इज़्ज़त दो और बहू को घर का सदस्य बनाओ ना कि बाहर से आई कोई एलियन समझो जो आप के घर पर क़ब्ज़ा करने आई है ।
ऋतू सोढ़ी