आतिशबाजी को हम चाहे जितना खुशी, उत्साह और उल्लास का प्रतीक मानते रहें, लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही गंभीर और विचारणीय है।
जिस शोर और धमाके को हम प्रसन्नता का सार्वजनिक प्रदर्शन समझते हैं, वही किसी दूसरे के लिए भय, पीड़ा, असुविधा और मानसिक तनाव का कारण बन सकता है।
सवाल यह है कि क्या हमारी खुशी का उत्सव दूसरों की शांति छीनकर ही पूरा हो सकता है? क्या किसी पर्व की सार्थकता इस बात से तय होगी कि हमने कितने पटाखे फोड़े, कितने धमाके किए और कितनी देर तक पूरे परिवेश को शोर से भरकर रखा?
वास्तव में आतिशबाजी का यह उन्माद हमारी उत्सवधर्मिता के सामने एक गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है। त्योहारों का उद्देश्य जीवन में आनंद, आत्मीयता, सद्भाव और सकारात्मकता का संचार करना है, लेकिन जब इन्हीं अवसरों पर ध्वनि और वायु प्रदूषण, भय, दुर्घटनाओं तथा असहिष्णुता का वातावरण निर्मित होने लगे, तब हमें अपनी उत्सव मनाने की प्रवृत्तियों पर पुनर्विचार करना ही चाहिए।
खुशी का प्रदर्शन या विध्वंस का उत्सव? इन दिनों यत्र-तत्र-सर्वत्र आतिशबाजी का शोर सुनाई देता है। दीपावली का पर्व हो तो मानो पटाखे चलाना अनिवार्य रस्म बन गया है। विडंबना यह है कि यह सिलसिला एक-दो दिन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि कई दिनों तक चलता रहता है। शादी-ब्याह, जन्मोत्सव, राजनीतिक विजय, धार्मिक आयोजन, जुलूस और अन्य मांगलिक अवसर भी अब आतिशबाजी के धमाकों से अछूते नहीं रहे।
धीरे-धीरे ऐसी मानसिकता विकसित कर दी गई है मानो खुशी का इजहार करना हो तो पटाखे चलाना ही पड़ेगा। खुशी हो या न हो, उसका प्रदर्शन जरूर होना चाहिए। किसी को अपनी आर्थिक सम्पन्नता दिखानी हो, सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रदर्शन करना हो अथवा दूसरों से अलग और अधिक प्रभावशाली दिखाई देना हो, आतिशबाजी उसका सहज माध्यम बन गई है।
एक समय था जब बम, बारूद और धमाकों का संबंध युद्ध, विनाश और जनहानि से जोड़ा जाता था। तोपों के गोले, बमों के विस्फोट और बारूद के धुएँ विनाशकारी गतिविधियों के परिचायक थे। आज युद्ध के मैदान से बाहर भी हमने धमाकों को उत्सव का हिस्सा बना लिया है। यह विचारणीय है कि जिस ध्वनि और विस्फोट से युद्धभूमि में भय और विनाश का वातावरण बनता है, वही हमारे सामाजिक जीवन में प्रसन्नता का पर्याय कैसे बन गया?
दूसरों की शांति छीनकर कैसी प्रसन्नता? हम अक्सर अपनी खुशी के बारे में सोचते हैं, लेकिन यह विचार करना भूल जाते हैं कि हमारे उत्सव से दूसरे लोगों को कैसी अनुभूति हो रही है। घर में बीमार व्यक्ति हो, वृद्धजन हों, छोटे बच्चे हों, विद्यार्थी हों अथवा मानसिक तनाव से गुजर रहे लोग, तेज धमाके उनके लिए असहनीय हो सकते हैं। कई लोगों को अचानक होने वाले विस्फोटों से घबराहट, बेचौनी और नींद में व्यवधान का सामना करना पड़ता है।
पशु-पक्षियों की स्थिति तो और भी दयनीय होती है। मनुष्य कम-से-कम अपनी असुविधा व्यक्त कर सकता है, लेकिन पशु-पक्षी अपनी पीड़ा शब्दों में नहीं बता सकते। पटाखों के धमाकों से भयभीत होकर वे इधर-उधर भागते हैं। कई पक्षी अपने सुरक्षित आश्रय छोड़ने को विवश हो जाते हैं। पालतू पशुओं में घबराहट और असामान्य व्यवहार दिखाई देता है। बेजुबान जीवों की इस पीड़ा को अनदेखा करके मनुष्य अपनी खुशी का उत्सव मनाता रहे, यह कैसी संवेदनशीलता है?
उत्सव और त्योहार तभी सार्थक हैं जब उनमें अधिकाधिक लोगों की प्रसन्नतापूर्वक सहभागिता हो। यदि हमारे आयोजन से आसपास रहने वाले लोग परेशान हों, पशु-पक्षी भयभीत हों और समाज का एक बड़ा वर्ग शांति की तलाश में अपने घरों के दरवाजे-खिड़कियाँ बंद करने को विवश हो जाए, तो हमें अपने उत्सव की प्रकृति पर अवश्य विचार करना चाहिए। अपनी खुशी के लिए दूसरों को कष्ट देना उत्सवधर्मिता नहीं, संवेदनहीनता है।
आतिशबाजी - पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती आतिशबाजी का सबसे प्रत्यक्ष दुष्परिणाम वायु और ध्वनि प्रदूषण के रूप में सामने आता है। पटाखों के विस्फोट से निकलने वाला धुआँ, सूक्ष्म कण और विभिन्न रासायनिक पदार्थ वायु की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। वहीं तेज आवाजें ध्वनि प्रदूषण को बढ़ाती हैं। पहले से ही प्रदूषित वातावरण में आतिशबाजी का अतिरिक्त बोझ जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन जाता है।
विशेष रूप से श्वसन संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों, हृदय रोगियों, छोटे बच्चों और वृद्धजनों के लिए प्रदूषण तथा तेज ध्वनि अधिक परेशानी पैदा कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त पटाखों से आग लगने, हाथ-पैर और आंखों में चोट लगने तथा अन्य दुर्घटनाओं की आशंका भी बनी रहती है।
इस पर होने वाला अनावश्यक खर्च भी कम चिंताजनक नहीं है। कुछ क्षणों के शोर और रोशनी के लिए बड़ी धनराशि बारूद में झोंक दी जाती है। यदि यही धन जरूरतमंदों की सहायता, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण अथवा किसी रचनात्मक सामाजिक कार्य में लगाया जाए तो उससे कहीं अधिक स्थायी प्रसन्नता और संतोष प्राप्त हो सकता है।
अनुकरण की अंधी दौड़ और मानसिकता का संकट आतिशबाजी के विस्तार के पीछे एक बड़ा कारण दूसरों की देखा-देखी चलने की प्रवृत्ति भी है। हमने कभी गंभीरता से यह जानने का प्रयास नहीं किया कि किसी परंपरा का वास्तविक उद्देश्य क्या है, उसका सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभाव क्या है तथा वर्तमान परिस्थितियों में उसे किस रूप में अपनाया जाना चाहिए।
हमारे समाज में एक वर्ग ऐसा भी है जिसे अपनी प्रसन्नता से अधिक दूसरों के सामने उसका प्रदर्शन करने की चिंता रहती है। किसी ने पटाखे चलाए तो हमें भी चलाने हैं। किसी ने महँगी आतिशबाजी की तो हमें उससे अधिक खर्च करना है। यह प्रतिस्पर्धा धीरे-धीरे उत्सव की आत्मीयता को पीछे धकेलकर दिखावे, फिजूलखर्ची और अहंकार को आगे ले आती है।
यह भी समझना होगा कि हर परंपरा का अंधानुकरण आवश्यक नहीं होता। परंपराएँ समाज को दिशा देने के लिए होती हैं, समाज की विवेकशीलता को समाप्त करने के लिए नहीं। समय और परिस्थितियों के अनुसार परंपराओं में सकारात्मक परिवर्तन करना ही जीवंत संस्कृति की पहचान है।
भारतीय उत्सव परंपरा का मूल भाव - मंगल, शांति और लोककल्याण भारतीय संस्कृति में पर्व-त्योहारों का मूल उद्देश्य केवल बाहरी उल्लास नहीं, बल्कि आंतरिक प्रसन्नता, पारिवारिक आत्मीयता, सामाजिक समरसता और लोकमंगल रहा है।
दीपावली का आध्यात्मिक संदेश अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान और निराशा पर आशा की विजय है।
दीप प्रज्वलित करना, घर-आँगन को स्वच्छ रखना, पूजा-अर्चना करना, मिठाइयाँ बाँटना, परिजनों और मित्रों से मिलना तथा जरूरतमंदों के जीवन में प्रकाश पहुँचानाकृये सब इस पर्व के स्वाभाविक और सुंदर आयाम हैं।
हमारे धार्मिक एवं सांस्कृतिक अनुष्ठानों में मंत्रोच्चार, दीपदान, आरती, यज्ञ, दान-पुण्य और मंगलकामनाओं को विशेष महत्त्व दिया गया है। इनका उद्देश्य मनुष्य के भीतर सात्त्विक भावों का विकास और परिवेश में सद्भाव का विस्तार करना है। ऐसे में यह विचार करना आवश्यक है कि क्या बारूद के धमाकों और धुएँ से भरा वातावरण हमारी उस मंगलमय सांस्कृतिक चेतना के अनुरूप है, जिसकी हम बात करते हैं?
यहाँ किसी धार्मिक परंपरा के नाम पर आतिशबाजी को अनिवार्य सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। किसी भी पर्व की आत्मा को समझने के लिए उसके मूल संदेश और सांस्कृतिक उद्देश्य को देखना चाहिए, न कि केवल समय के साथ जुड़ गई बाहरी प्रदर्शनकारी प्रवृत्तियों को।
मांगलिक आयोजनों को अमांगलिक बनाने से बचें शादी-विवाह, गृहप्रवेश, जन्मोत्सव और अन्य मांगलिक अवसर जीवन में आनंद और शुभता के प्रतीक होते हैं। इन अवसरों पर परिवार और समाज एकत्र होते हैं, मंगलकामनाएँ दी जाती हैं और आत्मीयता का विस्तार होता है। लेकिन जब इन आयोजनों में अनियंत्रित आतिशबाजी होने लगती है, तब उनका मूल उद्देश्य कहीं पीछे छूट जाता है।
किसी विवाह समारोह में तेज धमाकों से आसपास के बच्चों, बीमारों और वृद्धजनों की नींद बाधित हो, पशु-पक्षी भयभीत हों और लोगों को असुविधा का सामना करना पड़े, तो ऐसे आयोजन की भव्यता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। मांगलिकता का अर्थ केवल आयोजन की सजावट, खर्च और दिखावा नहीं है। वास्तविक मांगलिकता तो उस व्यवहार में है, जिससे किसी को कष्ट न पहुँचे और अधिकाधिक लोगों के जीवन में प्रसन्नता का संचार हो।
हमें यह भी याद रखना चाहिए कि किसी के मन से निकली पीड़ा और नाराजगी को छोटी बात समझकर टाला नहीं जा सकता। हमारे व्यवहार का प्रभाव सामाजिक संबंधों और आपसी सद्भाव पर पड़ता है। इसलिए दूसरों की सुविधा, सुरक्षा और शांति का ध्यान रखना भी प्रत्येक मांगलिक आयोजन की अनिवार्य जिम्मेदारी होनी चाहिए।
कुछ क्षणों की चमक या दीर्घकालिक सुख? आतिशबाजी कुछ क्षणों के लिए आकाश को रोशन कर सकती है, लेकिन उसके पीछे धुआँ, कचरा, शोर और प्रदूषण छोड़ जाती है। इसके विपरीत एक दीपक की लौ देर तक प्रकाश देती है, मन में शांति का भाव जगाती है और किसी दूसरे के लिए परेशानी का कारण भी नहीं बनती।
हमारे सामने चुनाव स्पष्ट है-हमें क्षणिक प्रदर्शन चाहिए या स्थायी आनंद? हमें धमाकों से भरा वातावरण चाहिए या आत्मीयता से भरा समाज? हमें अपनी खुशी का शोर मचाना है या दूसरों के जीवन में भी खुशी का प्रकाश पहुँचाना है?
आतिशबाजी को खुशी का अनिवार्य प्रतीक मानने की मानसिकता से बाहर निकलना समय की आवश्यकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि उत्सवों का उल्लास कम कर दिया जाए। बल्कि आवश्यकता इस बात की है कि उत्सवों को अधिक रचनात्मक, संवेदनशील, सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल बनाया जाए।
दीपावली पर मिट्टी के दीप जलाएँ, घर-आँगन सजाएँ, परिवार के साथ समय बिताएँ, मिठाइयाँ बाँटें, जरूरतमंदों की सहायता करें और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें। विवाह एवं अन्य मांगलिक अवसरों पर संगीत, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और पारंपरिक मंगलाचार के माध्यम से आनंद का वातावरण निर्मित करें। बच्चों को भी यह समझाएँ कि किसी को भयभीत करना या परेशान करना खुशी मनाने का तरीका नहीं हो सकता।
खुशी वह, जिसमें सबका मंगल हो आज आवश्यकता केवल पटाखे छोड़ने या न छोड़ने के व्यक्तिगत निर्णय तक सीमित नहीं है। आवश्यकता हमारी सोच में परिवर्तन लाने की है। हमें यह समझना होगा कि उत्सव का अधिकार जितना हमें है, उतना ही दूसरों को भी शांति से जीने का अधिकार है। अपनी प्रसन्नता के नाम पर किसी अन्य के स्वास्थ्य, नींद, सुरक्षा और मानसिक सुकून की अनदेखी करना उचित नहीं है।
जो प्रसन्नता दूसरों की पीड़ा पर आधारित हो, वह वास्तविक प्रसन्नता नहीं हो सकती। जो उत्सव प्रकृति को प्रदूषित करे, जीव-जंतुओं को भयभीत करे और समाज में असुविधा पैदा करे, उसके स्वरूप पर पुनर्विचार आवश्यक है।
आतिशबाजी की चकाचौंध में कहीं हम त्योहारों का वास्तविक प्रकाश न खो दें। बारूद के धमाकों से नहीं, बल्कि प्रेम, सद्भाव, सहयोग और संवेदना से समाज में उत्सव का वातावरण बनता है। दीपावली का दीप तभी सार्थक है जब वह केवल हमारे घर को नहीं, हमारी सोच को भी प्रकाशित करे।
आइए, इस बार त्योहारों को धमाकों से नहीं, दीपों से रोशन करें। अपनी खुशी का उत्सव इस तरह मनाएँ कि किसी दूसरे की आँखों में आँसू न आएँ, किसी का सुकून न छिने और किसी जीव को भयभीत न होना पड़े। यही सच्ची उत्सवधर्मिता है, यही भारतीय संस्कृति का मंगलमय संदेश है।
आतिशबाजी का मोह छोड़िए, दीपोत्सव का वास्तविक अर्थ अपनाइए-क्योंकि उत्सव वही श्रेष्ठ है, जिसमें सबका मंगल हो।
- डॉ. दीपक आचार्य
