भगवान धन्वन्तरि को भारतीय चिकित्सा परंपरा में आरोग्य और आयुर्वेद का अधिष्ठाता माना गया है। आयुर्वेद केवल रोगों के उपचार की पद्धति नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन जीने की समग्र जीवनशैली है। धनतेरस पर धन्वन्तरि की आराधना करते हुए हमें उस लोकज्ञान का भी स्मरण करना चाहिए, जो सदियों से भारत के वनांचलों और आदिवासी समाजों में सुरक्षित रहा है।
राजस्थान के दक्षिणांचल, विशेषकर वागड़ के अरावली क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी समुदायों का प्रकृति से अत्यंत गहरा संबंध रहा है। जंगलों, पहाड़ों और नदियों के सान्निध्य में विकसित उनके जीवन ने उन्हें स्थानीय वनस्पतियों, जड़ी-बूटियों, जड़ों, पत्तियों, छाल और फलों के पारंपरिक उपयोग का विशिष्ट ज्ञान प्रदान किया है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित यह अनुभव लोकचिकित्सा की समृद्ध परंपरा का आधार बना है।
इन लोकवैद्यों की विशेषता केवल वनौषधियों की पहचान तक सीमित नहीं है। उनकी उपचार परंपराओं में रोगी की मनःस्थिति को समझना, उसे मानसिक संबल देना, मंत्रों, लोकविश्वासों और स्पर्श आधारित उपचारों का प्रयोग करना भी शामिल रहा है। कृषि, पशुपालन और मानव स्वास्थ्य से संबंधित अनेक पारंपरिक उपाय भी इसी ज्ञान-संपदा का हिस्सा हैं। पर्वतीय अंचलों में आज भी ऐसे अनुभवी पारंपरिक हड्डी-जोड़ विशेषज्ञ मिल जाते हैं, जिनका ज्ञान वर्षों के व्यावहारिक अनुभव पर आधारित है।
हालाँकि आधुनिक जीवनशैली, वनों के घटते विस्तार और नई पीढ़ी की घटती रुचि के कारण यह विरासत लुप्त होने के संकट से गुजर रही है। कई लोकवैद्यों के साथ उनका जीवनभर का अनुभव भी समाप्त हो जाता है।
आवश्यकता है कि आयुर्वेद विभाग, जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग, वन विभाग और अनुसंधान संस्थान मिलकर इस ज्ञान का सर्वेक्षण एवं दस्तावेजीकरण करें। औषधीय वनस्पतियों की पहचान, संरक्षण और पारंपरिक उपचारों का वैज्ञानिक परीक्षण कराया जाए। इस कार्य में आदिवासी समुदायों की सहमति और उनके पारंपरिक ज्ञान पर अधिकारों का सम्मान भी सुनिश्चित हो।
धन्वन्तरि की आराधना का वास्तविक अर्थ केवल आरोग्य की कामना करना नहीं, बल्कि आरोग्य से जुड़ी अपनी समृद्ध परंपराओं और प्रकृति प्रदत्त ज्ञान-संपदा को संरक्षित करना भी है। अरावली के इन प्रकृतिपुत्रों के लोकज्ञान को पहचानना, परखना और अगली पीढ़ी तक पहुँचाना ही धनतेरस पर उनके प्रति हमारी सच्ची एवं समर्पित श्रद्धा भावना एवं आराधना होगी।
— डॉ. दीपक आचार्य