कोटा। जिस कोटा की पत्रकारिता कभी सत्ता के सामने सीना तानकर खड़ी होती थी, आज उसी पत्रकारिता की आवाज अपने ही घर में दबती नजर आ रही है।
कभी मंत्री हो, मुख्यमंत्री हो या कितना ही बड़ा अधिकारी—पत्रकारों की सामूहिक ताकत के सामने उसे जवाब देना पड़ता था। प्रेस कॉन्फ्रेंस में देरी हुई तो बहिष्कार, पत्रकार का अपमान हुआ तो सवाल, हमला हुआ तो पूरी पत्रकार बिरादरी सड़क पर।
आज क्या बदल गया? पत्रकार बढ़ गए, संगठन बढ़ गए, गुट बढ़ गए, पद बढ़ गए, बैनर बढ़ गए—लेकिन क्या पत्रकारिता की ताकत भी बढ़ी?
या फिर पत्रकारिता के वारिस इतने बढ़ गए कि पत्रकारिता ही लावारिस हो गई?
राजीव गांधी, मोरारजी देसाई, वी.पी. सिंह, चंद्रशेखर और लालकृष्ण आडवाणी जैसे बड़े नेताओं की कोटा यात्राओं के दौर में पत्रकारिता ने अपनी स्वतंत्र पहचान कायम रखी। सत्ता किसी भी दल की रही हो, पत्रकारिता का सवाल सत्ता से बड़ा माना जाता था।
लेकिन आज तस्वीर बदलती दिखाई देती है। कहीं पत्रकार नेता के बगलगीर हैं, कहीं प्रवक्ता की भूमिका में, कहीं कार्यक्रम आयोजक, कहीं इवेंट मैनेजर और कहीं राजनीतिक प्रचार की भूमिका में। दूसरी तरफ संस्थानों में काम करने वाले पत्रकारों के सामने नौकरी और संस्थान की मजबूरियां हैं।
नतीजा यह कि कलम के हाथ में सवाल कम और मजबूरियां ज्यादा दिखाई देने लगी हैं।
संगठन दर्जनों, लेकिन संकट में पत्रकार अकेला!
कोटा में पत्रकारों के संरक्षण और हितों के नाम पर कितने संगठन हैं, इसकी गिनती करना मुश्किल है। दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, डिजिटल, यू-ट्यूब, अधिस्वीकृत, गैर-अधिस्वीकृत—पत्रकारिता के अलग-अलग खांचे बन चुके हैं।
लेकिन असली परीक्षा संगठन की संख्या से नहीं, संकट की घड़ी में उसके साथ खड़े होने से होती है।
जब पत्रकार पर हमला हो, मोबाइल छीना जाए, रिपोर्टिंग से रोका जाए, धक्का-मुक्की हो, धमकी दी जाए—तब सवाल होना चाहिए: पत्रकार कौन से संगठन का है, यह बाद में।
पहले यह देखा जाए कि उसके साथ पत्रकार होने के कारण क्या हुआ?
‘यह मेरा सदस्य नहीं है’, ‘यह हमारा पत्रकार नहीं है’, ‘इससे हमारा क्या लेना-देना’— अगर यही जवाब है तो फिर संगठन किसके लिए हैं?
एफआईआर के लिए पत्रकारों को धरने पर क्यों बैठना पड़ा?
हालिया वार्ड 87 के भाग संख्या 99 में पुनर्मतदान के दौरान रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों के साथ कथित मारपीट, धक्का-मुक्की, धमकी और मोबाइल छीने जाने की घटना ने एक बार फिर पत्रकार सुरक्षा का सवाल सामने खड़ा कर दिया।
मामले में महावीर नगर थाने में एफआईआर संख्या 383/2026 दर्ज हुई, जिसमें मनीष महावर, मनीष खींची और देवेंद्र मामा के नाम दर्ज होने की बात सामने आई है। मामले की जांच जारी है और आरोपों की पुष्टि जांच एवं न्यायिक प्रक्रिया से होगी।
लेकिन यहां असली सवाल घटना से भी बड़ा है। एफआईआर दर्ज होने के बाद कार्रवाई की मांग को लेकर पत्रकारों को थाने के बाहर धरने पर क्यों बैठना पड़ा?
अगर पत्रकारों को ही अपने साथ हुई घटना में कार्रवाई के लिए संघर्ष करना पड़े, तो आम आदमी के सामने पत्रकार सुरक्षा का भरोसा कौन पैदा करेगा?
और अगर किसी मामले में पुलिस के पास मतदान केंद्र या आसपास के कैमरों की रिकॉर्डिंग उपलब्ध है, तो जांच में उपलब्ध साक्ष्यों का निष्पक्ष परीक्षण होना चाहिए।
आज पत्रकारों को पत्रकारों से ही बचाने की जरूरत पड़ रही है?
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि पत्रकारिता के भीतर ही एक-दूसरे को छोटा साबित करने की होड़ दिखाई देती है।
कौन बड़ा पत्रकार?
कौन असली?
कौन फर्जी?
कौन अधिस्वीकृत?
कौन गैर-अधिस्वीकृत? कौन किस संगठन का? इन सवालों में असली सवाल कहीं पीछे छूट गया— पत्रकार सुरक्षित है या नहीं?
रिपोर्टिंग करते समय अगर किसी पत्रकार का मोबाइल छीन लिया जाए, उसे धक्का दिया जाए, धमकाया जाए या हमला किया जाए, तो संगठन पहले सदस्यता की रसीद क्यों खोजे?
हमला पत्रकार पर हुआ है तो विरोध पत्रकारिता का होना चाहिए।
आज चुप रहे तो कल किसकी बारी? राहत इंदौरी की पंक्तियां ऐसे समय में बहुत कुछ कह जाती हैं— “लगेगी आग तो आएंगे कई घर ज़द में, यहां कोई अकेला मेरा मकान थोड़ी है।”
आज किसी एक पत्रकार का मोबाइल छीना गया है।
कल किसी दूसरे का कैमरा छीना जा सकता है।
आज किसी को रिपोर्टिंग से रोका गया है। कल किसी और को धमकाया जा सकता है। आज अगर आवाज नहीं उठी तो कल आवाज उठाने वाला भी अकेला होगा।
पत्रकारिता को ‘सेवा’ नहीं, स्वतंत्रता चाहिए पत्रकार संगठनों का काम सिर्फ ज्ञापन देना या सम्मान समारोह आयोजित करना नहीं होना चाहिए।
जरूरत है— पत्रकारों को कानूनी अधिकारों का प्रशिक्षण मिले।
एफआईआर दर्ज कराने की प्रक्रिया की जानकारी दी जाए।
हमले की स्थिति में तत्काल सहायता व्यवस्था हो।
आपातकालीन संपर्क नंबरों की सूची तैयार हो।
पुलिस-प्रशासन के साथ पत्रकार सुरक्षा का संस्थागत तंत्र बने।
पत्रकारों के अधिस्वीकरण, डीपीआर, डीएवीपी, विज्ञापन और आवास संबंधी मुद्दों पर सामूहिक संघर्ष हो।
पत्रकारों के लिए कानूनी सहायता और सुरक्षा प्रशिक्षण की व्यवस्था हो।
चाणक्यपुरी आवास योजना हो या रियायती दर पर भूखंड का सवाल—संगठन यदि पत्रकार हित में बने हैं तो उन्हें इन मुद्दों पर जमीन पर उतरना होगा।
गुट रहेंगे तो रहें, लेकिन पत्रकारिता बिखरनी नहीं चाहिए अलग-अलग संगठन होना कोई अपराध नहीं है। विचार अलग हो सकते हैं। कार्यशैली अलग हो सकती है। संस्थान अलग हो सकते हैं।
लेकिन पत्रकार पर हमला होने के बाद पत्रकारिता का जवाब एक होना चाहिए।
क्योंकि पत्रकार की सबसे बड़ी ताकत उसका संगठन नहीं, उसकी कलम और उसकी विश्वसनीयता है।
कोटा की पत्रकारिता ने कभी बड़े-बड़े सूरमाओं से सवाल किए हैं। सत्ता के गलियारों में उसकी आवाज सुनी जाती थी। आज जरूरत है उस खोई हुई सामूहिक शक्ति को फिर खड़ा करने की।
कई वारिसों की जरूरत नहीं—एकजुट पत्रकारिता की जरूरत है।
वरना इतिहास यही लिखेगा— “कोटा में पत्रकारिता के वारिस तो बहुत थे, लेकिन जब पत्रकारिता को सहारे की जरूरत पड़ी, तो वह लावारिस खड़ी थी।”
— अख्तर खान अकेला
