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Udaipur News

गंगा दशमी पर गंगूकुंड एवं आयड़ नदी तट पर संगोष्ठी आयोजित

मेवाड़ अधिपति एकलिंगनाथ के शीश पर विराजमान है माँ गंगा

मुख्य बिंदु
  • उदयपुर : "स्वच्छ जल, जीवित नदियाँ और सुरक्षित पर्यावरण — पर गंभीर चर्चा तब तक अधूरी है जब तक हम आयड को प्रदूषण मुक्त नहीं करते ।
  • यदि आयड़ मरती है, तो केवल एक नदी नहीं मरती — मेवाड़ की संस्कृति, स्वास्थ्य और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी विषाक्त हो जाता है।
  • " मेवाड़ के अधिपति भगवान एकलिंगनाथ हैं, और शिव स्वयं अपने मस्तक पर माँ गंगा को धारण करते हैं।
  • इसलिए मेवाड़ के लिए गंगा केवल नदी नहीं, बल्कि श्रद्धा, संस्कृति और जीवन की पवित्र धारा है।
  • वह गंगा, जो विष्णु चरणों से निकली, शिव-जटाओं में विराजी और समस्त भारत की आस्था बनी — उसी गंगा की पवित्रता को हमने अपने आचरण से कलंकित कर दिया है।
  • गंगा दशमी के अवसर पर शांतिपीठ के बैनर तले गंगूकुंड एवं आयड़ नदी तट पर आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं ने तीखे शब्दों में कहा कि यदि हम माँ गंगा को पूजते हैं, तो हमें स्वयं भी गंगा की तरह सरल, तरल, निर्मल और पवित्र बनना होगा।
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गंगा दशमी पर गंगूकुंड एवं आयड़ नदी तट पर संगोष्ठी आयोजित

उदयपुर : "स्वच्छ जल, जीवित नदियाँ और सुरक्षित पर्यावरण — पर गंभीर चर्चा तब तक अधूरी है जब तक हम आयड को प्रदूषण मुक्त नहीं करते ।

यदि आयड़ मरती है, तो केवल एक नदी नहीं मरती — मेवाड़ की संस्कृति, स्वास्थ्य और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी विषाक्त हो जाता है।" मेवाड़ के अधिपति भगवान एकलिंगनाथ हैं, और शिव स्वयं अपने मस्तक पर माँ गंगा को धारण करते हैं।

इसलिए मेवाड़ के लिए गंगा केवल नदी नहीं, बल्कि श्रद्धा, संस्कृति और जीवन की पवित्र धारा है। वह गंगा, जो विष्णु चरणों से निकली, शिव-जटाओं में विराजी और समस्त भारत की आस्था बनी — उसी गंगा की पवित्रता को हमने अपने आचरण से कलंकित कर दिया है।

गंगा दशमी के अवसर पर शांतिपीठ के बैनर तले गंगूकुंड एवं आयड़ नदी तट पर आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं ने तीखे शब्दों में कहा कि यदि हम माँ गंगा को पूजते हैं, तो हमें स्वयं भी गंगा की तरह सरल, तरल, निर्मल और पवित्र बनना होगा। किंतु विडंबना देखिए कि गंगा के “चौथे पाए” कहलाने वाले गंगू के किनारे बहने वाली आयड़ नदी को हमने मलजल की नाली में बदल दिया है। यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना का भी पतन है।

आर्ट्स कॉलेज के डीन प्रो. नीरज शर्मा ने कहा कि गंगा केवल पूजा का विषय नहीं, बल्कि चरित्र का आदर्श है। जब तक हम अपने जीवन में शुचिता और प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व नहीं अपनाएँगे, तब तक नदियों को बचाने की सारी बातें खोखली रहेंगी। उन्होंने सभी जलस्रोतों को प्रदूषणमुक्त रखने का आह्वान किया।

इतिहासकार एवं चिंतक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू ने कहा कि मेवाड़ का शायद ही कोई सनातनी घर होगा जहाँ गंगाजल और गंगा-माटी न हो। स्नान करते समय आज भी लोग "गंगा गोदावरी ..." “गंगे च यमुने चैव…” का स्मरण करते हैं।

यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि भारतीय मानस की जल-संस्कृति है। यहां पथवारी गंगामाता की प्रतीक है तो गंगोज सबसे बड़ा उत्सव और गोमानी सबसे बड़ा भोज।

मेवाड़ ने अपने को गंगा का चौथा अंश माना और सीसारमा, बेड़च, बनास जैसी नदियों से गंगा की मिलनी करवाई!

शांतिपीठ के संस्थापक अनंतगणेश त्रिवेदी ने कहा कि मेवाड़ में किसी भी धार्मिक अथवा सांसारिक यात्रा की सफलता के बाद “गंगोज” का आयोजन होता है। यह इस बात का प्रमाण है कि यहाँ गंगा केवल भूगोल नहीं, बल्कि जीवन का संस्कार है। त्रिवेदी ने कहा कि गंगा नदी नहीं भारतीय चेतना के प्रवाह एवं पवित्रता की जीवंत संस्कृति है। यह आनंद और मंगलों की मूल है : “गंग सकल मुद मंगल मूला, सब सुख करनी हरति सब सूला।।

पर्यावरणविद प्रो. महेश शर्मा ने अत्यंत तीखे शब्दों में कहा— “एक ओर हम ‘सुजलाम् सुफलाम्’ का जयघोष कर रहे हैं, दूसरी ओर हमारी जीवनदायिनी आयड़ नदी ज़हर से भर दी गई है। इसी प्रदूषित जल से उगी सब्जियाँ हमारी थाली में पहुँच रही हैं। भूजल और कुएँ जहरीले हो चुके हैं। यदि जल मर गया, तो जीवन भी नहीं बचेगा।”

उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ मनाना तभी सार्थक होगा, जब “सुजलाम् सुफलाम्” केवल नारा नहीं, धरातल की सच्चाई बने। आज स्थिति यह है कि हम हरियाली, नदियों और शुद्ध जल का गुणगान तो करते हैं, किंतु अपनी ही आयड़ नदी को जहरीला बना रहे हैं। यह राष्ट्रगीत की आत्मा के साथ छल है।

श्री दिनेश कोठारी, श्री कैलाश पालीवाल, श्री राजकुमार मेनारिया , श्री सत्य नारायण चौधरी एवं अन्य वक्ताओं ने भी आयड़ नदी के बढ़ते प्रदूषण पर गहरी चिंता व्यक्त की।

सभी ने प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री द्वारा गंगा दशमी से पर्यावरण दिवस तक चलाए जा रहे “वंदे गंगा जल संरक्षण अभियान” को केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि जनआंदोलन बनाने की आवश्यकता बताई।

संगोष्ठी में यह स्वर विशेष रूप से उभरा कि— “हमें केवल ‘सुजलाम् सुफलाम्’ का नारा नहीं, शुद्ध जल चाहिए।” वंदे मातरम गीत के “सुजलाम् सुफलाम्” का उद्घोष केवल गीत का अलंकार नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन का शाश्वत संकल्प है।

दुर्भाग्य यह है कि आज हम इस उद्घोष को गा तो रहे हैं, पर उसे जी नहीं रहे।