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Kota News

तत्कालीन एसआई रामस्वरूप मीणा,दिनेश चौधरी, एएसआई बाबू लाल के खिलाफ सीधे संज्ञान लेने का आदेश हुआ रद्द

के डी अब्बासी

मुख्य बिंदु
  • राजस्थान उच्च न्यायालय की जयपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कोटा के महावीर नगर थाने में तैनात रहे तीन पुलिसकर्मियों के खिलाफ सीधे संज्ञान लेने के सत्र न्यायालय के आदेश को निरस्त कर दिया है।
  • न्यायमूर्ति अनूप कुमार ढंड की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.
  • ) की धारा 398 के तहत पुनरीक्षण न्यायालय को मजिस्ट्रेट को किसी आरोपी के खिलाफ संज्ञान लेने का निर्देश देने का अधिकार नहीं है।
  • महावीर नगर थाने के तीन पुलिसकर्मियों से जुड़ा मामला मामला कोटा के महावीर नगर थाने में तैनात रहे तत्कालीन कांस्टेबल दिनेश चौधरी, एएसआई बाबूलाल और एसआई रामस्वरूप मीना से संबंधित है।
  • परिवादी हरिनारायण गौतम ने इन पुलिसकर्मियों के खिलाफ शिकायत प्रस्तुत की थी।
  • मामले की सुनवाई करते हुए अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट संख्या-6, कोटा ने 29 अक्टूबर 2021 को आदेश दिया था कि चूंकि आरोपी लोक सेवक हैं, इसलिए उनके विरुद्ध संज्ञान लेने से पूर्व सक्षम प्राधिकारी की अभियोजन स्वीकृति आवश्यक होगी।
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कोटा। राजस्थान उच्च न्यायालय की जयपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कोटा के महावीर नगर थाने में तैनात रहे तीन पुलिसकर्मियों के खिलाफ सीधे संज्ञान लेने के सत्र न्यायालय के आदेश को निरस्त कर दिया है। न्यायमूर्ति अनूप कुमार ढंड की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 398 के तहत पुनरीक्षण न्यायालय को मजिस्ट्रेट को किसी आरोपी के खिलाफ संज्ञान लेने का निर्देश देने का अधिकार नहीं है।

महावीर नगर थाने के तीन पुलिसकर्मियों से जुड़ा मामला मामला कोटा के महावीर नगर थाने में तैनात रहे तत्कालीन कांस्टेबल दिनेश चौधरी, एएसआई बाबूलाल और एसआई रामस्वरूप मीना से संबंधित है।

परिवादी हरिनारायण गौतम ने इन पुलिसकर्मियों के खिलाफ शिकायत प्रस्तुत की थी।

मामले की सुनवाई करते हुए अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट संख्या-6, कोटा ने 29 अक्टूबर 2021 को आदेश दिया था कि चूंकि आरोपी लोक सेवक हैं, इसलिए उनके विरुद्ध संज्ञान लेने से पूर्व सक्षम प्राधिकारी की अभियोजन स्वीकृति आवश्यक होगी।

पुनरीक्षण न्यायालय ने पलटा था आदेश मजिस्ट्रेट के आदेश से असंतुष्ट परिवादी ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संख्या-1, कोटा के समक्ष पुनरीक्षण याचिका दायर की थी।

सत्र न्यायालय ने 19 अगस्त 2023 को मजिस्ट्रेट के आदेश को निरस्त करते हुए कहा था कि पुलिसकर्मियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 166, 166ए, 323, 342 और 149 के तहत प्रथम दृष्टया अपराध बनते हैं।

इसके साथ ही मजिस्ट्रेट को आरोपियों के खिलाफ संज्ञान लेने का निर्देश दिया गया था।

हाईकोर्ट ने बताई अधिकार क्षेत्र की सीमा सत्र न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए पुलिसकर्मियों ने राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि पुनरीक्षण न्यायालय ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आदेश पारित किया है।

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने वर्ष 2001 के चर्चित निर्णय गुलाब जती बनाम राजस्थान राज्य का हवाला देते हुए कहा कि Cr.P.C. की धारा 398 के तहत पुनरीक्षण न्यायालय केवल आगे की जांच या पुनर्विचार के लिए निर्देश दे सकता है, लेकिन मजिस्ट्रेट को सीधे संज्ञान लेने का आदेश नहीं दे सकता।

मामला फिर पुनरीक्षण न्यायालय को भेजा उच्च न्यायालय ने सत्र न्यायालय के आदेश को कानूनी रूप से अस्थिर मानते हुए रद्द कर दिया और मामले को पुनः पुनरीक्षण न्यायालय के पास भेज दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि दोनों पक्षों को सुनने के बाद कानून के अनुरूप नया आदेश पारित किया जाए।

फैसले का महत्व कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय पुनरीक्षण न्यायालयों की शक्तियों और अधिकार क्षेत्र की सीमा को स्पष्ट करता है। साथ ही यह भी स्थापित करता है कि लोक सेवकों के खिलाफ आपराधिक मामलों में प्रक्रिया संबंधी प्रावधानों और अभियोजन स्वीकृति के प्रश्न को कानून के अनुसार ही तय किया जाना चाहिए।

यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी नजीर के रूप में देखा जा रहा है।