कोटा । सिरोही के प्रवासी राजस्थानी दिनेश कुमार माली के उपन्यास भारत रत्न के भागीदार: पवित्र मोहन प्रधान एवं उनकी अनूदित कृति भीम भोई की "स्तुति चिंतामणि" का विमोचन हाल ही में ओड़िशा के श्रीक्षेत्र राष्ट्रीय साहित्य महोत्सव के पाँचवें संस्करण में किया गया।
दो दिवसीय श्रीक्षेत्र राष्ट्रीय साहित्य सम्मेलन हाल ही में गीत गोबिंद भवन, भुवनेश्वर में संपन्न हुआ, जिसमें बहुभाषी कवि सम्मेलन में एक दर्जन से अधिक भारतीय भाषाओं के 100 से अधिक कवि एवं साहित्यकारों ने भाग लिया।
संस्था के निदेशक डॉ. फनी महांती ने कहा की भारत सदैव से एक बहुभाषी एवं बहुसांस्कृतिक राष्ट्र रहा है। यहाँ की प्रत्येक भाषा और संस्कृति अपने विशिष्ट सौंदर्य, माधुर्य, जीवंतता और विविधता के लिए महत्वपूर्ण है।
महोत्सव का मूल संदेश यही है कि भाषाएँ अनेक हो सकती हैं, लेकिन भारतीय साहित्य की संवेदना एक है। किसी भी भाषा को दूसरी भाषा पर वर्चस्व स्थापित करने के बजाय सभी भारतीय भाषाओं के बीच परस्पर सम्मान, संवाद और सहयोग की भावना को मजबूत किया जाना चाहिए।
इस साहित्यिक महोत्सव के उद्घाटन सत्र में साहित्यिक पत्रिका ‘शब्दब्रह्म’ के विशेषांक तथा ‘बतायन’ रंगीन पत्रिका का भव्य विमोचन किया जाएगा। देश के विभिन्न राज्यों से पधारे साहित्यकारों ने अपनी-अपनी भाषा में सुंदर अभिव्यक्ति व्यक्त किया।
संवेदना और आत्मा विषय के अंतर्गत दो महत्वपूर्ण परिचर्चा सत्र आयोजित किए गए—“अनुवादक बनाम ए.आई.” तथा “क्या कथा-लेखन सौंदर्य के लिए है या दायित्व के लिए?”।
इनमें से “क्या कथा-लेखन सौंदर्य के लिए है या दायित्व के लिए?” विषयक सत्र की अध्यक्षता प्रसिद्ध मैथिली उपन्यासकार प्रदीप बिहारी ने की।
इस परिचर्चा में प्रख्यात ओड़िया कथाकार प्रकाश महापात्र, प्रो. सुधीर जोशी, तेलुगु कवि प्रसन्न कुमार, असमिया कवि राजीव फूकन सहित अनेक साहित्यकारों ने भाग लिया और अपने विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम के दूसरे दिन विभिन्न भाषाओं की पुस्तकों का एवं विभिन्न भाषा में अनुवादित 20 से भी अधिक पुस्तकों का विमोचन किया गया। दूसरे सत्र में “अनुवादक बनाम ए.आई.” में किस्सा/केआईआईटी विश्वविद्यालय के प्रो. चित्तरंजन ने मॉडरेटर के रूप में चर्चा की शुरुआत की।
इस महत्वपूर्ण विमर्श में अनेक विद्वान एवं पुरस्कार प्राप्त अनुवादकों ने सक्रिय भागीदारी की। इनमें श्यामली सेनगुप्ता, सुतपा साहा, अनिमा दास, राजीव फूकन, दिनेश माली, बरनाली शर्मा, परमिता सारंगी, मराठी कवि संजीव बोरुडे, रचना सहित अनेक साहित्यकार शामिल थे।
इस अवसर पर मंचासीन अतिथियों के कर कमलों से उनके बहुचर्चित उपन्यास "भारत रत्न के दावेदार: पबित्र मोहन प्रधान" एवं ओड़िशा के प्रमुख निर्गुण संत कवि भीम भोई की कालजयी रचना "स्तुति चिंतामणि" की उनकी अनूदित कृति, जिसका यू ट्यूब चैनल पर लगातार प्रसारण हो रहा है, का विमोचन किया गया।
विशेष रूप से अनेक महिला लेखिकाओं ने भी अपने विचार प्रभावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किए।
समारोह में पद्मश्री देवी प्रसन्न पटनायक, प्रख्यात द्विभाषी कवि अश्विनी कुमार, प्रख्यात द्विभाषी कवि सुबोध सरकार, सुप्रसिद्ध हिंदी कवि नरेंद्र पुण्डरीक, प्रतिष्ठित तेलुगु कवि सुरेंद्र नागराज, प्रख्यात ओड़िया आलोचक प्रफुल्ल कुमार महांती तथा विश्व हिंदी परिषद, ओड़िशा प्रदेश के अध्यक्ष एवं हिंदी कवि एवं साहित्यकार श्री विक्रमादित्य सिंह प्रमुख रूप से शामिल हुए।
हिंदी कवि एवं साहित्यकार विक्रमादित्य सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा की "भारत की भाषाएं अनेक है लेकिन उनकी आत्मा एक है।
डॉ. सत्यव्रत जेना, सचिव, श्रीक्षेत्र राष्ट्रीय साहित्य महोत्सव एवं प्रणव कुमार छोटराय, सचिव, साहित्य संस्कृति समारोह ने संयुक्त रूप से संवाददाता को बताया की भाषाई विषमता को कम करने एवं एक मंच पर विभिन्न भाषाविद को शामिल करने के लिए पिछले छः महीने से इस कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार किया जा रहा था।
सफल एवं सार्थक कार्यक्रम के लिए विभिन्न राज्यों से पधारे शिक्षाविद एवं साहित्यकारों ने संस्था को बहुत बहुत शुभकामनाएं प्रेषित किया।
इस कार्यक्रम को सुचारू एवं सफल बनाने में मंच संचालक डॉ सोनाली साहु एवं डॉ संघमित्रा रायगुरु की अहम भूमिका रही। डॉ सोनाली साहु ने जहां अपनी वाकपटुता एवं ऊर्जावान शब्दों से महफ़िल में चार-चांद लगा दिया वहीं डॉ संघमित्रा ने काव्यात्मक शैली में मंच संचालन कर सबका मन मोह लिया। अंत में धन्यवाद ज्ञापन डॉ सरोज महापात्र ने दिया।
