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शान्तिपीठ संस्थान में विश्व शांति दिवस संगोष्ठी का आयोजन

उदयपुर | नेमिशारण्य में शान्ति के बुनियादी सिद्धांत खोजें गये और पाया कि प्रकृति में शान्ति है और प्रकृति विरोधी आचरण अशांति का कारण है।

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शान्तिपीठ संस्थान में विश्व शांति दिवस संगोष्ठी का आयोजन

उदयपुर | नेमिशारण्य में शान्ति के बुनियादी सिद्धांत खोजें गये और पाया कि प्रकृति में शान्ति है और प्रकृति विरोधी आचरण अशांति का कारण है।

हमने प्रकृति अस्तित्व की नियमावली को समझा अवश्य किन्तु इनके क्रियान्वयन में अपेक्षित ईमानदारी से दूर रहें, परिणाम स्वरूप भय, अविश्वास, दुराग्रह और अशांति के दरवाजे खुलते गये और विकास की तथाकथित रफ्तार में विनाश के जखीरे खड़े होते गये।

आज हालात ये हैं कि मनुष्य को अपनी मर्यादा की गरिमा की ओर लौट आना अत्यंत दुष्कर हो चुका है। पुनः समझना होगा कि सन्तुलन में शान्ति है,चाहे सौरमंडल हो या संपूर्ण ब्रह्मांड।

आवश्यकता है शान्ति के शाश्वत सिद्धांत को अमल में लाएं जाने की - यथा ब्रह्मांडे तथा पिण्डे । उक्त विचार आज अंतरराष्ट्रीय शान्ति दिवस के अवसर पर शान्तिपीठ संस्थान के तत्वावधान में संस्था सभागार में आयोजित संगोष्ठी में क‌ईं वक्ताओं ने व्यक्त किए।

संगोष्ठी में क‌ईं विधाओं व क्षेत्रों के विशेषज्ञ सम्मिलित हुए, अध्यक्षता पूर्व आईएएस सुमति लाल बोहरा ने की ।

विचार व्यक्त करते हुए सनातन संस्कृति के प्रचारक लक्ष्मण पूरी गोस्वामी ने सुंदर रूपक प्रस्तुत करते हुए माता सीता को शान्ति का प्रतीक बताया और कहा कि कामना,क्रोध और अहंकार अशांति का कारण बनता है। उन्होंने कहा शब्द, स्पर्श,रस, रूप और गन्ध बन्धन के कारण हैं,इन पर विजय पाना शान्ति के लिए परम आवश्यक है।

शान्तिपीठ के संस्थापक अनन्त गणेश त्रिवेदी ने कहा शान्ति के सिद्धांत कभी अप्रासंगिक नहीं हो सकते, उनके क्रियान्वयन से ही निर्वेर: सर्व भूतेशु की चेतना को उपलब्ध किया जा सकता है। उन्होंने कहा भारतीय मनीषा ने धर्म को प्राथमिक पुरुषार्थ माना किन्तु आज दुनिया में ऐनकेन प्रकारेण अर्थ मात्र को पुरुषार्थ माननें से विश्व आतंकित और अशान्त है,अशान्तश्य कुत: सुखम्।

पूर्व कलक्टर सुमति लाल बोहरा ने आत्म साधना और प्रार्थना को शान्ति का प्रथम अध्याय बताते हुए कहा कि किसी से कोइ दुराग्रह नहीं पालें तथा पड़ोसी ओर समाज के कार्य के लिए तत्पर रहें तो शान्ति कर्म से कभी विचलित नहीं हो सकते।

पूर्व नगर निगम आयुक्त दिनेश कोठारी ने शाकाहार और सदाचार को रेखांकित करते हुए कहा कि दुनिया के क‌ईं देशों में बड़ी संख्या में शस्त्रों के लाइसेंस दिए जाते हैं,भारत में अपेक्षाकृत अल्पतम। भारतीय जीवन सात्विकता प्रधान होने से विश्व शान्ति की अपेक्षा भारत से है।

पूर्व डी एफ ओ सुहेल मजबूर ने कहा कि जब तक व्यक्ति दूसरे के लिए कार्य कौशल का भाव विकसित नहीं करेगा शान्ति संदिग्ध बनी रहेगी।

पर्यावरणविद् डॉ देवेन्द्र सिंह राठौड़ ने पर्यावरण और जैव विविधता के हालात पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समुंद्र में डाले गए तेल की परत से जल चरों के अस्तित्व के साथ ही नया संकट पैदा हुआ है, इसका निस्तारण प्रश्न वाचक बना हुआ है।

प्रो कमल सिंह राठौड़ ने सत्व, रजस और तमस भावों के संदर्भ से शान्ति को समझने की आवश्यकता पर जोर दिया। डा परितोष दूग्गल,डा जयश्री सिंह, पूर्व एयरपोर्ट अथॉरिटी राजीव मेहता, डॉ आर बी कुमार, एडवोकेट अनिल पालीवाल, कमान्डेंट पी एस श्रीमाली, कैलाश पालीवाल आदि ने भी अपने विचार साझा किए।

इस अवसर पर अनन्त गणेश त्रिवेदी ने प्रस्ताव प्रस्तुत किया कि वैदिक शान्ति मंत्र में वह सब समाहित है जो संयुक्त राष्ट्र संघ चाहता है और यह पूरी तरह विज्ञान सम्मत भी है, अतः संयुक्त राष्ट्र इसे अपनाएं और विश्व भर में सारे राष्ट्रों को लाभान्वित करे।

संगोष्ठी का बेखूबी संचालन उच्च न्यायालय अधिवक्ता उमेशचंद्र शर्मा ने किया।