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Banswara News

वागड़ की अनूठी परंपरा में नवदंपती के स्नेह, पारिवारिक आत्मीयता और सामुदायिक सौहार्द का अद्भुत संगम,

मेरिया की लौ में दमकता दाम्पत्य प्रेम, दीवाली आणा में झलकता लोकजीवन का माधुर्य! दीपावली पर नवविवाहित जोड़े के हाथों प्रज्वलित होती है मेरिया की मशाल, गाँव भर के लोग उमंग और लोकगीतों के साथ मनाते हैं दाम्पत्य जीवन का उत्सव

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वागड़ की अनूठी परंपरा में नवदंपती के स्नेह, पारिवारिक आत्मीयता और सामुदायिक सौहार्द का अद्भुत संगम,

पर्व-त्योहार केवल तिथियों और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं होते। वे जीवन में उल्लास के रंग भरते हैं, रिश्तों में आत्मीयता घोलते हैं और समाज को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े रखते हैं।

भारतीय लोकजीवन में ऐसे अनेक पर्व और उनसे जुड़ी परंपराएँ हैं, जिनमें प्रेम, अपनत्व, सामूहिकता और जीवन-माधुर्य के अनूठे रंग दिखाई देते हैं।

दीपावली भी ऐसा ही उत्सव है, जो वागड़ अंचल में अनेक लोकरीतियों और पारंपरिक रस्मों के माध्यम से एक विशिष्ट सांस्कृतिक स्वरूप ग्रहण कर लेता है।राजस्थान के दक्षिणी छोर पर स्थित वागड़ अंचल में मालवा, गुजरात और आदिवासी लोकसंस्कृति का ऐसा सुंदर समन्वय दिखाई देता है, जो इस क्षेत्र को विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान प्रदान करता है।

यहाँ दीपावली के अवसर पर निभाई जाने वाली ‘दीवाली आणा’ और ‘मेरिया’ की परंपराएँ केवल उत्सवी रस्में नहीं हैं, बल्कि नवदाम्पत्य के माधुर्य, पारिवारिक संबंधों की गरमाहट और ग्राम्य समाज की सामूहिक चेतना की जीवंत अभिव्यक्तियाँ हैं।‘दीवाली आणा’ - नववधू के आगमन का आत्मीय उत्सववागड़ अंचल में विवाह के बाद नवविवाहिता को उसके पीहर से ससुराल लाने की परंपरा को स्थानीय भाषा में ‘आणा’ अथवा ‘गौना’ कहा जाता है।

दीपावली के अवसर पर नववधू को पीहर से ससुराल लाने की इस परंपरा को ‘दीवाली आणा’ कहा जाता है। इसकी विशेषता यह है कि इसके लिए किसी अलग मुहूर्त की प्रतीक्षा नहीं की जाती।

दीपावली के आसपास के दिनों में परिवार अपनी सुविधानुसार यह आयोजन कर लेते हैं।वागड़ के अनेक समुदायों में यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। दीपावली के अवसर पर नववधू को लेने वर के साथ उसके परिवारजन और सगे-संबंधी पीहर पहुँचते हैं।

वधू पक्ष की ओर से इन मेहमानों का आत्मीय स्वागत-सत्कार किया जाता है। उन्हें पारंपरिक पकवानों से भोजन कराया जाता है तथा वस्त्र और अन्य उपहार भेंट किए जाते हैं।

इस आयोजन में केवल दो परिवारों का मिलन नहीं होता, बल्कि रिश्तों का विस्तार होता है और सामाजिक आत्मीयता के नए सूत्र जुड़ते हैं।दीवाली आणा के साथ ही नवदंपती के जीवन में एक और अनूठी परंपरा का प्रवेश होता है- ‘मेरिया’।

यही वह लोकरीति है, जिसमें दीपावली की रोशनी दाम्पत्य प्रेम और सामुदायिक स्नेह की प्रतीक बन जाती है।मेरिया - गन्ने के डंठल से प्रज्वलित होती लोकआस्था की मशालमेरिया एक पारंपरिक मशाल है, जिसे गन्ने के डंठल, तोमड़ा (लौकी की प्रजाति के आकार का एक स्थानीय फल), मिट्टी, रूई और कपड़े आदि की सहायता से तैयार किया जाता है।

इसके ऊपरी भाग में कपड़े और रूई की बत्तियाँ लगाई जाती हैं। इन बत्तियों पर तेल डालकर जब इन्हें प्रज्वलित किया जाता है, तब मेरिया की लौ चारों ओर प्रकाश बिखेरने लगती है।दीपावली के अवसर पर इस मशाल को सबसे पहले भगवान को दिखाया जाता है।

इसके बाद घर के विभिन्न हिस्सों और गौशाला तक इसकी रोशनी पहुँचाई जाती है। लोकमान्यता है कि मेरिया का प्रकाश घर-परिवार से अंधकार और अनिष्ट को दूर कर सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है।

कहीं यह परंपरा दीपावली की संध्या को निभाई जाती है तो कहीं अगले दिन प्रातःकाल इसका आयोजन होता है।मेरिया की सबसे मनोहारी रस्म तब सामने आती है, जब नवविवाहित वर-वधू मिलकर इसे प्रज्वलित करते हैं।

पाँच बत्तियों वाले मेरिया को वर अपने हाथों में थामता है और वधू उस पर तेल पूरती है। इसके बाद वधू मेरिया अपने हाथों में लेती है और वर उसमें तेल डालता है।

फिर परिवारजन और नाते-रिश्तेदार भी इस पर तेल अर्पित करते हैं।यह दृश्य केवल एक पारंपरिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि दाम्पत्य जीवन में परस्पर सहयोग, स्नेह और सहभागिता का प्रतीकात्मक रूप है।

एक-दूसरे के हाथों में थामी गई मशाल और उसमें तेल पूरती स्नेहिल हथेलियाँ मानो यह संदेश देती हैं कि जीवन की उजास दोनों के साझा प्रयासों से ही बनी रहती है।

तेल की प्रत्येक धार नवदंपती के प्रति परिवार और समाज के मंगलभाव का प्रतीक बन जाती है।जब पूरा गाँव बन जाता है नवदंपती के उत्सव का सहभागीवागड़ के अनेक गाँवों में मेरिया की परंपरा व्यक्तिगत अथवा पारिवारिक आयोजन तक सीमित नहीं रहती।

इसमें पूरा गाँव सहभागी बन जाता है। दीपावली के अगले दिन प्रातःकाल ग्रामीणजन स्नान कर नए वस्त्र धारण करते हैं और उन परिवारों के घर पहुँचते हैं, जहाँ उस वर्ष दीवाली आणा हुआ होता है।गाँव में जितने भी नवविवाहित दूल्हे होते हैं, उनके घर-घर जाकर मेरजू अर्थात मेरिया पूरने की रस्म निभाई जाती है।

दूल्हा पाँच बत्तियों वाला मेरिया लेकर घर के आँगन में खड़ा होता है। उसके चारों ओर ग्रामीणजन एकत्रित हो जाते हैं।

फिर परिवार की महिलाएँ और युवतियाँ नववधू को लेकर बाहर आती हैं। नववधू के आँगन में आते ही वातावरण उत्सवी उमंग से भर उठता है।

कहीं आतिशबाजी होती है, कहीं लोकगीत गूँजते हैं और कहीं हुड़ा गाते हुए ग्रामीण इस परंपरा को आगे बढ़ाते हैं।नववधू पाँच बार मेरिया में तेल पूरती है और फिर लज्जा तथा संकोच से मुस्कराती हुई घर के भीतर चली जाती है।

इसके बाद यही रस्म गाँव के अन्य नवविवाहित जोड़ों के यहाँ भी निभाई जाती है। प्रातः लगभग सात बजे से दोपहर तक गाँव के लोग घर-घर जाकर इस आयोजन में भाग लेते हैं।इस परंपरा की खूबसूरती यह है कि नवविवाहित जोड़े का निजी उत्सव पूरे गाँव का सामूहिक उत्सव बन जाता है।

नववधू की एक झलक पाने के लिए उत्सुक ग्रामीणों की भीड़, लोकगीतों की स्वर-लहरियाँ और मेरिया की प्रज्वलित लौकृसब मिलकर गाँव के वातावरण को किसी बड़े पारिवारिक समारोह में बदल देते हैं।पापड़ी का सामूहिक आयोजन - एकता और आत्मीयता का स्वादमेरिया की रस्मों के बाद अपराह्न में गाँव के मुखिया अथवा सरपंच के घर ग्रामीणों का सामूहिक समागम होता है।

यह आयोजन एक प्रकार का स्नेह-सम्मेलन होता है, जिसमें गाँव के बुजुर्ग, युवा, परिवारजन और नवविवाहित जोड़े एक साथ शामिल होते हैं।दीवाली आणा वाले परिवार इस अवसर पर पाँच नारियल, लगभग ढाई सौ ग्राम गुड़, दो सौ ग्राम शुद्ध घी और एक किलो गेहूँ का आटा लेकर आते हैं।

इन सामग्रियों से एक बड़े तावड़े में सामूहिक रूप से पापड़ी तैयार की जाती है।

यह केवल पकवान बनाने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामूहिक श्रम, सहभागिता और साझे आनंद का प्रतीक है।गाँव की नई बहुएँ अपनी ननदों के साथ इस आयोजन में सम्मिलित होती हैं और उपस्थित ग्रामीणों के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करती हैं।

गाँव के बुजुर्ग और अन्य ग्रामीण उन्हें सुखी, समृद्ध और मंगलमय दाम्पत्य जीवन का आशीर्वाद देते हैं।

मेहमानों और नाते-रिश्तेदारों का भी आदर-सत्कार किया जाता है।इस अवसर पर गाँव के मुखिया, बुजुर्ग और अन्य जिम्मेदारजन ग्रामीणों को दीपावली की शुभकामनाएँ देते हुए आने वाले वर्ष के लिए सुख-समृद्धि की मंगलकामना करते हैं।

कई स्थानों पर इस सामूहिक मिलन के साथ गाँव की एकता, नशामुक्ति, दहेज निषेध, फिजूलखर्ची पर नियंत्रण, पारस्परिक सहयोग और सर्वसम्मत विकास जैसे सामाजिक संकल्प भी दोहराए जाते हैं।

अंत में सभी को पापड़ी का प्रसाद वितरित किया जाता है और लोग परस्पर राम-राम करते हुए विदा होते हैं।लोकगीतों में गूँजता है प्रेम और अपनत्व का संसारदीवाली आणा और मेरिया के अवसर पर गाए जाने वाले लोकगीत इस परंपरा की आत्मा हैं।

इन गीतों में नवदंपती के प्रति मंगलकामना, परिवार की खुशहाली, रिश्तों की आत्मीयता और लोकजीवन की सहज विनोदप्रियता एक साथ दिखाई देती है।एक पारंपरिक लोकभावना इन पंक्तियों में अभिव्यक्त होती है - ‘पोर आ दाड़ा वेला आवजु, सब नी सुखी राखजु।’ (अर्थात् आने वाले अवसरों पर फिर लौटकर आना और सबको सुखी रखना।

इसी तरह - ‘ढाण्डं-सोपं, कुटूम्ब-परिवार मए शांति रेजु।’ इन पंक्तियों में परिवार और कुटुम्ब की शांति तथा सामूहिक सुख-समृद्धि की कामना निहित है।मेरिया पूरने के दौरान भी अनेक लोकगीत गाए जाते हैं।

‘आल दीवाली काल दीवाली, परमे दाड़े मेरियू, भाई-भाभी ने घेर दीवाली मेरजू’ जैसी पंक्तियाँ नवदंपती के घर उत्सव मनाने की सामूहिक उमंग को व्यक्त करती हैं।

कुछ गीतों में हास्य-विनोद और श्रृंगार का भी सुंदर समावेश मिलता है।

‘घेर मय है पण बोलती नती, कपड़ं हैं पण पेरती नती, तेल है पण पूरती नती’ जैसी पंक्तियाँ लोकसमाज की चुटीली अभिव्यक्ति और सहज हास्यबोध को सामने लाती हैं।इन गीतों की भाषा स्थानीय बोली की मिठास से भरी होती है।

इनके शब्दों में लोकजीवन की सहजता है और भावों में पीढ़ियों से संचित सांस्कृतिक स्मृतियाँ।लोकपरंपरा में रचा-बसा दाम्पत्य और सामुदायिक जीवन का उत्सववागड़ की दीवाली आणा और मेरिया की परंपराएँ अनेक स्तरों पर महत्त्वपूर्ण हैं।

इनमें नवदंपती के दाम्पत्य जीवन के प्रति मंगलभाव है, परिवारों के बीच आत्मीयता है और पूरे गाँव को एक सूत्र में बाँधने वाली सामुदायिक चेतना भी है।

यहाँ विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं रहता, बल्कि पूरा समाज नवदंपती के सुखद भविष्य का सहभागी बनता है।आज जब आधुनिक जीवनशैली के प्रभाव में अनेक लोकपरंपराएँ धीरे-धीरे विस्मृत होती जा रही हैं, तब वागड़ की ये रस्में हमारी सांस्कृतिक विरासत की जीवंत धरोहर के रूप में सामने आती हैं।

इनमें न तो भव्य आयोजन की अनिवार्यता है और न ही दिखावे की प्रतिस्पर्धा। कुछ पारंपरिक सामग्री, लोकगीतों की स्वर-लहरियाँ, रिश्तों की आत्मीयता और पूरे गाँव की सहभागिता ही इन्हें अविस्मरणीय बना देती है।

मेरिया की लौ में केवल तेल और बत्तियाँ नहीं जलतीं; उसमें पीढ़ियों से चली आ रही लोकआस्था, दाम्पत्य प्रेम और सामाजिक सद्भाव की उजास भी झिलमिलाती है।

दीवाली आणा का उल्लास बताता है कि त्योहारों की वास्तविक समृद्धि महँगे उपहारों और भव्य सजावट में नहीं, बल्कि उन रिश्तों में छिपी होती है जिन्हें समाज मिलकर सँजोता है।

वागड़ की यह अनूठी परंपरा संदेश देती है कि दीपावली का प्रकाश तभी सार्थक है, जब वह घरों के साथ-साथ मनों को भी आलोकित करे और रिश्तों में स्नेह, समाज में एकता तथा जीवन में आनंद की नई रोशनी भर दे।

- डॉ. दीपक आचार्य