उदयपुर । कृषि विज्ञान केंद्र, चित्तौड़गढ़ द्वारा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के अंतर्गत आयोजित प्रथम पंक्ति प्रदर्शनों (तिलहन) में सरसों फसल की नवीन उन्नत किस्म BPM-1825 पर एक संस्थागत प्रशिक्षण का आयोजन किया गया इस प्रशिक्षण में पंचायत समिति बड़ीसादड़ी के गांव मरावडिया गाव से 35 कृषकों ने भाग लिया नई किस्म BPM-1825 की विशेषताएं बताई
केन्द्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. रतन लाल सोलंकी ने कृषकों को बताया कि सरसों की यह किस्म उच्च उपज देने वाली और पाला प्रतिरोधी किस्म है। यह कम सिंचाई वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। इसकी औसतन 25-27 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज होती है। यह सफेद रतुआ जैसे रोगों के प्रति प्रतिरोधी है और इसमें मोटे दाने होते हैं
इस किस्म में बुवाई के लगभग 50-60 दिनों में फूल आ जाते हैं और फसल को तैयार होने में 135 से 145 दिन लगते हैं। साथ ही यह सूखा और उच्च तापमान जैसी विभिन्न प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन कर सकती है। सरसों की खेती के लिए बलुई-दोमट मिट्टी और 7 से 8 के बीच पीएच मान वाली मिट्टी उपयुक्त होती है
उन्होंने बताया कि किसान उन्नत तकनीकों और जैविक खाद का उपयोग करके पैदावार बढ़ा सकते हैं। साथ ही सरसों में बुवाई के समय संतुलित खाद व उर्वरक के साथ जिप्सम प्रयोग का तरीका एवं सल्फर उर्वरक के महत्व पर भी विस्तार से चर्चा की खरपतवार और बीज भंडारण पर दी जानकारी
श्रीमती दीपा इंदौरिया, कार्यक्रम सहायक ने किसानों को दैनिक जीवन में तिलहनी फसलों के तेल के उपयोग के महत्व के बारे में विस्तार से बताया
संजय कुमार धाकड़*, तकनीकी सहायक ने सरसों की खेती में खरपतवार एवं पौध संरक्षण के बारे में तकनीकी जानकारी दी। उन्होंने उत्पादित बीज को आगामी फसल की बुवाई के लिए भंडारण कर स्वयं एवं पड़ोसी गांवों के अन्य किसानों को बीज के रूप में बेचकर आमदनी में वृद्धि करने के लिए प्रेरित किया
प्रशिक्षण में उपस्थित किसानों को प्रदर्शन हेतु सरसों का बीज एवं जीवाणु खाद भी उपलब्ध कराया गया
अंत में शंकर लाल नाई, सेवानिवृत्त सहायक कृषि अधिकारी* ने प्रशिक्षण में उपस्थित सभी कृषक एवं कृषक महिलाओं को धन्यवाद ज्ञापित किया
