बांसवाड़ा। पुरातन धर्म-संस्कृति के मौलिक संस्कारों एवं सनातन जीवन-मूल्यों से नई पीढ़ी को परिचित कराने के लिए सामूहिक, समर्पित एवं योजनाबद्ध प्रयास समय की आवश्यकता हैं। प्राच्य संस्कृति, भारतीय परम्पराओं और जीवन-दृष्टि के प्रति नई पीढ़ी में चेतना जागृत करने के साथ ही इन्हें व्यवहार और सामाजिक जीवन से जोड़ने के ठोस प्रयास किए जाने चाहिए।
यह विचार श्री पीताम्बरा आश्रम में आयोजित मासिक आध्यात्मिक चेतना समागम में प्रमुख शिक्षाविद् एवं सामाजिक चिन्तक, इंजीनियरिंग कॉलेज भीलवाड़ा के प्राचार्य तथा विवेकानन्द केन्द्र कन्याकुमारी की भीलवाड़ा शाखा के नगर संचालक डॉ. दिनेश नारायण व्यास ने व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति केवल परम्पराओं का विषय नहीं, बल्कि जीवन को संस्कारित एवं समाज को सशक्त बनाने वाली व्यापक जीवन-दृष्टि है। इसे भावी पीढ़ी तक प्रभावी ढंग से पहुंचाना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
स्थानीय आवश्यकताओं पर आधारित योजनाओं को मिले प्राथमिकता डॉ. व्यास ने जरूरतमन्दों की सेवा तथा पिछड़े क्षेत्रों में बहुआयामी विकास के लिए जमीनी स्तर पर प्रयासों को मजबूत करने पर बल दिया।
उन्होंने कहा कि स्थानीय परिस्थितियों, जनभावनाओं और आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार की गई योजनाएं अधिक प्रभावी एवं टिकाऊ परिणाम देती हैं। विकास एवं सेवा कार्यों की सफलता के लिए धरातलीय अनुभवों और स्थानीय सहभागिता को प्राथमिकता देना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि समाज के वंचित एवं पिछड़े क्षेत्रों में सेवा कार्य केवल सहायता तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भरता, शिक्षा, संस्कार और समग्र विकास से जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
सेवा प्रयासों से जनजाति क्षेत्रों में आया सकारात्मक बदलाव समागम में जिला स्थायी लोक अदालत तथा जिला जन अभाव अभियोग एवं सतर्कता समिति के सदस्य एवं वरिष्ठ अधिवक्ता मनोजसिंह चौहान ने जनजाति क्षेत्रों में सेवा कार्यों तथा उनसे जुड़ी चुनौतियों के समाधान के लिए विगत दशकों में किए गए प्रयासों का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि पिछले पांच-सात दशकों में लोकसेवा एवं जनजातीय क्षेत्र के कल्याण के लिए समाज सुधारकों और महापुरुषों ने जो प्रयास किए, उनके सकारात्मक परिणाम आज स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि इन प्रयासों को निरन्तर गति देने के लिए समाज के प्रत्येक वर्ग को अपनी क्षमता एवं सामर्थ्य के अनुसार सक्रिय भागीदारी निभानी होगी।
त्याग, तपस्या और शुचिता को बताया परिवर्तन का आधार समागम में सामाजिक चिन्तक पं. मधुसूदन व्यास ने सार्वजनिक जीवन में शुचिता, त्याग, तपस्या और नैष्ठिक समर्पण को सामाजिक परिवर्तन का मूलाधार बताया। उन्होंने जनजातीय क्षेत्र के मसीहा मामा बालेश्वरदयाल के जीवन एवं कार्यों का स्मरण करते हुए कहा कि उनका सम्पूर्ण जीवन सेवा, संघर्ष, त्याग और सामाजिक चेतना का प्रेरक उदाहरण है।
उन्होंने मामा बालेश्वरदयाल से जुड़े अनेक रोचक एवं ऐतिहासिक संस्मरण साझा करते हुए कहा कि उन्होंने अपने जीवन एवं कर्म से आध्यात्मिक चेतना और सामाजिक सरोकारों को सशक्त आधार प्रदान किया।
शॉल-उपरणा से अभिनन्दन, धार्मिक साहित्य भेंट इस अवसर पर गायत्री मण्डल की ओर से डॉ. दिनेश नारायण व्यास एवं वरिष्ठ अधिवक्ता मनोजसिंह चौहान का शॉल एवं उपरणा ओढ़ाकर अभिनन्दन किया गया। प्राच्यविद्या संदर्भ ग्रंथालय की ओर से दोनों अतिथियों को धार्मिक एवं प्राच्य साहित्य भेंट किया गया।
गायत्री मण्डल की ओर से वरिष्ठ अभिभाषक यशपाल गुप्ता, कार्यकारिणी सदस्य कमलकान्त भट्ट, मधुसूदन व्यास, हेमन्त चौबीसा, चन्द्रेश व्यास, विनोद चौबीसा एवं अनिल नरहरि एच. भट्ट सहित अन्य सदस्यों ने अतिथियों का स्वागत किया।
प्राच्य संदर्भ ग्रंथालय का अवलोकन समागम के पश्चात डॉ. दिनेश नारायण व्यास एवं मनोजसिंह चौहान ने श्री पीताम्बरा आश्रम के विभिन्न परिसरों तथा प्राच्य संदर्भ ग्रंथालय का अवलोकन किया। उन्होंने आश्रम में संचालित विभिन्न आध्यात्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए गायत्री मण्डल की टीम के प्रयासों की सराहना की।
अतिथियों ने ग्रंथालय में संधारित दुर्लभ एवं प्राचीन ग्रंथों का अवलोकन करते हुए इसे वर्तमान एवं भावी पीढ़ियों के लिए ज्ञान का महत्वपूर्ण संदर्भ केन्द्र बताया। इस दौरान जानकारी दी गई कि ग्रंथालय को डिजिटल स्वरूप प्रदान करने की योजना पर कार्य चल रहा है, जिससे दुर्लभ प्राच्य साहित्य को व्यापक स्तर पर संरक्षित एवं उपलब्ध कराया जा सकेगा।
अतिथियों ने कहा कि धर्म, अध्यात्म, संस्कार और प्राच्य ज्ञान परम्परा से जुड़े ऐसे केन्द्र नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
