बांसवाड़ा | वागड़ के इतिहास, साहित्य, संस्कृति, सामाजिक परिवर्तनों और क्षेत्र की विशिष्ट विभूतियों के योगदान को संरक्षित एवं दस्तावेजीकृत करने के लिए बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों और प्रबुद्धजनों को सामूहिक पहल करनी चाहिए। वागड़ के अतीत और वर्तमान से जुड़े अनेक ऐसे प्रसंग, व्यक्तित्व तथा घटनाएं हैं, जो व्यापक समाज के सामने अब तक पर्याप्त रूप से नहीं आ पाए हैं। इनके व्यवस्थित लेखन, प्रकाशन और प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है।
यह विचार वयोवृद्ध शिक्षाविद्, मनीषी साहित्यकार एवं सामाजिक चिन्तक श्री हीरालाल जैन (कलिंजरा) ने वाग्वर विचार परिषद की ओर से शारदा कॉलोनी में आयोजित प्रबुद्धजन संगोष्ठी में व्यक्त किए।
संगोष्ठी में क्षेत्र के वरिष्ठ साहित्यकार, प्रयोगधर्मी कवि एवं शिक्षाविद् श्री हरीश आचार्य तथा आध्यात्मिक चिन्तक एवं लेखा विधाओं के विशेषज्ञ पं. नरहरिकान्त एच. भट्ट ने उपरणा एवं शॉल ओढ़ाकर श्री जैन का अभिनन्दन किया।
वक्ताओं ने सामाजिक, धार्मिक, साहित्यिक एवं रचनात्मक गतिविधियों में उनकी दशकों से चली आ रही सक्रिय भागीदारी तथा चिन्तनपरक लेखन को अनुकरणीय बताते हुए उनके बहुआयामी व्यक्तित्व एवं योगदान की सराहना की।
अपने विस्तृत उद्बोधन में श्री जैन ने बांसवाड़ा के इतिहास, यहां की विशिष्ट विभूतियों के कर्मयोग, बीते दशकों की महत्त्वपूर्ण एवं अविस्मरणीय घटनाओं तथा सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक जीवन से जुड़े अनेक रोचक संस्मरण साझा किए।
उन्होंने अपने दीर्घ अनुभवों के आधार पर ढाई से तीन घंटे तक चले व्याख्यान में कई ऐसे प्रसंगों और घटनाओं का उल्लेख किया, जिनसे जिज्ञासुओं को वागड़ के अतीत और क्षेत्र की विविध गतिविधियों से जुड़ी नई जानकारियां प्राप्त हुईं। उनके संस्मरणों में ऐतिहासिक घटनाओं के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों की प्रमुख हस्तियों के साथ बिताए गए अविस्मरणीय क्षणों की झलक भी देखने को मिली।
श्री जैन ने अपनी विशिष्ट डायरी लेखन परम्परा से भी परिचित कराया। उन्होंने हाल ही में लिखे गए डायरी के कुछ चुनिन्दा अंशों का वाचन कर उपस्थितजनों को अपने अनुभवों और लेखकीय संसार से जोड़ा।
इस अवसर पर उनकी रचनाओं पर आधारित गीतों तथा अन्य रचनात्मक प्रस्तुतियों के फिल्मांकित अंश भी प्रदर्शित किए गए, जिन्हें उपस्थितजनों ने रुचि के साथ देखा।
उन्होंने वागड़ के परम्परागत इतिहास, निकट अतीत की महत्त्वपूर्ण घटनाओं, विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाली विभूतियों के कर्मयोग तथा लोक साहित्य के संरक्षण पर विशेष बल दिया। उनका कहना था कि क्षेत्र की ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत को केवल मौखिक स्मृतियों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि उसका प्रामाणिक लेखन, दस्तावेजीकरण, प्रकाशन और व्यापक प्रचार-प्रसार होना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों, परम्पराओं और गौरवशाली विरासत से परिचित हो सकें।
वरिष्ठ साहित्यकार एवं शिक्षाविद् श्री हरीश आचार्य ने अपने उद्बोधन में श्री जैन के कार्यकाल में आयोजित विभिन्न रचनात्मक एवं साहित्यिक आयोजनों का उल्लेख करते हुए बांसवाड़ा में हुए रचनात्मक आन्दोलनों और साहित्यिक गतिविधियों में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया।
उन्होंने कहा कि श्री जैन का योगदान केवल व्यक्तिगत लेखन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने विभिन्न रचनात्मक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने और साहित्यिक चेतना को विस्तार देने में भी उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। इस अवसर पर उन्होंने श्री जैन के सम्मान में काव्य पंक्तियां प्रस्तुत कर उपस्थितजनों को भावविभोर कर दिया।
वयोवृद्ध आध्यात्मिक चिन्तक एवं लेखा विधाओं के विशेषज्ञ पं. नरहरिकान्त एच. भट्ट ने श्री जैन के व्यक्तित्व और कृतित्व के अनेक अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने उन्हें ऊर्जावान, प्रेरणादायी और बहुआयामी व्यक्तित्व बताते हुए कहा कि उनकी सक्रियता, अनुभव और सतत सृजनशीलता युवा पीढ़ी के साथ-साथ वरिष्ठजनों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है।
उन्होंने कहा कि जीवन के हर पड़ाव पर सक्रिय रहकर समाज और साहित्य के लिए योगदान देते रहना अपने आप में अनुकरणीय उदाहरण है। कार्यक्रम के प्रारम्भ में गौरव, अनिल सहित अन्य उपस्थितजनों ने अतिथियों का स्वागत किया।
संगोष्ठी में वागड़ के इतिहास, साहित्य, संस्कृति और सामाजिक जीवन से जुड़े महत्त्वपूर्ण विषयों पर सार्थक चिन्तन के साथ क्षेत्र की बौद्धिक एवं रचनात्मक विरासत के संरक्षण की आवश्यकता प्रमुखता से उभरकर सामने आई। इसके लिए संकल्पबद्ध होकर काम करने का प्रण किया गया।
