उदयपुर। नारायण सेवा संस्थान के अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल के सानिध्य में चल रही ‘अपनों से अपनी बात’ कथा में बुधवार को भगवान गणेश से जुड़े प्रेरक प्रसंगों के माध्यम से जीवन के मूल्यों और व्यवहारिक पक्ष पर प्रकाश डाला गया। उन्होंने त्याग, क्षमा, समय की महत्ता तथा माता-पिता के सम्मान और सेवा को जीवन की सच्ची सीख बताया।
भगवान शिव से रावण द्वारा आत्मलिंग प्राप्त करने का प्रसंग सुनाते हुए प्रशांत अग्रवाल ने बताया कि आत्मलिंग को मार्ग में भूमि पर नहीं रखने की शर्त थी।
संध्या के समय रावण ने एक बालक से आत्मलिंग कुछ समय के लिए पकड़ने का आग्रह किया। बालक रूप में उपस्थित गणेश जी ने पहले ही स्पष्ट कर दिया कि अधिक भार होने पर वे तीन बार रावण को पुकारेंगे और उत्तर नहीं मिलने पर आत्मलिंग भूमि पर रख देंगे।
रावण समय पर नहीं पहुंच सका और आत्मलिंग भूमि पर स्थापित हो गया। उन्होंने कहा कि यह प्रसंग बताता है कि समय की एक छोटी-सी चूक भी बड़े परिणाम का कारण बन सकती है।
इसलिए जीवन में समय और परिस्थितियों को कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए।
ज्ञान के मोदक से जुड़े प्रसंग के माध्यम से उन्होंने माता-पिता के प्रति सम्मान और सेवा का महत्व समझाया। माता पार्वती ने गणेश और कार्तिकेय के सामने सभी तीर्थों की यात्रा कर लौटने की शर्त रखी। कार्तिकेय तीर्थ यात्रा के लिए निकल पड़े, जबकि गणेश जी ने अपने माता-पिता की सात परिक्रमा कर कहा कि माता-पिता ही संपूर्ण संसार और सभी तीर्थों का स्वरूप हैं। उनके इस भाव से प्रसन्न होकर उन्हें ज्ञान का मोदक प्रदान किया गया।
प्रशांत अग्रवाल ने कहा कि जीवन में आगे बढ़ने से पहले यह समझना जरूरी है कि वास्तविक ज्ञान केवल पुस्तकों और यात्राओं में नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों और संबंधों के सम्मान में भी छिपा है। गणेश जी के प्रसंग सिखाते हैं कि त्याग व्यक्ति को बड़ा बनाता है, समय की पहचान सफलता का मार्ग खोलती है और माता-पिता की सेवा जीवन का सबसे बड़ा संस्कार है।
कथा के दौरान उन्होंने दिव्यांग बंधुओं से संवाद किया और 19-20 सितंबर को आयोजित होने वाले सामूहिक विवाह समारोह में शामिल होने वाले जोड़ों की जानकारी भी साझा की।
