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Literature News

हनुमान की वैश्विक लोकप्रियता को परिभाषित करती बेहतरीन कृति

भारतीय संस्कृति में राम भक्त पवन पुत्र हनुमान के प्रति देव श्रद्धा भक्ति सर्वाधिक है। ज्ञान के सागर, अतुल्य बलशाली और संकष्ट मोचन हनुमान अनेक नामों और रूपों में वंदनीय हैं।

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हनुमान की वैश्विक लोकप्रियता को परिभाषित करती बेहतरीन कृति

भारतीय संस्कृति में राम भक्त पवन पुत्र हनुमान के प्रति देव श्रद्धा भक्ति सर्वाधिक है। ज्ञान के सागर, अतुल्य बलशाली और संकष्ट मोचन हनुमान अनेक नामों और रूपों में वंदनीय हैं। पूरे देश में इनके मंदिर और मूर्तियाँ प्रचुर संख्या में पाए जाते हैं। हनुमान कथा और इनके प्रसंगों से भला कौन परिचित नहीं हैं। हनुमान की महिमा पर विषाद साहित्य उपलब्ध हैं।

हनुमान को लेकर राजस्थान में झालावाड़ के इतिहासकार ललित शर्मा की नवीनतम पुस्तक कला एवं पुरातत्व में हनुमान हाल ही में प्रकाशित हुई हैं। यह पुस्तक हनुमान के विविध आयामों पर दुर्लभ जानकारियां उपलब्ध कराती हैं।

हनुमान पर दुर्लभ जानकारी पांच अध्यायों में दी गई हैं। प्रथम अध्याय में भारतीय मूर्तिकला में हनुमान को विश्लेषित किया गया है ।

सभ्यता - संस्कृति और इतिहास के काल खंडों के विकास के क्रम में क्रमशःवैदिक काल से वर्तमान समय तक देश के विभिन्न स्थानों से पाई गई हनुमान मूर्तियों और हनुमान मंदिरों के संदर्भ में विस्तार से जानकारी दी गई है।

प्राचीन अलभ्य ऐसी मूर्तियाँ जो देश के विभिन्न संग्रहालयों ओर देव मन्दिरों में हैं, के साथ जो नवीन वैशिष्ट्य की दृष्टि से पुरामहत्व लिये है, का भी वर्णन इस अध्याय में है ।

दूसरे अध्याय हनुमान पूजा की वैश्विक लोकप्रियता को इंगित करता है जिसमें विदेशों में मिली हनुमान मूर्तियों का विश्लेषण किया गया है। भारत देश से बाहर गई प्राचीन हनुमान मूर्तियों और नेपाल में निर्मित मध्ययुगीन हनुमान मूर्तियों की भी संक्षिप्त जानकारी दी गई है।

मूर्तियां ही नहीं समय - समय पर विभिन्न काल खण्ड में ढाले गए सिक्कों पर पर हनुमान अंकन किया गया है। भारत की प्राचीन मुद्राओं में हनुमान के विभिन्न स्वरूप और उनके प्रति आस्था के स्वरूप का वर्णन भी प्रस्तुत कृति में दर्शाया गया है। इसी पर आधारित है तृतीय अध्याय प्राचीन भारतीय मुद्रा में हनुमान ।

भारतीय चित्रकला की अनेक शैलियों का विकास हुआ और ये परम्परागत शैली।के चित्र भारतीय कला की अमूल्य निधि ही नहीं वरन पर्यटकों के आकर्षण का भी केंद्र है। इन चित्रों में हनुमान चित्रांकन भी पर्याप्त देखने को मिलता है। इसी विषय पर केंद्रित है चौथा अध्याय भारतीय चित्रांकन परंपरा में हनुमान।

महापुरुषों, महत्वपूर्ण स्मारकों आदि कई विषयों पर समय - समय पर डाक टिकट जारी किए गए हैं। जान कर आश्चर्य भी होता है कि हनुमान पर भी डाक टिकट जारी किए गए हैं। ऐसे डाक टिकट पर केंद्रित है पांचवां अध्याय जिसमें उन डाक टिकटों पर प्रकाश डाला गया है जिनमें हनुमान के महत्व को दर्शाते हैं।

इस श्रमसाध्य कार्य में लेखक ने अधिकांश मौलिक एवं प्राथमिक संदर्भों और श्रोतों का उपयोग किया है, जो किसी भी शोध के लिए अनिवार्य और पहली प्राथमिकता होती है।

कहने को तो यह एक लघु पुस्तक है परन्तु हनुमान के बारे में अधिक से अधिक जानने के इच्छुक पाठक के लिए एक अत्यंत उपयोगी है। हनुमान के बारे में ऐसी अनूठी और दुर्लभ जानकारी को एक पुस्तक में मणिमाला के मोती की तरह बहुत ही आकर्षक रूप से पिरोया गया है। विशेषता है दुर्लभ चित्र जो हर अध्याय में पर्याप्त रूप से प्रदर्शित हैं।

पुस्तक हनुमान के बारे में पाठक के ज्ञान में वृद्धि करने में सहायक है। पुस्तकविद्वानों और सामान्य पाठकों के लिए समान रूप से उपयोगी है।

पुस्तक में अपने अभिमत में इंदौर के विद्वान कला इतिहासकार नर्मदा प्रसाद उपाध्याय लिखते हैं ," हनुमान को इतना अधिक शिल्पित किया गया है कि यह गणना से परे है।

उन्हें जहाँ एक ओर पारंपरिक शैलियों में चित्रित किया गया है वहीं दूसरी ओर आधुनिक चित्रांकन और शिल्पांकन की शैलियों में भी, और उनके अनेक कॉमिक्स सहित एनिमेटेड फिल्म आदि भी तैयार की गई हैं क्योंकि वे विशेष रूप से बच्चों में प्रिय हैं।

हनुमान की प्रतिमाएँ प्रत्येक युग में निर्मित हुईं तथा प्राचीन काल और मध्यकाल में वे पाषाण और काँसे तथा पीतल जैसी धातुओं से भी निर्मित की गईं।

इनमें से अनेक उत्कृष्ट उदाहरण देश-विदेश के संग्रहालयों और व्यक्तिगत संग्रहों में हैं। अनेक विद्वानों का मत है कि हनुमान की प्रतिमाओं के प्रमाण आठवीं सदी से मिले हैं किंतु दसवीं सदी से उनकी मूर्तियों और शिलालेखों में उनके वर्णन के प्रमाण मिले हैं।

कुछ विद्वानों ने परीक्षण के पश्चात् यह पाया है कि गुप्तकाल से ईस्वी पाँचवीं सदी से हनुमान की मूर्तियाँ मिलती हैं लेकिन इनमें उन्हें अकेले नहीं दिखाया गया है।

उनकी स्वतंत्र मूर्तियाँ सातवीं सदी से मिलती हैं। खजुराहो में ईस्वी सन् 922 में निर्मित हनुमान मंदिर है जिसमें उनकी सुंदर प्रतिमा प्रतिष्ठित है।

अयोध्या की हनुमानगढी का काल दसवीं सदी का है। विश्व का एकमात्र हनुमान मंदिर जिसमें पंचमुखी हनुमान की प्राकृतिक प्रतिमा है और जिसे लगभग 1500 वर्ष पुराना माना जाता है वह पाकिस्तान के कराची में है।

हनुमान के अंकन के सिक्के भी मिले हैं।"

वे आगे लिखते हैं, " हनुमान के इस परिप्रेक्ष्य में प्रख्यात इतिहासविद श्री ललित शर्मा ने 'कला और पुरातत्त्व में हनुमान' शीर्षक से यह कृति सृजित की है जिसमें कला और पुरातत्त्व के क्षेत्र में हनुमान के स्वरूप की संक्षिप्त लेकिन सारगर्भित चर्चा कर अत्यंत महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है।

ज्ञानगुणसागर हनुमान के संबंध में इतना लिखा गया है और विभिन्न कलाओं में उन्हें इतना प्रदर्शित किया गया है कि उनके आख्यान के लिए शब्दों के अनंत आकाश भी कम होंगे लेकिन मुझे लगता है कि शब्दों का सार भी मोती की तरह सँजोया जा सकता है, उन्हें भी किसी सीपी में प्रतिष्ठित किया जा सकता है।

यह कृति भी एक सीपी की तरह ही तथा इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

इसमें हनुमान के विभिन्न पक्षों, विशेषकर मूर्तिशिल्प, मुद्रा, चित्रांकन तथा डाक टिकटों में उनकी विभिन्न स्वरूपों में अभिव्यक्ति को सँजोया गया है तथा चित्रावली में इनमें से कुछ के चित्र प्रकाशित भी किए गए हैं।

यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें अनेक दुर्लभ जानकारियाँ संकलित की गई हैं तथा हनुमान से संबंधित उन आयामों पर प्रकाश डाला गया है जो हमारे दृष्टिपथ में तो हैं किंतु जिनके वैशिष्ट्य से हम परिचित नहीं हैं।"

लेखकीय में लेखक ललित शर्मा लिखते हैं," प्रस्तुत कृति में पुरातत्त्व और कला के मूल स्रोतों मृद्घट्टिकाओं, मूर्तियों, शिलालेखों, प्राचीन मंदिरों, कला चित्रों के साथ विदेशों में मूर्तियों और देश-विदेश के डाक टिकटों में हनुमान के विभिन्न अंकनों का विवेचन बड़े श्रद्धा भाव से किया गया।

विश्व के अनेक देशों में मिली हनुमान के पूर्व स्वरूप की कुछ मूर्तियों के साथ उनके प्राचीन, मध्यकालीन अंकन की भी कृति में चर्चा की गई है। इस प्रकार इन सभी अंकनों में जन-जन के वंदनीय हनुमान का श्रद्धा भाव से स्मरण किया गया है।

कृति में हनुमान के आरम्भिक तथ्यपूर्ण कला स्वरूपों की जानकारी दी गई है जिसके माध्यम से यह प्रमाणित करने का प्रयास किया गया है कि हनुमान मात्र लीलाधारी, काल्पनिक या चमत्कारी व्यक्तित्त्व नहीं वरन् वे स्वर्णिम भारतीय भूमण्डल के एक उज्ज्वल प्रकाशपुंज और वाल्मीकि रामायण के प्रमुख पात्र के साथ चिरंजीवी और सन्तों, ऋषियों की भक्ति साधना और उनके काव्य के आराध्य स्वरूप हैं।

" लेखक आगे लिखते हैं," यह लघु कृति कोई शोध पुस्तक नहीं है क्योंकि इससे पूर्व भी हनुमान के चरित्र, कार्यों और कला विवेचन पर अनेक विशद ग्रन्थों का प्रकाशन विराट स्तर पर हो चुका है।

हनुमान की विवेचना किसी सीमा या पंक्ति से परे है।

उन्हें किसी प्रकार बाँधा जाना संभव ही नहीं है और इसी क्रम में बस एक लघु प्रयास इस पुस्तिका मात्र से किया गया है और पाठकों, शोधार्थियों से भी यही निवेदन है कि वह भी इस कृति को इसी रूप में अध्ययन करने की कृपा करें।

परन्तु इस कृति से किसी भी पाठक को कोई नवीनता अध्ययन करने में प्रतीत होती है तो वह हनुमान की सकृपा मानी जाये।"

यह कृति लेखक के माता-पिता आरम्भ से ही हनुमान के बड़े भक्त थे, उन्हीं के पूज्य धोकड़े के हनुमान (झालावाड़) को समर्पित की गई हैं। अंत में उन सभी संदर्भों का उल्लेख है जिनकी सहायता से पुस्तक लेखन संभव हुआ है। आवरण पृष्ठ बहुत आकर्षक है। इससे पूर्व लेखक की पुस्तक कला एवं पुरातत्व में राम लोकप्रिय हो चुकी है।