उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में शुक्रवार को आयोजित नियमित धर्मसभा में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने श्रावक-श्राविकाओं को संबोधित करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति और जिन शासन में मनाए जाने वाले प्रत्येक पर्व का उद्देश्य आत्मा को शुद्ध करना और भीतर ज्ञान का प्रकाश जागृत करना है।
पर्व केवल उत्सव मनाने का अवसर नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, साधना और आत्मकल्याण की प्रेरणा देते हैं।साध्वी श्रीजी ने कहा कि मौन एकादशी, नवपद ओली और दीपावली जैसे पर्वों की अपनी विशेष आध्यात्मिक महिमा है।
मौन एकादशी की महत्ता भगवान नेमिनाथ ने बताई, वहीं नवपद ओली की आराधना और उसका महत्व गौतम स्वामी के माध्यम से समझने को मिलता है। दीपावली पर्व की परंपरा में सम्राट सम्प्रति का भी विशेष योगदान रहा है।
उन्होंने कहा कि भगवान महावीर का निर्वाण दीपावली की अमावस्या को हुआ था।
इसलिए जैन समाज के लिए दीपावली आत्मज्योति प्रकट करने और भगवान महावीर के निर्वाण का स्मरण करने का पावन पर्व है।साध्वी श्रीजी ने कहा कि गुरु भगवंतों का प्रेम निःस्वार्थ होता है, जहां किसी प्रकार का सौदा नहीं होता।
सांसारिक सौदे में लेने और देने की भावना रहती है, लेकिन सच्चा प्रेम इन सबसे ऊपर होता है। उन्होंने संपर्क, संयोग और संबंध की व्याख्या करते हुए दूध का उदाहरण दिया।
दूध में शक्कर मिलाने से मिठास आती है, जामन डालने से दही बनता है और नींबू डालने से उसका स्वरूप बदल जाता है। इसी प्रकार जीवन में भी ऐसे लोगों से परिचय और संबंध बनाने चाहिए, जिनके संपर्क से मिठास और सकारात्मकता आए।
ऐसे लोगों से दूरी रखनी चाहिए, जिनका प्रभाव जीवन में विकृति पैदा करे। ऐसा निःस्वार्थ प्रेम केवल परमात्मा ही कर सकते हैं।
साध्वी श्रीजी ने भगवान के वरघोड़े का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि उसमें गुरु भगवंत भी शामिल थे। दो सगे भाइयों को साध्वी भगवंत के माध्यम से संयम मार्ग की प्रेरणा मिली।
उन्होंने कहा कि जिन शासन की परंपरा में साध्वी भगवंतों का भी अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा है।उन्होंने चातुर्मास के दौरान साध्वी भगवंतों के उपासरे में घटित एक रोचक प्रसंग सुनाया।
कुछ बच्चे गेंद से खेल रहे थे। खेलते समय गेंद महाराज के उपासरे में चली गई।
वहां मौजूद दो जैन बच्चों को गेंद लाने के लिए भेजा गया, लेकिन वे संकोच के कारण भीतर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। दोनों एक-दूसरे से कहते रहे कि तुम जाओ, नहीं तुम जाओ।
बच्चों की इस मासूम झिझक को देखकर साध्वी भगवंत मुस्कुराने लगे। धर्मसभा में साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने मधुर गीत प्रस्तुत किया।