मुख्य सामग्री पर जाएँ
गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026 उदयपुर · 29°C
Udaipur News

व्यक्ति की पहचान वस्तुओं से नहीं, आचरण से होती:डॉ. सुरेंद्र मुनि

भक्तामर स्तोत्र की 29वीं गाथा नशा मुक्ति के लिए विशेष कारगर

मुख्य बिंदु
  • महावीर समवशरण में आयोजित धर्मसभा में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए डॉ.
  • सुरेंद्र मुनि ने जीवन में सद्आचरण के महत्व पर विशेष प्रकाश डाला।
  • उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने गुरुजनों के बताए मार्ग और उनके आचरण की विशेषताओं को जीवन में अपनाना चाहिए।
  • मुनि श्री ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के पास भौतिक सुख-सुविधा और रहन-सहन के अच्छे से अच्छे साधन उपलब्ध हों, लेकिन जीवन जीने का तौर-तरीका व्यवस्थित और मर्यादित न हो, तो वह सर्वत्र अनादर का ही पात्र बनता है।
  • प्राचीन समय में लोग श्सादा जीवन, उच्च विचारश् के सिद्धांत पर चलते थे और सर्वत्र मान-सम्मान पाते थे।
  • इसके विपरीत, आज जीवनशैली में तड़क-भड़क बढ़ रही है और विचार गिरते जा रहे हैं।
WAf𝕏TGin✉🖨
व्यक्ति की पहचान वस्तुओं से नहीं, आचरण से होती:डॉ. सुरेंद्र मुनि
1 / 2

उदयपुर। महावीर समवशरण में आयोजित धर्मसभा में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए डॉ. सुरेंद्र मुनि ने जीवन में सद्आचरण के महत्व पर विशेष प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने गुरुजनों के बताए मार्ग और उनके आचरण की विशेषताओं को जीवन में अपनाना चाहिए।मुनि श्री ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के पास भौतिक सुख-सुविधा और रहन-सहन के अच्छे से अच्छे साधन उपलब्ध हों, लेकिन जीवन जीने का तौर-तरीका व्यवस्थित और मर्यादित न हो, तो वह सर्वत्र अनादर का ही पात्र बनता है।

प्राचीन समय में लोग श्सादा जीवन, उच्च विचारश् के सिद्धांत पर चलते थे और सर्वत्र मान-सम्मान पाते थे। इसके विपरीत, आज जीवनशैली में तड़क-भड़क बढ़ रही है और विचार गिरते जा रहे हैं।

भगवान राम, कृष्ण, महावीर के विचार इसलिए महान थे क्योंकि वे सदैव सत्य, अहिंसा और क्षमा के पुजारी रहे।

मुनिश्री जी ने सभा में उपस्थित सभी लोगों को सादा जीवन जीने की विशेष प्रेरणा प्रदान की तथा भक्तामर स्तोत्र की 29वीं गाथा की साधना विशेष रूप से संपन्न करवाई भक्तामर स्तोत्र की 29 की गाथा की साधना से इंसान जीवन में नशा मुक्ति प्राप्त करता है जिस किसी इंसान से किसी भी प्रकार का नशा नहीं छूट रहा हो तो उसे 29वीं गाथा की साधना अवश्य करनी चाहिए- सभा में प्रवर्तक डॉ. राजेंद्र मुनि ने प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की स्तुति में आचार्य मानतुंग द्वारा रचित श्भक्तामर स्तोत्रश् का वर्णन करते हुए प्रभु के महान गुणों की महिमा बताई।

उन्होंने कहा कि जैन धर्मानुसार आदिनाथ (ऋषभदेव) इस काल के धर्म के संस्थापक रहे हैं।

उनका और उनके बाद हुए सभी 24 तीर्थंकरों का संपूर्ण जीवन आचारवान रहा।उन्होंने आगे कहा कि आज भी लाखों-लाख श्रावक-श्राविकाएं और साधु-साध्वी उनके द्वारा दिखाई गई राह पर चलते हुए तप, जप और साधना में लीन हैं।

हम सभी को प्रतिदिन प्रार्थना के माध्यम से उनका स्मरण और वंदन करना चाहिए।