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सच्ची आस्था वही, जो मानवता और जीवदया की राह दिखाए

उदयपुर। आध्यात्मिक प्रवचन में डॉ. सुरेन्द्र मुनि ने कहा कि मनुष्य के जीवन में धर्म और आस्था का वास्तविक उद्देश्य केवल बाहरी आडंबर नहीं

उदयपुर। आध्यात्मिक प्रवचन में डॉ.

मुख्य बिंदु
  • आध्यात्मिक प्रवचन में डॉ.
  • सुरेन्द्र मुनि ने कहा कि मनुष्य के जीवन में धर्म और आस्था का वास्तविक उद्देश्य केवल बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि अपने भीतर करुणा, दया और सद्भाव का विकास करना है।
  • उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में अच्छे गुणों को अपनाने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि केवल दूसरों के गुणों को जानना पर्याप्त नहीं है।
  • उन्होंने बताया कि जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव के बीच मनुष्य को सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
  • दूसरों के प्रति सम्मान, प्रेम और सहयोग की भावना ही समाज को बेहतर बनाने का मार्ग प्रशस्त करती है।
  • इसी संदर्भ में उपस्थित जन समूह को श्रावक के 12 व्रत का विवेचन प्रस्तुत किया गया।
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सच्ची आस्था वही, जो मानवता और जीवदया की राह दिखाए

उदयपुर। आध्यात्मिक प्रवचन में डॉ. सुरेन्द्र मुनि ने कहा कि मनुष्य के जीवन में धर्म और आस्था का वास्तविक उद्देश्य केवल बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि अपने भीतर करुणा, दया और सद्भाव का विकास करना है।

उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में अच्छे गुणों को अपनाने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि केवल दूसरों के गुणों को जानना पर्याप्त नहीं है।उन्होंने बताया कि जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव के बीच मनुष्य को सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

दूसरों के प्रति सम्मान, प्रेम और सहयोग की भावना ही समाज को बेहतर बनाने का मार्ग प्रशस्त करती है।

इसी संदर्भ में उपस्थित जन समूह को श्रावक के 12 व्रत का विवेचन प्रस्तुत किया गया।प्रवचन में डॉ राजेंद्र मुनि ने कहा कि महावीर की अहिंसा की भावना को जीवन में उतारना आज के समय की बड़ी आवश्यकता है।

जीव मात्र के प्रति दया और संवेदना रखना ही सच्चे धर्म का स्वरूप है।

मनुष्य को अपने व्यवहार और कर्मों से ऐसा वातावरण बनाना चाहिए, जिसमें सभी जीव सुरक्षित और सम्मान के साथ जीवन जी सकें।आध्यात्मिक चिंतन के दौरान डॉ.राजेन्द्र मुनि ने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में प्राप्त वस्तुओं और साधनों के प्रति अत्यधिक मोह नहीं रखना चाहिए।

जो वस्तुएं हमें प्राप्त हुई हैं, उनका उपयोग एक निश्चित समय तक ही संभव है। इसलिए उनके प्रति समत्वभाव रखना ही उचित है।उन्होंने कहा कि जीवन निरंतर परिवर्तनशील है।

जिस प्रकार नदी का पानी दूर से भरा हुआ दिखाई देता है, लेकिन एक क्षण पहले जो जल था, वह अगले क्षण वही नहीं रहता, उसी प्रकार मनुष्य का जीवन भी पल-पल बदल रहा है।

बीता हुआ समय लौटकर दोबारा नहीं आता। इसलिए वर्तमान समय का सदुपयोग करना आवश्यक है।मनुष्य को अपने जीवन में अच्छे संस्कारों और आध्यात्मिक मूल्यों को स्थान देकर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

इस अवसर पर उपाध्याय रमेश मुनि, दीपेश मुनि ने भी आध्यात्मिक विषयों पर मार्गदर्शन दिया।