मुख्य सामग्री पर जाएँ
बुधवार, 23 सितंबर 2026 उदयपुर · 29°C
Literature News

पुस्तक समीक्षा * बात-बात ख़ुश्बूदार ( निबंध संग्रह )

समीक्षक डॉ. प्रभात कुमार सिंघल लेखक एवं पत्रकार, कोटा

मुख्य बिंदु
  • " मनोवैज्ञानिक रूप से पाठक पर प्रभाव छोड़ने में सफल कृति " "क्यारी-क्यारी में खिले, इतने फूल-गुलाब।
  • रफ़्ता-रफ़्ता हो गई, खुश्बूदार किताब ।।
  • " वय के उस मधुमास को, अब तक सकी न भूल।
  • गंध-गंध था हर दिवस, रात केवड़ा फूल ।।
  • यह है " बात बात खुशबूदार " निबंध कृति का ख़ुश्बूदार का आग़ज़ जो "घर हो ख़ुश्बूदार" निबंध की खूबसूरत बानगी है।
  • यह निबंध आदिकाल से सहचरी रही प्रकृति से प्रेरित हो कर घर को हराभरा और ख़ुश्बूदार रखने के लिए घरेलू बागवानी का प्रभावी संदेश देता है।
WAf𝕏TGin🖨
पुस्तक समीक्षा * बात-बात ख़ुश्बूदार ( निबंध संग्रह )

" मनोवैज्ञानिक रूप से पाठक पर प्रभाव छोड़ने में सफल कृति " "क्यारी-क्यारी में खिले, इतने फूल-गुलाब। रफ़्ता-रफ़्ता हो गई, खुश्बूदार किताब ।।"

वय के उस मधुमास को, अब तक सकी न भूल।

गंध-गंध था हर दिवस, रात केवड़ा फूल ।। यह है " बात बात खुशबूदार " निबंध कृति का ख़ुश्बूदार का आग़ज़ जो "घर हो ख़ुश्बूदार" निबंध की खूबसूरत बानगी है। यह निबंध आदिकाल से सहचरी रही प्रकृति से प्रेरित हो कर घर को हराभरा और ख़ुश्बूदार रखने के लिए घरेलू बागवानी का प्रभावी संदेश देता है।

सखि, वसंत आया।

भरा हर्ष वन के तन, नवोत्कर्ष छाया...... अति ही मृदु गति ऋतुपति की, प्रिय डालों पर, प्रिय आओ, पिक के पावन पंचम में गाओ, वन्दन-ध्वनि गाओ।

प्रकृति सौंदर्य के महान कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की ' वासंती ' कविता पर केंद्रित ललित निबंध " आया वसंत ... वसंत आया " वसंत ऋतुपति के उल्लास को दर्शाता है।

लेखिका वसंत के आगमन से ही आह्लादित हैं और लिखती हैं, " ऋतुराज बसंत का उल्लास, आनन्द, सौन्दर्य अनिर्वचनीय होता है।

शीतल, सुरभित पवन, अलिदल का उन्मन-गुन्जन, सरसों की पीताभा, अमराइयों का गदराया यौवन, दहकते पलाश, गैंदा-गुलाब का लावण्य सब कुछ इतना सम्मोहक कि हर हृदय नर्तन कर उठता है।

इसी मादक, मोहक, उत्फुल्लित मौसम की पंचमी अर्थात् वसंत पंचमी को वे कवि निराला के अंदाज़ में खूबसूरती से वर्णित करती हैं।

निराला जी के काव्य पर केंद्रित " निराला का वात्सल्य : सरोज स्मृति " निबंध में निराला की पुत्री के प्रति अनन्य स्नेह और संवेदनाओं की अभिव्यक्ति को लेखिका ने मार्मिक रूप से अपने शब्दों में उभरा है। "निराला : महाकवि निराला " भी इसी श्रृंखला का निबंध है जिसमें उनके व्यक्तित्व और कृतित्व, जीवन दर्शन, मार्मिक अनुभूतियों, भावाभिव्यंजना, कलात्मकता, जीवन - मूल्य की सृजनशीलता को शिद्दत से शब्दों की मणिमाला में खूबसूरती से पिरोया है।

जयशंकर प्रसाद की कालजयी रचना कामायनी पर दो निबंध " कामायनी में युग चेतना" और " कामायनी का सांस्कृतिक पक्ष " के संदर्भ में संस्कृति के परम्परागत स्वरूप और सामाजिक स्वरूप के समन्वय और कामायनी में यत्र - तत्र सर्वत्र सशक्त रूप से वर्तमान के स्वरों के गूंज की महत्ता को पाठक के समक्ष प्रस्तुत किया है।

महावीर स्वामी के सिद्धांत "क्षमा वीरस्य भूषणम्" के आधार पर "क्षमवीर" निबंध में तिरोहित हो रही क्षमा भावना का विभिन्न प्रसंगों द्वारा महत्व प्रस्थापित किया गया है।

छोटी सावधानियां बड़ी उपलब्धियाँ निबंध में मानव की मूलभूत आवश्यकताओं रोटी,कपड़ा और मकान, प्राण वायु के साथ - साथ पेड़ों की कटाई रोकने, कागज़, पेट्रोल - डीजल की बचत और वायु प्रदूषण को कम करने जैसे छोटे - छोटे मुद्दों को उठा कर सावधानी अपना कर तार्किक रूप से बड़ी उपलब्धियाँ हांसिल करने का संदेश हैं।

आत्म साक्षात्कार निबंध में भौतिकवाद के वर्तमान परिपेक्ष्य में व्यक्ति को स्वयं को पहचानने और वास्तविक सुख की अनुभूति के लिए रामचरितमानस के उद्धरणों से आत्म साक्षात्कार करने के महत्व को प्रतिपादित किया गया है।

पृष्ठ 23 पर सावचेत करते हुए लिखती हैं......... " बाहरी प्रदूषण एवं उपद्रव से कहीं अधिक भयंकर होता है भीतर का प्रदूषण, उपद्रव। जिसे 'आत्म साक्षात्कार' द्वारा ही निराकृत किया जा सकता है।

जिसने भी आत्मसाक्षात्कार कर लिया, उसके सारे इन्द्रिय-केन्द्र खुल जाते हैं। इनके खुलते ही उसे अनिर्वचनीय आत्मानुभूति होने लगती है और सतत प्रयास द्वारा वही बन जाता है बुद्ध और ज्ञानी।"

" मन को वश में करना भी तप है" निबंध में कहा गया है कि यद्यपि यह एक कठिन कार्य है फिर भी प्रयास तो किया जाना चाहिए। मन वश में नहीं होने और समग्र एकाग्रता नहीं होने से आज मानव अनेक समस्याओं से जूझ रहा हैं।

पृष्ठ 26 पर लिखा है........ "समग्र एकाग्रता के अभाव का परिणाम है वर्तमान में दिनों-दिन बढ़ती अशांति, नींद में अधिक सपनों का आना, सोते समय बड़बड़ाना, नींद में चलना, आदि जो इसी बात की ओर संकेत करते हैं कि हम नींद में भी एक भटकाव में, मृगतृष्णा में, इधर-उधर कुलाँचें मारते रहते हैं।

विचारणीय बिन्दु यह है कि जीवन का आनंद, सौन्दर्य समग्र एकाग्रता में ही सन्निहित है, किन्तु वस्तुस्थिति बिल्कुल विपरीत है।

कार्य चाहे छोटा हो या बड़ा जब तक पूर्ण ध्यानावस्था में नहीं किया जाएगा तब तक उसमें पूर्ण सफलता अर्जित की ही नहीं जा सकती और फिर काम करने का आनन्द ही तब आता है जब हम पूर्ण तन्मयता से उसमें जुट जाएँ।

" सामाजिक समस्या प्रधान निबंध " हमारे भविष्य का निर्माता : आज का भ्रूण कल का शिशु होगा" कन्या भ्रूण हत्या के मर्म और कन्या के प्रति आज भी हमारी परंपरागत सोच का दर्पण है।

निबंध इस मुद्दे की गंभीरता को बताते हुए समाज को सावचेत करता है।

चिट्ठी की वक़अत गई, हुये नदारद तार। दूरभाष के दिन लदे, अजब-गजब संचार।

अपने स्वरचित इस दोहे से भूली बिसरी चिट्ठी अर्थात पत्र लिखने की परम्परा पर भी एक निबंध " डाकिए बाबू " उम्दा बन पड़ा है।

ये कुछ बानगी है इस कृति में शामिल छोटे-छोटे 51 निबंधों के ख़ुश्बूदार संसार से। अन्य निबंध के शीर्षक भी स्वयं अपने आपने निबंध का मजबून दर्शाते हैं।

घन-घमंड नभ..., राजस्थानी साहित्य और सावन, सावन-सावन हो गई धरती साहित्याकाश के इन्दु : भारतेन्दु , 'गुलजार', गीतों के गुलजार. मातृभाषा का गौरव, करम प्रधान बिश्व. बच्चों के अवकाश, बालकों के साथ समदर्शी बनें, बालक को बालक ही रहने दो, माता- पिता और बच्चे,नारी संदेह के घेरे में, स्वच्छता, नारीत्व की अग्नि परीक्षा, दहेज प्रथा : माता-पिता भी दोषी, नारी बने, नारी की सहयोगिनी, सपने हों साकार,नारी की दोहरी भूमिका, महिला-श्रम, नारी-विकास में बाधाये, वाचनालय और पाठक, पुस्तकालय : ज्ञान के अक्षय-निधि, जे न मित्र दुख होंयी दुखारी, मानव और सन्तुलन, सुख-दुख सापेक्ष, देवाधिदेव : शिव, निर्मल मन जन..., गणतंत्र : एक चिंतन., वैवाहिक जीवन और संस्कार, संयुक्त परिवार, पर्यावरण : जीवन का आधार ,प्लास्टिक से दूरी, बहुत जरूरी, जल-धन का सम्मान , घर, नगर में खो गये.. बुरा जो देखन मैं चला.., गुस्से को मुल्तवी कर दो....श्रद्धा आस्तिक्यबुद्धी,, आरती का माधुर्य और रामचरितमानस में शृंगार रस निबंध अपने आप में स्वयं बोलते हैं।

निबंधों के आधार पर कह सकते हैं कि इनमें साहित्य, संस्कृति, प्रकृति, प्रेम, आध्यात्म, नागरिक चेतना, व्यक्ति परक, नारी विमर्श, सामाजिक समस्या और आलोचना प्रधान विषयों को निबंध लेखन का आधार बनाया गया है।

निबंधों में लेखिका का चिंतन, समीक्षकीय शिल्प, प्रस्तुतीकरण, विषय पर पकड़ और दृष्टिकोण, लेखन की प्रभावोत्पादकता साफ महसूस की जा सकती है। भाषा यूं तो सहज और प्रवाहमान है पर क्लिष्ट शब्दों के साथ हिंदी, उर्दू आदि भाषा के शब्दों का प्रयोग भी किया गया है।

विषय को समझाने की दृष्टि से दिए गए उद्धरण विषय पर मजबूत पकड़ बनाते हैं। उद्देश्य पूर्ण निबंध मनोवैज्ञानिक रूप से पाठक पर प्रभाव छोड़ने में सफल रहे हैं।

प्रकाण्ड विद्वान , वैश्विक स्तर के महान व्यंग्यकार एवं प्रख्यात साहित्यकार डॉ. हरीश नवल ने फ्लैप पर इस कृति को विशिष्ट इंद्रद्धनुषीय निबंध संग्रह बताते हुए लिखा है," कहा जाता है 'गद्य कवीनां निकषं वदन्ति' जिसके अनुसार डॉ. कृष्णा कुमारी कसौटी पर खरी उतरती हैं।

'कामायनी' जैसी सांस्कृतिक और घोर साहित्यिक कृति पर सार्थक लिखने वाला विशेष ही हो सकता है। संस्कृति परक निबंध लेखिका की बहुज्ञता और मानव मन की विश्लेषिका एवं उनकी सांस्कृतिक चेतना को दर्शाते हैं।

कृष्णा कुमारी जी का कवित्व इन निबंधों में भी उजागर है। अपने कवितांशों से उन्होंने स्थान-स्थान पर निबंधों को समृद्ध किया है।

उनके विषय युगीन और शैली व्याख्यात्मक है। यह निबंध संग्रह बंद आँखों को खोलता है।

पाठक के असमंजसों को दृष्टि देता है।"

प्राचार्य व साहित्यकार प्रो. (डॉ.) अनिता वर्मा पुस्तक की भूमिका में लिखती हैं, " लेखिका को दृष्टि उन सभी विषयों, मुद्दों, घटनाओं पर जाकर ठहरती है जिन पर समसामयिक संदर्भों में विचार करना अत्यंत आवश्यक है।

इनके भीतर के संवेदनशील रचनाकार ने मनुष्य को केंद्र में रखकर उससे जुड़े समस्याएँ, विचार, नैतिक मूल्य, समसामयिक संदर्भों को अपने निबन्धों में बहुत प्रभावी ढंग से लिखा है, सोदाहरण पुष्ट भी किया है।

संवेदना से जुड़कर ही निबन्ध प्रेषणीय और प्रभावी बनते हैं। डॉ. कृष्णा के निबन्ध इस कसौटी पर पूर्ण और प्रभावी हैं।

इनके निबन्ध मिश्रित है किन्तु विचारात्मक और भावात्मकता प्रमुख है। ये निबन्ध सामाजिक सरोकार का निर्वहन करते हुए तर्कशीलता के साथ विषय को विश्लेषित भी करते हैं।

भाव और शिल्प की दृष्टि से ये निबन्ध सुसंगठित, व्यवस्थित, सहज, सरल और प्रभावी हैं। इन निबन्धों में उद्धृत छोटे-छोटे उदाहरण से निबन्धों में रोचकता समाहित हो गई है।

पाठक इन्हें पढ़कर निश्चित रूप से संवेदना के स्तर पर विषय से अवश्य जुड़ाव महसूस करेंगे।"

पुस्तक का आवरण पृष्ठ अत्यंत आकर्षक है जिसमें प्रकृति के साथ रंग बिरंगे पुष्पों के मध्य खड़ी एक बालिका शीर्षक को साकार कर रही हैं। पेपर और प्रिंटिंग की गुणवत्ता उच्च स्तर की है।

पुस्तक : बात-बात ख़ुश्बूदार विधा : निबंध रचनाकार : डॉ. कृष्णा कुमारी, कोटा प्रकाशक : साहित्यागार, जयपुर मूल्य : 395 ₹ प्रकार : हार्डबाउंड पृष्ठ : 203 ISBN : 978- 93- 5947 - 376- 5 ------------------