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मठाधीश

कहानीकार विजय जोशी, कोटा, राजस्थान मोबाइल : 94602 37653

कहानीकार विजय जोशी, कोटा, राजस्थान मोबाइल : 94602 37653

मुख्य बिंदु
  • प्रिय सुबोध, स्हाशीर्वाद !
  • तुम्हारी पुस्तक "समकालीन" के विमोचन समारोह के कार्ड मिल गये हैं।
  • विमोचनकर्ता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.
  • विराट स्वरूप का कार्ड आज ही उनके निवास पर दे आऊँगा।
  • तुम्हें पुनः आने की आवश्यकता नहीं हैं।
  • वैसे भी तुम एक सप्ताह पहले उनसे मिलकर गये ही हो।
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मठाधीश

जयपुर, 30 जून।

प्रिय सुबोध, स्हाशीर्वाद ! तुम्हारी पुस्तक "समकालीन" के विमोचन समारोह के कार्ड मिल गये हैं।

विमोचनकर्ता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. विराट स्वरूप का कार्ड आज ही उनके निवास पर दे आऊँगा। तुम्हें पुनः आने की आवश्यकता नहीं हैं।

वैसे भी तुम एक सप्ताह पहले उनसे मिलकर गये ही हो। उन्हें कोई इतर विचार मन में नहीं आयेगा।

तुम निश्चिंत रहो। वे बहुत व्यावहारिक व्यक्ति हैं।

तुम्हारी वांछनां पर डॉ. प्रमिला शाह, प्रशांत 'सागर', डॉ. अजय नयन, प्रो. जयनारायण, दिनकर वर्मा, सुनीता श्रृंगी, डॉ. अनुपम सहाय इत्यादि को भी कार्ड समय पर पहुँचा दूंगा डॉ. विराट को तुम्हारी पुस्तक अच्छी लगी।

रचनाओं को भी सराहा है। उन्होंने तुममें अपार संभावनाओं का भंडार माना है।

उनकी इस टिप्पणी से मेरा गौरवान्वित होना स्वाभाविक है। डॉ. विराट विमोचन से एक दिन पूर्व ही जयपुर सुपरफास्ट से कोटा पहुँच जायेंगे।

तुम्हें अधिक औपचारिक होने की आवश्यकता नही है। उनकी बेटी बल्लभनगर में ही रहती है।

वे वहीं पर ठहरेंगें। तुम तो उनसे मिल ही चुके हो।

तुमने बार-बार संकोचवश बुरा मानने वाली बात लिखी है। तुम अत्यधिक भावुक हो।

ऐसा क्यों सोचते हो कि इतने बड़े हैं, कैसा लगेगा ! तुम अपना ध्यान आयोजन पर रखो।

यहाँ सब ठीक है। तपन अधिक है। कोटा में तो अत्यधिक होगी। दौड़-भाग में ध्यान रखना। आदरणीय वासुदेवजी व भाभीजी को प्रणाम। बेटी प्रियंका और बहू को स्नेह।

तुम्हारा ही अनंत 'आकाश आदरणीय अनंत साहब, सादर अभिवादन ।

आपका पत्र आज ही मिला। आभारी हूँ। आप ही के दिशा निर्देश और आशीर्वाद से इस योग्य हो पाया हूँ। डॉ. विराट साहब की टिप्पणी पर मुझे दिशाबोधीय प्रेरणा और सम्बल मिला है। विमोचन की तैयारियों में लगा हूँ। स्थानीय साहित्यकारों, साहित्य प्रेमियों को कार्ड वितरण का कार्य चल रहा है। सभी घर वाले लग रहे हैं। यहाँ सब ठीक है।

आंटी जी का स्वास्थ्य कैसा है हो सके तो विमोचन समारोह में उन्हें भी लेते आनास्थान परिवर्तन हो जायेगा, हवा-पानी बदलेगी तो कुछ अच्छा महसूस करेंगी। कुछ दिन हमारे यहाँ रहेंगी तो अच्छा लगेगा। आपने 'समकालीन' पुस्तक पर आलेख तैयार कर लिया होगा। शेष शुभ।

आपका सुबोध जयपुर, 7 जुलाई।

प्रिय सुबोध, तुम्हारा पत्र मिला। समाचार जानकर प्रसन्नता हुई। तुम जीवन में उन्नति के पथ पर अग्रसर रहकर सफलता के सोपान तय करो और अपने माता पिता की सेवा कर उनके सान्निध्य में अपना जीवन सफल करो।

तुम्हारी आंटी जी की तबियत इन दिनों ठीक नहीं है। आज ही अस्पताल ले गया था।

डॉ. साहब ने दवाइयाँ दे दी है। परन्तु हर बार की तरह उन्होने तनाव रहित वातावरण बनाये रखने और सहज व्यवहार की सलाह देकर बीते पलों की कटुता से दूर रहने की बात कही है।

खेद के साथ लिख रहा हूँ कि मैं 10 जुलाई को कोटा न आ सकूंगा। तुम्हारी आंटी जी को ऐसी हालत में अकेला नहीं छोड़ सकता।

तुम तो जानते ही हो वे मुझे कुछ क्षण भी आँखों से ओझल नहीं होने देती। कुछ लेने भी जाता हूँ तो शीघ्र वापस आने की हिदायत देती हैं।

इस बार तो वे चलने-फिरने में भी असमर्थता जता रही हैं।

आज बातों ही बातों में वे पुनः अपना पुराना समय याद कर अपने बेटे सावन को और उसकी बहू बरखा को कोसने लगी। बस !

पूरा वातावरण कसैला हो गया। तुम छोटे हो परन्तु समझदार हो, मेरे लेखन सहकर्मी हो, साथ ही मेरे प्रिय, बेटे के समान हो।

तुमसे ही मैं संवाद के सहारे मन हल्का कर लेता हूँ। अन्यथा समाज में तो दुःखों को बांटने पर लोग मजा ले लेकर बात का बतंगड़ बनाकर उछालते रहते हैं।

यहीं कारण है कि तुम्हारी आंटी जी जब किसी से ऐसी-वैसी बातें सुनती हैं तो उनका धैर्य का बांध टूट कर अपने बेटे- बहू के प्रति नफरत, क्रोध का सैलाब बहा देता हैखैरतुम भी सोच रहे होंगे कि मैं भी हर बार की तरह वहीं राग अलापने बैठ गया।

डॉ. विराट साहब निश्चित दिन पहुँच रहे हैं। उन्होंने अपना उ‌द्बोधनयुक्त आलेख तैयार कर लिया है। मैंने भी तुम्हारी पुस्तकं पर जो आलेख "समकालीन ययार्थ की सहज प्रस्तुति है- 'समकालीन' पुस्तक में" तुम्हें भेज रहा हूँ। जैसा चाहो वैसा करना। यह तुम्हारी परिस्थिति और सोच पर निर्भर है।

विमोचन के पश्चात् समाचारों से अवगत करवाना। समारोह की सफलता की कामना लिये, परिवार में सभी को यथा योग्य सहित।

तुम्हारा अनंत 'आकाश' कोटा, 10 जुलाई।

परम् श्रद्धेय अनंत 'आकाश' साहब, सादर अभिवादन !

आपका पत्र आज ही सवेरे ग्यारह बजे मिला। आपके न आने की खबर से मैं ही नहीं, पूरा परिवार एकबारगी तो स्तब्ध रह गया। क्या करेंगे, कैसे करेंगे, अब क्या होगा, कौन सम्हालेगा, कैसा रहेगा इत्यादि प्रश्नों के जंगल से हमारा घर घिर गया। पापा जी ने ही तब वस्तु स्थिति से साक्षात्‌कार कर आगे बढ़कर सँभालने की बात कही। आपकी बहू सुधा ने मुझे सम्बल प्रदान कर कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए प्रेरित किया।

आप तो जानते हैं जीवन में प्रेरणात्मक दिशा-बोध देकर, व्यक्तित्व को निखारने वाले बहुत कम लोग हैं।

आप जैसे व्यक्ति की सहज प्रेरणादायी वार्ता और संवाद के साथ समय-समय पर सान्निध्य के सहारे ही प्रतिभाओं को उचित अवसर मिलता है और जब सफलता की प्रथम सीढ़ी पर ही आप का न आकर ढाँढस न बंधा पाना और आशीर्वाद प्रदान न कर पाना मुझे एक क्षण के लिए निराशा के घेरे में डाल गया।

यहाँ पर भी आपके विचार और संवाद की संप्रेषणीयता से उपजी शक्ति धारा ने ही मुझे सम्हाल कर संचेतन अवस्था को प्राप्त करायाऊहा-पोह की स्थिति में यथास्थिति को आत्मसात् कर कार्यक्रम सम्पन्न कराया।

रह-रह कर आपका सान्निध्य पाने की ललक ने बैचेन किये रखाआपके आलेख का वाचन नवोदित लेखिका सपना शरण से करा लिया था। सभी वक्ताओं ने कृति की प्रशंसा के साथ ही निरन्तर लेखन कर कलम की धार को पैना करने और सफलता की ओर अग्रसर रहने की बात कही।

मित्रों, साहित्यकारों, साहित्य प्रेमियों ने भी बधाइयों के स्वर को मुखरित किया। मम्मी पापा सहित परिवार के सभी सदस्य मेरी उपलब्धि पर गर्वित हुएकार्यक्रम आपके आशीर्वाद से सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया।

आंटी जी की तबियत कैसी है ? उनके साथ-साथ अपना भी ध्यान रखना।

और सब ठीक है। अनंत साहब! मैं पत्र को विराम दे रहा था कि थकान होने के बावजूद विमोचन की सफलता और सम्पन्नता के पहले के तमाम सच को खुलासा करने के लोभ का संवरण न कर सका इसलिए लिखने बैठ गया।

लिखने का लोभ नहीं, सच के उ‌द्घाटन का मेरा कर्त्तव्य अंगड़ाइयाँ लेने लगा है। आप ही ने मुझे प्रेरणा दी, आप ही के आशीर्वाद से इस योग्य हो पाया।

विमोचन पर बड़े, स्थापित, पुरस्कृत और वरिष्ठ साहित्यकारों को वक्ता, मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि, अध्यक्ष बनाने की परम्परा का निर्वहन मैंने भी किया, परन्तु वर्तमान के यथार्थ का खुलासा भी इस प्रक्रिया से गुजरने के बाद मिला।

आप कहते हो कि समाज में कई लोग जो अपरोक्ष-परोक्ष प्रेरणादायी बनकर प्रतिभाओं को सामने लाने का कार्य करते हैं।

आप ही ने कुछ साहित्यकारों के नाम मुझे बताये थे और मैंने समय-समय पर उनका सान्निध्य ग्रहण भी किया, परन्तु एक-दो साहित्यकारों की टिप्पणी ने मुझे अंत समय में झकझोर के रख दिया।

यह सही है कि आगे बढ़ने में कई रुकावटें आती हैं, उनका सामना भी करना पड़ता है, परन्तु अप्रत्याशित सायास की गई प्रतिक्रिया स्वरूप टिप्पणी के हालात से टूट जाना स्वाभाविक है, परन्तु इस स्थिति को मैंने चुनौती माना और अपने कार्य में जुट गया।

आप सोच रहे होंगे पहेलियाँ बुझा रहा हूँ। नाम तो क्या लिखूँ।

आपको भी दुःख होगा और मुझे भी सही नहीं लग रहाआप कोटा आएंगे तो स्वयं ही पता चल जायेगामैं उनके पास कार्ड देने गया। किन्तु वे घर पर नहीं थे।

मैंने विमोचन से एक दिन पूर्व 9 जुलाई को उनसे फोन पर बात की तो मैं दंग रह गया। उन्होंने छूटते ही एक बात कही- "अरे भई, तुमने डॉ. विराट को विमोचन के लिए बुलाया।

यह सही नहीं है। वह तो दूसरे समूह का व्यक्ति है।

तुमने क्या किया ? हमारी संस्था के कोई भी साहित्यकार नहीं आयेंगे।

मैं भी नहीं। तुम्हें हमसे कुछ सलाह लेनी चाहिये थी।" मैं मौन उनकी बात सुनता रहा परन्तु अंत में कह दिया, वह भी विनम्रता से- “अब तो बुला लिया, आपका नाम भी कार्ड में छप गया है, अब जैसा आप उचित समझें, करें।"

मेरा विचलित होना स्वाभाविक था। मुझे भी थोड़ा सा क्रोध ने आ घेरा और बड़बड़ाया - आयें तो आयें, या न आयें, मुझे तो कार्य करना है, परन्तु आकाश साहब मुझे पहली बार साहित्य के सृजन पक्ष का यह पहलू नजर आया साहित्यिक धड़े बाजी का प्रखर रूप अपनी पराकाष्ठा के आवरण को गया।

यही नहीं, विमोचन के दिन भी कुछ लोग दबे स्वर में डॉ. विराट के आगमन पर प्रश्न चिह्न लगाते सुनाई दिये। कुछ तो कह रहे थे- "गेदरिंग बढ़ाने के लिए उनका नाम छपवा दिया।

कुछ खुसर-फुसर में तल्लीन दिखे कि- "इतने बड़े साहित्यकार हैं और यहाँ कोटा में आयेंगे वो भी इसकी पुस्तक के विमोचन पर।” मुझे जब ऐसी वार्तालाप के स्वरों को बताया गया तो मेरा मन उत्साह से वंचित होता प्रतीत हुआ।

लेकिन मैंने स्वयं को सम्हालकर परिस्थिति से समझौता किया। खैर !

व्यक्ति परखने की प्रक्रिया का एक अध्याय मेरे सामने सम्पन्न हुआ।

आप सोच रहे होंगे पत्र लिख रहा हूँ अथवा लेख मेरे तो साहित्यिक जीवन का प्रारम्भ है। आपने तो जीवन ही साहित्य सन्दर्भों में समर्पित कर रखा हैआप किसी भी पहलू से अनजान नहीं है। फिर भी मैंने लिख दिया है। शेष मिलने पर। हो सकता है अगले पखवाड़े जयपुर आऊँ। आंटी जी को प्रणाम !

आपका ही सुबोध जयपुर, 21 जुलाई।

प्रिय सुबोध, स्नेह। तुम्हारा 10 जुलाई का पत्र यथा समय मिला।

पत्रोत्तर समय पर न दे सकने का कारण है, तुम्हारी आंटी जी की अधिक खराब हो जाने के कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा एक सप्ताह में ठीक होकर घर पर आई।

मर्ज वही पुराना, अधिक तनाव तथा क्षोभ से दिल का माइनर दौरा पड़ा। डॉक्टर ने सम्हाल लिया।

जीवन में कोई भूल हो गई है जिसका खामियाजा, भुगत रहा हूँ शायद ! मूलतः व्यक्ति अपने परिवेश को छोड़ नहीं सकता और उससे उपजी मनोवृत्ति को हटा नहीं सकता।

आकांक्षा और अपेक्षा के बीच मोहित व्यक्ति बहुत कुछ ओर पाने की लालसा में विद्रोही होता जाता है तथा अपने सुखद पलों को, व्यर्थ संवाद के साथ बेवजह उपजी घृणा, क्रोध से नष्ट करता रहता है।

इन्हीं सन्दर्भों का जीवंत उदाहरण है मेरी पत्नी और बच्चे । खैर !

विमोचन समारोह की सफलता के प्रकाश के पीछे के अंधकार का ब्यौरा तुमने प्रस्तुत किया। यह कोई नई बात नहीं हैं।

अभी तुम्हारा पदार्पण है। कदम तो बढ़ने दो, पायदान तो छुओ।

लक्ष्य को तो भेदो, देखो! नित नये अनुभवों से सामना होगा।

इसमें तुम्हारे स्वाभिमान को ठेस लगेगी, निराशा के घनघोर बादल छायेंगे, टांग खिंचाई होगी, आलोचना के मुखर स्वर उभरेंगे, मान्यता तक की बात आयेगी, लेकिन मुझे विश्वास है तुम्हारा दृढ़ और कर्मशील रहने की तुम्हारी प्रवृत्ति इन तमाम दायरों को पार कर सफलता के तट पर ले जायेगी।

सुबोध ! व्यक्ति जब भी अपनी प्रतिभा के बल पर आगे बढ़ता है तो उसे कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

समाज है, इसमें कई पहलुओं से हमें दो-चार होना पड़ता है। अभी तो तुमने साहित्यिक सन्दर्भों की मठाधीश ही देखें हैं।

समाज में हर कोई अपने साहित्यिक कुनबे को प्रसारित देखना चाहता है। तुम धर्म को देख लो, धर्म के मठाधीश अपनी तूती बजाते हैं तो राजनीति के मठाधीश अपनी ढपली।

परिवार में एक अपने को मठाधीश समझता है तो संगीत कला के लोग अपनी राग अलाप कर अपने समूहाधीश-मठाधीश को खुश करते रहते हैं। मठाधीशों का ही जमाना है जिसे जब मौका मिले अपनी चलाने से नहीं चूकता है।

अवसरवादी प्रसंगों का घटाटोप अंधकार चहुँओर फैलता है। तुम्हें इसी अंधकार को चीर कर प्रकाश के पुंज तक पहुँचना है।

निराशा या हताशा को अंगीकार करने की आवश्यकता नहीं है। तुमने उन सज्जन का नाम नहीं लिखा, परन्तु संकेत रूप से मुझे कुछ आभास हुआ है।

सुबोध ! यह साहित्य का क्षेत्र है। यहाँ साहित्य के बरगद चहुँओर फैले हैं।

ये अपनी छत्र- छाया में किसी नवोदित साहित्यकार पौधे को पनपने नही देंगे। तुम्हें खुद आगे बढ़ना है और अपनी प्रतिभा को चमकाना है।

पर बरगदों की भी एक उम्र होती है। यहाँ साहित्य भी धड़ेबाजी से मुक्त नहीं है।

अब वह समय नहीं रहा जब साहित्यिक कृतित्व के प्रहारों से शासन, प्रशासन असामाजिक परिवेश की नींव हिल जाती थी। आज राजनीति के गलियारों से होकर साहित्य का रथ हांका जा रहा है।

तुम्हारा यह पड़ाव अनुभूति का कटु पल रहा। इसने तुम्हें समझने-परखने का अवसर प्रदान किया है। तुम्हें इस अवसर से बहुत कुछ प्राप्त होगा उसे ग्रहण करो और कर्त्तव्य के पथ पर बढ़ते रहो। मेरा सहयोग तुम्हारे साथ रहेगा। तुम सोच रहे होंगे कि मैंने आगे बढ़ने, भूल से सीख लेकर वर्तमान को सुधारने की बात कहकर मूल्यों को आत्मसात करने की पहल करने को लिखा, परन्तु मैं ही पारिवारिक धुरी पर असफलता की श्रृंखला से घिर गया।

पत्र पढ़ते-पढ़ते ऐसा विचार तुम्हारे मन में आना स्वाभाविक है।( कुहासे का सफ़र संग्रह में)