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सही समय पर सही निर्णय से ही सफलता : प्रशांत अग्रवाल

नारायण सेवा संस्थान में 'अपनों से अपनी बात' का समापन

नारायण सेवा संस्थान में 'अपनों से अपनी बात' का समापन

मुख्य बिंदु
  • नारायण सेवा संस्थान में चार दिवसीय 'अपनों से अपनी बात' कार्यक्रम का मंगलवार को समापन हुआ।
  • इसमें देश के विभिन्न राज्यों से दिव्यांगता सुधार सर्जरी एवं कृत्रिम अंग व कैलिपर्स लगवाने आए दिव्यांगजन और उनके परिजनों से संस्थान अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने संवाद करते हुए उन्हें जीवन में कभी हार न मानने की प्रेरणा दी।
  • उन्होंने कहा कि जीवन में सुख-दुःख का एक चक्र है, जो सदैव घूमता रहता है।
  • ऐसे में हमें संतुलित रहते हुए अपने मार्ग को चिन्हित करना और आगे बढ़ना है।
  • उन्होंने कहा कि समाज और राष्ट्र में जितने भी प्रेरणास्पद व्यक्तित्व हुए हैं, उन्होंने सही समय पर सही निर्णय किए, इसलिए वे सफल हो पाए।
  • निर्णय सही हो लेकिन वह गलत समय पर लिया जाय तो नुकसानदेह साबित होगा।
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सही समय पर सही निर्णय से ही सफलता : प्रशांत अग्रवाल

उदयपुर । नारायण सेवा संस्थान में चार दिवसीय 'अपनों से अपनी बात' कार्यक्रम का मंगलवार को समापन हुआ। इसमें देश के विभिन्न राज्यों से दिव्यांगता सुधार सर्जरी एवं कृत्रिम अंग व कैलिपर्स लगवाने आए दिव्यांगजन और उनके परिजनों से संस्थान अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने संवाद करते हुए उन्हें जीवन में कभी हार न मानने की प्रेरणा दी।

उन्होंने कहा कि जीवन में सुख-दुःख का एक चक्र है, जो सदैव घूमता रहता है। ऐसे में हमें संतुलित रहते हुए अपने मार्ग को चिन्हित करना और आगे बढ़ना है।

उन्होंने कहा कि समाज और राष्ट्र में जितने भी प्रेरणास्पद व्यक्तित्व हुए हैं, उन्होंने सही समय पर सही निर्णय किए, इसलिए वे सफल हो पाए। निर्णय सही हो लेकिन वह गलत समय पर लिया जाय तो नुकसानदेह साबित होगा।

प्रभु विवेक देते हैं, लेकिन उसका उपयोग मनुष्य को स्वयं करना होता है। गुरु मार्ग बताते हैं, लेकिन उस पर चलने या न चलने का निर्णय शिष्य का अपना होता है।

चिकित्सक दवा लिखते हैं, लेना न लेना रोगी पर निर्भर होता है। कुल मिलाकर निर्णय लेते समय हमारे भीतर विवेक, समय और नैतिक मूल्यों का दीपक जलते रहना चाहिए।

सही निर्णय स्वयं को ही नहीं, बल्कि समाज और भावी पीढ़ियों तक को प्रभावित करते हैं। इसलिए पूरे सोच-विचार से हर कदम उठाने की आवश्यकता है।

इस संवाद कार्यक्रम में प्रकाश मेघवाल (इंदौर), विक्रम सिंह (शाहजहांपुर), मुबारक हुसैन (निम्बाहेड़ा), मुकेश कुमार (वैशाली, बिहार) आरती मीणा (प्रतापगढ़) और सुभाष सोलंकी (बांसवाड़ा) आदि ने भी अपनी दिव्यांगता से पूर्व और उसके बाद के जीवन संघर्ष और अनुभवों को साझा किया।