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Udaipur News

संस्कृत भारती ने संभाली जल व्यवस्था, सेवा-संकल्प का दिया प्रेरक परिचय

मुख्य बिंदु
  • महाराणा प्रताप जयंती के अवसर पर गांधी ग्राउंड स्थित भंडारी दर्शक मंडप में आयोजित होने वाली विराट सभा एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूजनीय सरसंघचालक श्री मोहन भागवत जी के उदयपुर प्रवास के तहत संस्कृत भारती, उदयपुर द्वारा श्रद्धालुओं एवं आगंतुकों के लिए जल व्यवस्था का दायित्व विद्पूवत्र्णहैवान ग्राउंड में कहा भोजन जल आदि व्यवस्था की गई जिसमें संस्कृत भारती के कार्यकर्ताओं ने जल व्यवस्था संभालते हुए समर्पण, अनुशासन एवं सेवा-भाव का परिचय दिया।
  • विद्याभवन प्रांगण में संचालित इस सेवा कार्य में संस्कृत भारती के कार्यकर्ता संस्कृत एवं संस्कृति के संवर्धन के साथ-साथ समाजोपयोगी सेवा कार्यों में भी अपनी सक्रिय भूमिका का परिचय दे रहे हैं।
  • संगठन के कार्यकर्ताओं ने आगंतुकों को शीतल पेयजल उपलब्ध कराने हेतु सुव्यवस्थित व्यवस्था की है, जिससे सेवा, संस्कार और संगठनात्मक समर्पण का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत हो रहा है।
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संस्कृत भारती ने संभाली जल व्यवस्था, सेवा-संकल्प का दिया प्रेरक परिचय

उदयपुर। महाराणा प्रताप जयंती के अवसर पर गांधी ग्राउंड स्थित भंडारी दर्शक मंडप में आयोजित होने वाली विराट सभा एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूजनीय सरसंघचालक श्री मोहन भागवत जी के उदयपुर प्रवास के तहत संस्कृत भारती, उदयपुर द्वारा श्रद्धालुओं एवं आगंतुकों के लिए जल व्यवस्था का दायित्व विद्पूवत्र्णहैवान ग्राउंड में कहा भोजन जल आदि व्यवस्था की गई जिसमें संस्कृत भारती के कार्यकर्ताओं ने जल व्यवस्था संभालते हुए समर्पण, अनुशासन एवं सेवा-भाव का परिचय दिया।

विद्याभवन प्रांगण में संचालित इस सेवा कार्य में संस्कृत भारती के कार्यकर्ता संस्कृत एवं संस्कृति के संवर्धन के साथ-साथ समाजोपयोगी सेवा कार्यों में भी अपनी सक्रिय भूमिका का परिचय दे रहे हैं। संगठन के कार्यकर्ताओं ने आगंतुकों को शीतल पेयजल उपलब्ध कराने हेतु सुव्यवस्थित व्यवस्था की है, जिससे सेवा, संस्कार और संगठनात्मक समर्पण का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत हो रहा है।

इस अवसर पर विभाग संयोजक दुश्यंत नागदा, महानगर मंत्री नरेंद्र शर्मा, विस्तारक गौरव साहू, जिला सह मंत्री कुलदीप जोशी सहित अनेक कार्यकर्ता सेवा कार्य में निरंतर जुटे  रहे।
संस्कृत भारती का यह सेवा-संकल्प भारतीय संस्कृति के उस आदर्श को साकार करता है जिसमें “नर सेवा ही नारायण सेवा” का भाव सर्वोपरि माना गया है।