मुख्य सामग्री पर जाएँ
सोमवार, 21 सितंबर 2026 उदयपुर · 29°C
Udaipur News

पुण्य के सामने, कंस की शक्ति हारी‘आचार्य ज्ञानचन्द्र महाराज

मुख्य बिंदु
  • न्यू भूपालपुरा सिथत अरिहंतनगर में ’जैनाचार्य ज्ञानचंद्र महाराज ने चातुर्मास प्रवचन के दौरान कहा कि श्री कृष्ण जीवन, वर्तमान के लोगों के लिए भी अत्यंत उपयोगी है।
  • वे क्षायिक सम्यक् दृष्टि थे।
  • एक भव करके 12 वें उमभ नामक तीर्थंकर बनने वाले हैं जबकि श्री कृष्ण के भव में एक नवकारसी, पोरसी, सामायिक तक नहीं की, लेकिन उनका व्यवहार, आचरण इतना न्याय युक्त और धार्मिक था कि वे तीर्थंकर बनने जा रहे हैं।
  • उन्होंने अपने जीवन में न्याय और धर्म की सुरक्षा के लिए साम, दाम, दंड, भेद को भी अपनाया था।
  • यह आज के युग में समझने की जरूरत है।
  • जब श्रीकृष्ण गर्भ में आए तो देवकी को सात महास्वप्न आए हैं।
WAf𝕏TGin🖨

उदयपुर। न्यू भूपालपुरा सिथत अरिहंतनगर में ’जैनाचार्य ज्ञानचंद्र महाराज ने चातुर्मास प्रवचन के दौरान कहा कि श्री कृष्ण जीवन, वर्तमान के लोगों के लिए भी अत्यंत उपयोगी है।

वे क्षायिक सम्यक् दृष्टि थे। एक भव करके 12 वें उमभ नामक तीर्थंकर बनने वाले हैं जबकि श्री कृष्ण के भव में एक नवकारसी, पोरसी, सामायिक तक नहीं की, लेकिन उनका व्यवहार, आचरण इतना न्याय युक्त और धार्मिक था कि वे तीर्थंकर बनने जा रहे हैं।

उन्होंने अपने जीवन में न्याय और धर्म की सुरक्षा के लिए साम, दाम, दंड, भेद को भी अपनाया था। यह आज के युग में समझने की जरूरत है।

जब श्रीकृष्ण गर्भ में आए तो देवकी को सात महास्वप्न आए हैं। श्री कृष्ण के गर्भ में आने के साथ ही देवकी में विशिष्ट शक्ति का संचार हुआ। श्री कृष्ण के जन्म लेने के साथ ही हाथों की हथकड़ियां, पैरों की बेड़ियां टूट गई। वसुदेव, श्री कृष्ण को बचाने टोकरी में लेकर चलने लगे तो ताले टूट गए। सारे पहरेदार नींद में हैं।

वासुदेव ने बालक को उठाया और चल दिया। पहरेदार मृतक की भाँति पड़े करते ले रहे थे ।

वे आगे बढ़े भवन के द्वार अपने आप खुल गए। वर्षा की अन्धेरी रात थी।

बादल छाये हुए थे। वर्षा का धीमा दौर चल रहा था।

देवों ने छत्र धारण कर बालक पर तान दिया। कुछ देव, दीपक धारण कर आगे चलने लगे।

नगर-द्वार के समीप पहुँचने पर देवों ने परकोटे का द्वार खोल दिया। द्वार के निकट ही राजा उग्रसेनजी एक पिंजरे में बन्द थे।

कंस ने उन्हें बन्दी बना कर रखा था। उन्होंने पूछा- कौन है?

वसुदेवजी ने कहा-यह कंस का शत्रु है - उन्होंने बालक को दिखाया और कहा राजन् ! वह बालक आपके शत्रु का निग्रह करेगा और इसी से आपका उद्धार होगा।

आप इस बात को गुप्त ही रखें। उग्रसेन ने कहा- बहुत अच्छा।

आप इसे तत्काल बाहर निकालें और किसी सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दें।

यहां पर देवों ने परोक्ष सहयोग किया। चाहते तो श्री कृष्ण के छः भाइयों को, पहले सुलसा के यहां पहुंचाया तो श्री कृष्ण को भी पहुंचा सकते थे।

लेकिन ऐसा नहीं किया। क्योंकि पहले के छः भाई तो चरम शरीर जीव थे, उन्हें तो साधना करके मोक्ष में जाना था जबकि श्री कृष्ण को तो पौरुष दिखाना था।

इसलिए देवता ने पुरुषार्थ को महत्व दिया और यह भी बता दिया कि देवता के भरोसे मत बैठो। पुरुषार्थ करो तो देवता परोक्ष रूप में सहयोग करेंगे।

जो कि उन्होंने किया ।

यशोदा, देवकी सहेली थी। आज आचार्य प्रवर ने जन्माष्टमी पर प्रवचन दिया। अरिहंत मार्गी महिला मंडल ने श्रीकृष्ण पर शानदार प्रस्तुति की।