वरिष्ठ गीतकार जितेन्द्र निर्मोही की कृति "मेरे गीत और नवगीत" चर्चा में है। जितेन्द्र निर्मोही, बाल कवि बैरागी, चंद्रसेन विराट जैसे बच्चन की परवर्ती गीतकार पीढ़ी से निकलकर सामने आते हैं।
इस कृति पर प्रख्यात समालोचक और व्यंग्यकार सुभाष चंदर का अपने "पुस्तकनामा" का कथ्य समीचीन है कि जितेन्द्र निर्मोही ने संग्रह के गीतों को अनुभव की हांडी में पकाकर दिया है।
यह गीत अनुभव की आँच में पके हर मौसम के गीत हैं। ये गीत आत्मा से गाये जाने वाले गीत हैं।
जिसे आत्मा ही गाना चाहती है।"
जैसा कि मैं जितेन्द्र निर्मोही को मैं समझ पाई हूँ वो अपनी अभिव्यक्ति को शब्दों की गहराई में जाकर प्रस्तुत करते हैं। उनके गीत और नवगीत का माधुर्य सर्वविदित है। प्रोफेसर राधेश्याम मेहर के अनुसार उन्हें पढ़ने और सुनने का एक अलग ही सुख है।
गीत ऐसी काव्य विधा है जो अपनी सरलता और सहजता से मानस की गहराइयों में उतरती है। जितेन्द्र निर्मोही के गीतों में कथ्य की ग्राह्यता उनके लेखन की विशिष्टता है। वो गीतों द्वारा सरल और उन्नत जीवन जीने की सीख देते दिखाई देते हैं। यूं गीतकार का उद्देश्य भी समष्टि का हित साधना ही होता है।
कृति "मेरे गीत और नवगीत" में सैंतीस गीत और इक्कीस नवगीत संग्रहित हैं। ये नवगीत देश के जाने माने नवगीतकार कुमार रवीन्द्र के निर्देश पर लिखे गये हैं। जितेन्द्र निर्मोही नवगीतों के संबंध में नईम, कुमार रवीन्द्र, हरीश निगम, शिवानंद सिंह, बाल कवि बैरागी चन्द्रसैन विराट,तारा प्रकाश जोशी,नमोनाथ अवस्थी,अजहर हाशमी आदि का उल्लेख समय- समय पर करते रहे हैं।
लेखक के गीतों में विषय वैविध्य है। इनमें नायक- नायिका संवाद, ग्राम्य जीवन की स्मृतियाँ, मौसम, आध्यात्मिक चिंतन, दर्शन, युगबोध, जीवन मूल्यों की गिरावट, जीवन मूल्यों की सीख, प्रकृति का दोहन, परिवार, हिन्दी भाषा, पुरासम्पदा आदि पर उनकी अपनी सोच और चिंतन, संवेदना, कल्पना शक्ति, अनुभव एवं भावाभिव्यक्ति का चरम दिखाई देता है।
आपके गीत विभिन्न रसों से समृद्ध काव्यानन्द सरित् संगम हैं। जो काव्यरसिकों के लिए षट् रस व्यंजनपूरित उस थाल से कम नहीं, जिसे जिह्वा लोलूप को परोसा गया है ।
आपका प्रारंभिक गीत "सांझ पागल तो नहीं" ग्राम्य जीवन के आनंद की स्मृतियों से ओतप्रोत होकर नायक के संवाद द्वारा काव्य- पट पर उकेरा गया है- खूब हँसते बहते जल में पाँव धरते जब ठुमकते विहग गाते और विचरते हम वहाँ मिट्टी में सनते दूब चुनते भूल कैसे तुम गई हो उन क्षणों को अर्चना के उन क्षणों को खो रही है सांझ पागल तो नहीं तुम हो गई हो कवि कल्पना के चितेरे हैं। वे अपने गीत लेखन कौशल से पाठक और श्रोताओं के मन को कल्पना के अपने क्षणों में डूबाने में सक्षम हैं।
वर्तमान समय की संवेदनहीनता और शहर की स्वाभिमान शून्यता पर उनकी चंद पंक्तियाँ ही पर्याप्त हैं- है यहाँ बैसाखियाँ और चंद सिक्के आदमी मिलते कहाँ पहले से से मन के और बोलो इस समय ने क्या दिया है खो गई सुधियाँ हमारी, विष पिया है इस समय पर चीखने चिल्लाने के बजाय उक्त पंक्तियाँ बहुत कुछ कह देती हैं।
श्रृंगार में भी निर्मोही जी की ये दो पंक्तियाँ सूक्ष्म सौंदर्य दृष्टि के साथ बहुत कुछ कह देती हैं - है कहाँ वो लाज से घूँघट हटाना यूँ लगे जैसे हिजाबी झर रही हो महसूस किए गए सौंदर्य का सूक्ष्म,खूबसूरत एवं चाक्षुष गत्यात्मक बिंब!वाह!
संग्रह में एक से बढ़कर एक गीत हैं। सर्दियों का गीत, लाज की अग्नि रेखा, लौट आओ न घर को, गंधा गई रूत आदि श्रृंगार के गीत हैं तो संवेदनाओं को जगाकर पारिवारिक व सामाजिक समस्याओं के निराकरण की सोच के साथ लिखे गए गीत भी हैं।यथा- घर के बुजुर्गों पर बहुत तपे पेड़ आँगन के,और सत्य पथ के अवरोधों को लेकर ‘चलते चलते पाँव में', माँ का गीत "माँ की आहट है", "बेरोजगारी का गीत", "जवानी जाग", "हिन्दी का गीत", "पर्यावरण का गीत", "नदी का गीत", "पंजाब में आतंकवाद का गीत"- "पंजाब का पानी" आदि ।
एक भी है।आध्यात्म के गीतों को भी स्थान मिला है। ये हैं- शारदा वंदना, अंजुरी आचमन का जल,भगवत गीता से,मस्त कबीरा।
हर गीत के संबंध में बहुत कुछ लिखा जा सकता है। यहांँ गीतों की बानगी चंद पंक्तियों में प्रस्तुत है- वर्तमान समय को लेकर वो सावचेत करते हैं:- भीम का फिर से गला अवरूद्ध है भीष्म अपने शासको से क्रुद्ध है ऐसे बुजुर्गों के लिए :- अभय खडे़ ये धीर हिमाला बातें करते पिघल पिघल के नदी की पीड़ा :- आज के ग़म को नदी कलकल बनाती है पीर सहती है,नदी कुछ गुनगुनाती है सुख बांटने वाली नदी का गुनगुनाना ,वह भी पीड़ा से !
आपके स्मृति गीत शहरी विलासिता पर व्यंग्य हैं।यहाँ अपसंस्कृति पर चोट है। सामाजिक समरसता को भी उकेरा गया है। जितेन्द्र निर्मोही के आलम्बन विभाव के गीत विभिन्न परिदृश्यों से गुजरते हुए संयोग में होते हुए भी वियोग का आस्वाद देते हैं।
उनका जीवन दर्शन अद्भुत हैं: कवि के शब्दों में जिंदगी के बोल हैं - मैं जग रही हूंँ, सुन रही हूंँ बात बहुत कुछ नई के जिंदगी की जिंदगी भी होती सच यही और भी- जिंदगी शबनम की बूंद है जो टिकी है एक पात पर क्या भरोसा रूठ जाए ये एक छोटी सी ही बात पर उनके नवगीतों में पुरासम्पदा है, आज के सवाल है, कोमल भाव है, जीवन दर्शन है।
वो नवगीतों में प्रकृति और परिवार का सामंजस्य पूरी संवेदना के साथ यूँ दिखाते हैं- सांझ पड़े गैया आती ऐसा लगता कोई बिटिया पीहर में है आती पुरा वैभव पर नवगीत,’’किले के पत्थर’ से - कुछ रक्त रंजित इतिहासों के कुछ शौर्य कथा के वासों में हैं पराक्रम के हम दृष्टा हम दृष्टा हैं अय्यारी के उनके नवगीतों की भाषा प्रांजल और कल्पना प्रवणता अनूठी है।
आँखों पर उनकी अभिव्यक्ति देखिए:- तुम्हारी आँखों की उपमाएँ हैं अलंकार है कई ऋतुएँ हैं शरद गरमी बारिश है कला सौंदर्य को लेकर बात करें तो भाषा पर कवि का खासा अधिकार दिखाई देता है, आप कुशलता से विषयानुकूल भाषा का प्रयोग करते हैं।
वंदना में संस्कृतनिष्ठ शब्दावली, श्रृंगार विषयक रचनाओं में कोमलकांत पदावली, उर्दू बहुलाभाषा, ग्राम्य संस्कृत के गीतों को आम बोलचाल की आंचलिक शब्दावली, देश के बिगड़ते हालात में कहीं-कहीं अंग्रेजी का प्रयोग आपकी भाषा दक्षता का प्रमाण है।
सरल सहज शब्दावली, समास रहित शब्दावली, न्यूनतया समस्त पदों का प्रयोग अभिधा में सहज प्रवाह, व्यंजना का न्यूनतया सहज प्रयोग, माधुर्य गुण, शब्द निर्माण की प्रवृत्ति, सहज अलंकृत भाषा, वैविध्यपूर्ण शैली, मौलिक अभिव्यक्ति का कौशल क्या-क्या नहीं है इसमें?
सुंदर बिम्ब योजना, भिन्न-भिन्न प्रतीकों का बहुतायत में प्रयोग, लोक पक्ष, कृतिकार की कला का वैशिष्ट्य जो इस कृति के गीतों को बोधगम्य, रूचिकार एवं प्रभावोत्पादक बनाता है। आपकी शब्द साधना श्लांघनीय है, नवाचार के साथ प्रतीकों का वैभव व बिम्बधर्मिता आपके गीतों में चार चाँद लगाती है।
आपकी उर्दू शब्दावली शमशेर बहादुर सिंह की याद दिलाती है तो हिंदी शब्दावली धर्मवीर भारती के निकट दिखाई देती है। आपके गीतों की पदावलियाँ नीरज सोम ठाकुर, नमोनाथ अवस्थी, तारा प्रकाश जोशी जैसे अग्रज गीतकारों की याद दिलाते हैं। आपके विरह गीत बच्चन जी की याद दिलाते हैं।
सच तो यह है कि कृति "मेरे गीत और नवगीत" अपने अग्रज और समकालीन गीतकारों के गीत युग की याद दिलाती है।
पुस्तक : मेरे गीत और नवगीत" विधा : नवगीत ( काव्य ) लेखक : कवि जितेन्द्र निर्मोही , कोटा प्रकाशक : साहित्यागार, जयपुर मूल्य : 250 ₹ ISBN : 978- 93- 5947-109-9 उपलब्ध : अमेजन / फ्लिपकार्ट ------_-------- समीक्षक पता अक्षयलता शर्मा विला नं. 34, बी ब्लॉक, बालाजी विहार अपना बेंगलो मोहनपुरा, पो.ओ. मानसरोवर, नियर केसर सर्किल, तह. सांगानेर जयपुर 302029 मो.नं. 941704390
