मनुष्य स्वभाव से ही घुमंतू प्राणी है। उसके भीतर अपने आसपास की दुनिया को देखने, जानने और नए अनुभवों से गुजरने की एक सहज ललक होती है।
शायद यही कारण है कि घूमने की इच्छा मनुष्य के जीवन में बहुत आरंभ से ही दिखाई देने लगती है। इसके लिए उसे बोलना सीखने या अपनी इच्छा को शब्दों में व्यक्त करने की भी आवश्यकता नहीं होती।
छोटा सा बच्चा जब बोलना भी नहीं जानता, तब भी अपने हाथ के इशारे से घर से बाहर जाने की बात समझाने लगता है।
वह बार बार दरवाजे की ओर देखता है, बाहर जाने का संकेत करता है और अपनी बाल भाषा में ‘घुम्मी घुम्मी’ कहकर जैसे पूरे परिवार को बता देता है कि उसे बाहर घूमने जाना है।
अभी कुछ देर पहले तक जो बच्चा रो रहा था, जिद कर रहा था या किसी बात पर नाराज था, उसे जैसे ही बाहर ले जाने की बात कही जाती है, उसके चेहरे पर मुस्कान तैर जाती है।
घर से बाहर निकलते ही उसका ध्यान अपने आसपास की दुनिया पर टिक जाता है। कभी सड़क पर जाती गाड़ी उसे आकर्षित करती है, कभी कोई पक्षी, कोई पेड़, कोई फूल या कोई अनजान चेहरा।
वह अपने छोटे से संसार से बाहर निकलकर एक बड़ी दुनिया से परिचित होने लगता है। कई बार तो बाहर निकलते ही वह अपना खाना पीना और रोना तक भूल जाता है।
घंटों घूमने के बाद जब उसे वापस घर लाया जाता है तो वह घर के बाहर से ही लौटने का विरोध करने लगता है। जैसे उसका मन कह रहा हो कि अभी यात्रा समाप्त नहीं हुई, उसे अभी और देखना है, और जानना है, और घूमना है।
बचपन की यह कौतूहल भरी यात्रा उम्र के साथ समाप्त नहीं होती, बल्कि उसका स्वरूप बदलता जाता है। लगभग पांच वर्ष की उम्र में जब बच्चे को बताया जाता है कि उसे चिड़ियाघर ले जाया जाएगा, तो उसकी खुशी देखने लायक होती है।
चिड़ियाघर उसके लिए केवल पशु पक्षियों को देखने का स्थान नहीं होता, बल्कि एक नई दुनिया का प्रवेश द्वार होता है। किताब में हाथी, शेर, हिरन, बंदर या जिराफ का चित्र देखने वाला बच्चा जब उन्हें सामने देखता है तो उसका अनुभव बिल्कुल अलग होता है।
किसी पशु को देखकर वह डर जाता है, किसी को देखकर हंसता है, किसी के बारे में लगातार प्रश्न करता है। उसके चेहरे के बदलते हाव भाव सहज ही बता देते हैं कि उसके भीतर कितनी उत्सुकता और प्रसन्नता उमड़ रही है।
‘यह इतना बड़ा क्यों है?’
‘यह क्या खाता है?’
‘यह यहां कैसे आया?’
‘क्या यह रात में भी जागता है?’ बच्चे के ये छोटे छोटे प्रश्न वास्तव में उसकी जिज्ञासा के द्वार खोलते हैं। पर्यटन का सबसे बड़ा आकर्षण शायद यही है कि वह बच्चे को प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करता है। पुस्तक में पढ़ी हुई जानकारी और प्रत्यक्ष अनुभव के बीच जो दूरी होती है, यात्रा उसे बहुत सहज ढंग से समाप्त कर देती है।
जैसे जैसे बच्चा बड़ा होता है, उसकी घूमने की इच्छा भी अधिक स्वतंत्र होने लगती है। लगभग दस वर्ष की उम्र तक पहुंचते पहुंचते उसमें अपने आसपास की दुनिया को स्वयं देखने की समझ विकसित होने लगती है।
अब वह परिवार के साथ ही घूमना नहीं चाहता, बल्कि अपनी छोटी सी दुनिया के दायरे को स्वयं बढ़ाना चाहता है। साइकिल लेकर आसपास निकल पड़ना उसके लिए किसी रोमांचक यात्रा से कम नहीं।
कई बार घरवालों की मनाही के बावजूद वह अपने जोखिम पर बाहर निकल जाता है। रास्ते में कोई नई गली मिल जाए, कोई मैदान दिखाई दे जाए या कोई नया रास्ता आकर्षित कर ले तो वह अपने पूर्व निर्धारित रास्ते से हटकर उसे देखने निकल पड़ता है।
कभी कभी लौटते समय रास्ता भूल भी जाता है, लेकिन अगले दिन वही अनुभव उसकी नई कहानी बन जाता है।
ऐसे उदाहरण केवल आज के बचपन में ही नहीं, हमारे अपने बचपन की स्मृतियों में भी बिखरे पड़े हैं। फर्क इतना है कि तब घूमने की दुनिया सीमित थी और आज बच्चों के सामने विकल्पों की संख्या बहुत अधिक है। फिर भी घूमने के नाम से चेहरे पर आने वाली चमक तब भी वही थी और आज भी वही है।
दिलचस्प बात यह है कि घूमने की इच्छा उम्र के साथ कम नहीं होती, बल्कि उसके आकर्षण केंद्र बदलते जाते हैं। बच्चा पानी के किनारे पहुंचकर आनंदित होता है। उसे लहरों के साथ खेलना, पानी में पैर डालना, रेत पर घर बनाना या सुरक्षित परिस्थितियों में तैरना रोमांचित करता है। उसके लिए यात्रा का अर्थ है खुला आकाश, पानी, पेड़, खेल और नई चीजों को छूकर देखने का अवसर।
युवा के पर्यटन का संसार कुछ और विस्तृत हो जाता है। वह नए शहरों, प्राकृतिक स्थलों, ऐतिहासिक धरोहरों और दुनिया के अनोखे स्थानों को देखने की इच्छा रखता है। वह जानना चाहता है कि दूसरे देशों के लोग कैसे रहते हैं, वहां की संस्कृति कैसी है, स्थापत्य कैसा है और प्रकृति के कौन कौन से रूप वहां दिखाई देते हैं। उसके भीतर का पर्यटक दुनिया को अधिक व्यापक दृष्टि से देखने लगता है।
बड़ी उम्र में पहुंचने पर पर्यटन के आकर्षण फिर बदलते हैं। अनेक लोग तीर्थस्थलों, मंदिरों, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों की यात्राओं में विशेष रुचि लेने लगते हैं। किसी के लिए यह आस्था का विषय होता है, किसी के लिए सांस्कृतिक विरासत को समझने का अवसर और किसी के लिए अपने अतीत से जुड़ने का माध्यम। इस प्रकार एक ही यात्रा स्थल अलग अलग आयु के लोगों को अलग अलग अर्थ दे सकता है।
दरअसल पर्यटन का संबंध मनुष्य के मस्तिष्क की जिज्ञासा, कौतूहल और आनंद से है। रोजमर्रा की एकरस जीवन शैली से बाहर निकलते ही मनुष्य के सामने नए दृश्य, नए लोग, नए अनुभव और नई संभावनाएं खुलती हैं।
यही बदलाव मन को ताजगी देता है। यात्रा कभी आरामदेह नहीं होती।
कई बार उसमें लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, मौसम का सामना करना पड़ता है, थकान होती है, समय का संतुलन बनाना पड़ता है, फिर भी यात्रा से लौटने वाला व्यक्ति प्रायः अपने साथ थकान से अधिक अनुभव लेकर लौटता है।
शरीर थका हो सकता है, लेकिन मन नए अनुभवों से भरा होता है।
बच्चों के संदर्भ में पर्यटन का महत्व और भी अधिक है। बच्चा जितना देखता है, उतना ही पूछता है और जितना पूछता है उतना ही सीखने की ओर बढ़ता है।
किसी ऐतिहासिक दुर्ग की यात्रा उसके लिए इतिहास की पुस्तक का जीवंत अध्याय बन सकती है। किसी संग्रहालय में रखी पुरानी वस्तु उसे अतीत के जीवन की कल्पना करने के लिए प्रेरित कर सकती है।
किसी विज्ञान केंद्र की यात्रा विज्ञान को प्रयोग और अनुभव से जोड़ सकती है। किसी जंगल की सैर उसे प्रकृति और वन्यजीवन के प्रति संवेदनशील बना सकती है।
यात्रा बच्चे की निरीक्षण शक्ति को भी विकसित करती है। वह उन चीजों को देखने लगता है जिन्हें सामान्य जीवन में शायद अनदेखा कर देता।
रास्ते में खेतों को देखकर वह किसान के जीवन के बारे में सोच सकता है। किसी गांव की मिट्टी की दीवारें उसे वहां के जीवन और मौसम के संबंध में प्रश्न करने को प्रेरित कर सकती हैं।
किसी नदी को देखकर वह उसके उद्गम, प्रवाह और उपयोग के बारे में जानना चाहता है। इस प्रकार यात्रा एक छोटे से दृश्य को भी सीखने का अवसर बना देती है।
पर्यटन बच्चे की कल्पनाशक्ति और सृजनात्मकता के लिए भी उर्वर जमीन तैयार करता है। यात्रा से लौटकर कोई बच्चा देखे हुए पहाड़ का चित्र बना सकता है, कोई समुद्र पर कविता लिख सकता है, कोई यात्रा में मिले किसी व्यक्ति को अपनी कहानी का पात्र बना सकता है। किसी पुराने किले को देखकर उसके मन में उस समय के बच्चों का जीवन जानने की जिज्ञासा पैदा हो सकती है। इस तरह यात्रा उसके भीतर कहानी, कविता, चित्र और लेखन के नए बीज बोती है।
पर्यटन का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है सामाजिक और सांस्कृतिक परिचय। भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश की यात्रा बच्चे को अनेक भाषाओं, बोलियों, खान पान, वेशभूषाओं, लोककलाओं और परंपराओं से परिचित कराती है।
उसे समझ में आता है कि अलग भाषा बोलने या अलग ढंग से रहने वाला व्यक्ति भी उसी तरह हंसता, खेलता, सपने देखता और खुश होता है। विविधता के इस प्रत्यक्ष अनुभव से उसके भीतर दूसरों के प्रति सम्मान और अपने देश की सांस्कृतिक संपदा के प्रति आत्मीयता विकसित होती है।
इस दृष्टि से पर्यटन केवल ‘देखने’ की प्रक्रिया नहीं है। यह देखने से समझने, समझने से प्रश्न करने और प्रश्न करने से सीखने का उपक्रम है। बच्चों के लिए पर्यटन का महत्व इसलिए बढ़ जाता है कि उनका व्यक्तित्व अभी निर्माण की प्रक्रिया में होता है। वे अपने अनुभवों से दुनिया को समझते हैं। इसलिए यदि उनकी यात्राओं को योजनाबद्ध ढंग से सीखने से जोड़ा जाए तो पर्यटन उनके व्यक्तित्व विकास का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि बच्चों के पर्यटन को केवल मनोरंजन की दृष्टि से न देखा जाए। उन्हें ऐसी यात्राओं के अवसर मिलें जहां वे इतिहास को छू सकें, प्रकृति को महसूस कर सकें, विज्ञान को देख सकें, संस्कृति को समझ सकें और समाज को निकट से जान सकें।
यात्रा से पहले उन्हें उस स्थान के बारे में कुछ जानने के लिए प्रेरित किया जाए, यात्रा के दौरान उन्हें स्वतंत्र रूप से देखने और प्रश्न करने दिया जाए और लौटने के बाद अपने अनुभवों को व्यक्त करने का अवसर दिया जाए।
तब पर्यटन सचमुच बच्चों के लिए जीवन की खुली पाठशाला बन सकता है। बच्चा जितना घूमता है, उसकी दुनिया उतनी ही बड़ी होती जाती है।
इसलिए पर्यटन को केवल घर से बाहर निकलना नहीं कहा जा सकता। यह मनुष्य के भीतर मौजूद उस आदिम जिज्ञासा का विस्तार है, जो बचपन में ‘घुम्मी घुम्मी’ के सहज आग्रह से शुरू होती है और जीवन भर हमें कुछ नया देखने, जानने और अनुभव करने के लिए प्रेरित करती रहती है।
बच्चे के लिए तो यह यात्रा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि घूमते हुए वह केवल दुनिया को नहीं देखता, बल्कि दुनिया को समझना सीखता है।
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