विजय जोशी, कोटा कथाकार और समीक्षक, कोटा भारतीय संस्कृति की विविधता में यात्राओं का महत्व एक छोटी इकाई से वृहद रूप में परिलक्षित होता है। वस्तुतः यात्रा में एक प्रकार से उद्देश्य ध्वनित होता है।
जिसमें समान्यतया अपने घर से अस्थायी रूप से बाहर जाने और अपने उस उद्देश्य को प्राप्त करने जिसमें मनोरंजन, दर्शनीय एवं ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व के स्थल को देखना, दैनिक चर्या से विलग एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों के उजास को आत्मसात् करने तथा ज्ञानवर्धन की समृद्ध परम्परा को विकसित करने के साथ आर्थिक महत्व का भाव समाहित होता है।
इन सन्दर्भों की झलक अपने व्यापक प्रभाव के साथ हाट में दिखाई देती है जो मुख्यतः सामाजिक स्तर पर परस्पर मेल - मिलाप, संवाद और चर्चा - परिचर्चा के साथ मनोरंजन का भी एक प्रमुख स्थल होते हैं। यह वह स्थान है जो पर्यटन की मुख्य भावना के साथ उसके महत्व को उजागर करता है।
ग्राम से अँचल तक हाट का अपना सांस्कृतिक एवं सामाजिक महत्व है। आज बदलते परिवेश के साथ शहरी क्षेत्र में भले ही इसका स्वरूप बदला हो तथापि इसकी मूल संवेदना का स्पन्दन उसी रूप में विद्यमान है। इस माने में कि ग्रामों में यहाँ तक कि शहरों में भी सप्ताह के एक दिवस विशेष पर यह अभी भी स्थान विशेष पर भरते हैं।
लोक की यह संचेतना तब और अधिक उत्साहित करती है जब लोक पर्व और त्योहारों पर लगने वाले ग्राम्य मेले सभी को दिन विशेष से ही पूर्व आने - जाने के लिए पूर्व तैयारी में लग जाने के लिए स्वतः ही प्रेरित करते हैं। शहरों में लगने वाले प्रसिद्ध मेले तो अपने साप्ताहिक, पखवाड़े और मासिक अवधि में आस - पास ही नहीं अँचल के साथ देश के अलग - अलग शहरों से लोगों को आकर्षित कर यात्रा के लिए स्व प्रेरणा जगाते हैं।
स्थानीय देवालय, ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्व के स्थल के साथ मनोरंजन के आधुनिक स्थल अब पर्यटकों को अधिक आकर्षित करते हैं। इस माने में कि प्राकृतिक स्थलों पर पर्यटक अपनी वैचारिक और सांस्कृतिक धारा को एकात्म रूप से अनुभूत करता है।
बढ़ते शहरीकरण और बिछटते आंचलिक सन्दर्भों के मध्य प्रकृति ही एक आसरा है जो मन और मस्तिष्क को अपने प्राकृतिक स्वरूप में बनाए रखती है। कदाचित इसीलिए आज भी मनुष्य अपने को प्रकृति के समीप ही ऊर्जावान पाता है।
भले ही पर्यावरण को दूषित करने में वही प्रधानता के साथ अग्रज होकर अपनी यात्रा करता हो। तथापि यह यात्रा भी उसे सावचेत करती है।
संचेतना का यही भाव देश से देश में तथा एक देश से दूसरे देश में यात्रा करने के मध्य इस प्रकार से संचारित होता है कि कृति, प्रकृति और पर्यावरण के अंतर्सम्बन्ध को परस्पर समझने का अवसर प्रदान कर दिशा प्रदान करता है।
यही दिशा पर्यटन के महत्व को उजागर करती है। इस माने में कि राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर पर्यटकों के मध्य एक सांस्कृतिक सेतु निर्मित होता है, आर्थिक विकास की दृष्टि से एक प्रवाह बनता है और सबसे महत्वपूर्ण जीवन में तत् उत्पन्न मानसिक तनाव एवं शारीरिक अस्वस्थता में प्रभावी परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त होता है।
तभी तो पर्यटन में समाहित मनोरंजन की भावना, समुचित मानसिक एवं शारीरिक विश्राम की पहल और अधिकाधिक जानकारी से जिज्ञासा का शमन उत्साहित कर व्यक्ति के भीतर नव चेतना का स्रोत निर्मित करता है।
यही निर्मिति व्यक्ति को उसके भीतर के प्राकृतिक परिवेश से पंचतत्वीय प्रकृति के साथ जोड़ती है। यही जुड़ाव घर से अन्य स्थल के मध्य की यात्रा में मिले अनुभवों पर मंथन कर अपने जीवन के विविध सन्दर्भों से संवाद करने का अवसर प्रदान करता है।
इन्हीं अवसरों पर स्वयं को समझने और देश - विदेश में परिवर्तित होते परिवेश से लोक को जानने और जीवन को सुचारू और सकारात्मक भावों के साथ आगे बढ़ाने का भाव दिग्दर्शित होता है।
आज इस दिग्दर्शन में देशाटन, तीर्थाटन और पर्यटन के समन्वित सन्दर्भों में नवीन परिदृश्य देखने को मिलते हैं।
समय - समय पर बदलते सामाजिक एवं राष्ट्रीय सन्दर्भ ने पर्यटन की अवधारणा को भी विविध आयाम प्रदान किए हैं जिससे लोक संस्कृति के विभिन्न पक्ष आधुनिक परिप्रेक्ष्य में अपने पारम्परिक उजास के साथ विद्यमान है।
इसी उजास में स्थल का आकर्षण, वहाँ तक पहुँचने की सुगमता, आवासीय सुविधा और विभिन्न गतिविधियों की सजीवता प्रत्येक व्यक्ति को आकर्षित करती है। यह प्रकृति प्रदत्त स्वभाव और जीवन में प्राप्त अनुभवों से निर्मित भावों का समुच्चय है।
पर्यटन, जीवन के इसी समुच्चय को खोलकर जीने की एक स्वस्थ धारणा को विकसित कर राष्ट्र और उसके विकास में अहम् भूमिका प्रस्तावित कर महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करता है।
परिवर्तित अवधारणाओं में यही विकास के प्रमुख चरणों में उभर कर सामने आता है और लोक संवेदना के विविध सन्दर्भों से साक्षात्कार कराता है।
इस माने में कि यात्रा और भ्रमण के आधुनिक स्वरूप से यात्री से पर्यटक बनने की भी अपनी एक महत्वपूर्ण यात्रा है ... जो पर्यटन को सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से एक सेतु के रूप में स्थापित करता है...।
