मेरा शाहाबाद की इस धरती से एक गहरा, बेहद मार्मिक रिश्ता है।
मैं शाहाबाद के राजघराने से हूँ— इस ज़मीन से, इन जंगलों से, इस हवा से मेरा एक अपना, बहुत पुराना नाता है।
मैं बचपन से इन जंगलों के बीच से आती-जाती रही हूँ।
एनएच-27 हाइवे से गुजरते हुए घाटी का नज़ारा बेहद मनमोहक होता है, जो हरे-भरे पहाड़ों और घने जंगलों से घिरा है।
बारिश के मौसम में यहाँ लगभग चार सौ फीट ऊँचा कुंडा खोह झरना गिरता है, जो आसपास की हरियाली के साथ बहुत ही सुंदर दिखता है।
यह क्षेत्र पैंथर, हिरण और विभिन्न वन्य जीवों का प्राकृतिक आवास है।
यहाँ हज़ारों जीव-जंतु वर्षों से बसे हैं। आज भी वे हरे-भरे पेड़ मेरी आँखों के सामने तैरते हैं।
लेकिन अब जब रोज़ अख़बारों में इनके कटने की खबरें पढ़ती हूँ, तो मन भीतर से हिल जाता है।
सच कहूँ तो एक अजीब-सी दुविधा भी है… क्योंकि मैं यह भी देखती हूँ कि वहाँ लंबे समय से विकास की कमी है।
लोगों को रोजगार चाहिए, उन्हें अपने ही घर-ज़मीन छोड़कर कहीं और न जाना पड़े— यह भी उतना ही जरूरी है।
मैं भी चाहती हूँ कि वह इलाका आगे बढ़े, वहाँ के लोगों का जीवन बेहतर हो… लेकिन एक सवाल बार-बार सामने खड़ा हो जाता है— क्या प्रगति के लिए प्रकृति की कुर्बानी देना ज़रूरी है?
हम कोई और रास्ता क्यों नहीं सोचते?
दुनिया में ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ विकास भी हुआ है और प्रकृति भी बची है।
तो फिर हम क्यों हर बार उन्हीं पर वार करते हैं जो बोल नहीं सकते?
क्यों अपनी उन्नति के लिए पेड़ों और जंगलों को ही कुर्बान कर देते हैं?
मैंने यहाँ के कई लोगों से बात की।
उनकी बातों में एक सच्चाई थी— उन्हें सुविधा चाहिए, रफ़्तार चाहिए, रोजगार चाहिए… लेकिन प्रकृति के एवज में नहीं।
वे कहते हैं—“जंगल रहें, तो हम हैं।
अगर यही नहीं बचा, तो फिर क्या बचेगा?” कुछ पंक्तियाँ, जो हमें सोचने पर मजबूर करती हैं… अंतिम समय जब मनुष्य इस धरती से जाता है, तो सबसे पहला सवाल यही उठता है— “कितनी लकड़ी लगेगी?”
जीवन भर जो साथ न आया, न धन, न दौलत, न रिश्तों का शोर— अंत में साथ जाता है बस एक वृक्ष… जो चुपचाप जलकर भी मनुष्य का अंतिम साथ निभाता है।
सोचिए… जिस पेड़ को हम ज़िंदगी भर काटते रहते हैं, वही अंत में हमारे काम आता है।
और आज हम उन्हीं पेड़ों को एक पावर प्लांट के लिए काटने जा रहे हैं।
आज अगर हम चुप रहे, तो कल शायद बहुत देर हो जाएगी।
इतिहास में एक समय ऐसा भी आया था, जब लोगों ने पेड़ों को बचाने के लिए उन्हें गले लगा लिया था— वह सिर्फ आंदोलन नहीं था, वह प्रकृति के लिए प्रेम था, जिम्मेदारी थी।
क्या आज हमें फिर वैसा ही कुछ नहीं करना चाहिए?
अगर सच में हम इन जंगलों को बचाना चाहते हैं, तो हमें साथ आना होगा।
आवाज़ उठानी होगी। ज़रूरत पड़े तो पेड़ों के साथ खड़ा होना होगा।
यह सिर्फ जंगल बचाने की बात नहीं है, यह हमारी साँस बचाने की बात है।
यह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक जिम्मेदारी है।
शाहाबाद हमें पुकार रहा है… अब फैसला हमें करना है— क्या हम खामोश रहेंगे?
या अपने जंगलों के लिए खड़े होंगे?
अब मैं फैसला आप पर छोड़ते हूँ।
अमिता शर्मा
