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Literature News

डाॅ. निशा के सम्मान में नशिस्त: गंगा जल जो चाहे पीले, मजहब पहरेदार कहां।

उदयपुर नगर की साहित्यिक संस्था नवकृति की ओर से बनारस से आई साहित्यकार शायरा डा नसीमा निशा के सम्मान में कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया । यह जानकारी देते हुए नवकृति अध्यक्ष रामदयाल मेहरा ने बताया कि आर्य समाज हिरण मगरी के स

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डाॅ.  निशा के सम्मान में नशिस्त: गंगा जल जो चाहे पीले, मजहब पहरेदार कहां।

उदयपुर नगर की साहित्यिक संस्था नवकृति की ओर से बनारस से आई साहित्यकार शायरा डा नसीमा निशा के सम्मान में कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया ।

यह जानकारी देते हुए नवकृति अध्यक्ष रामदयाल मेहरा ने बताया कि आर्य समाज हिरण मगरी के सभागार में आयोजित गोष्ठी की अध्यक्षता कवि शायर डा हेमेंद्र चण्डालिया ने की ।

संचालन आसमा बेगम ने किया। मनमोहन मधुकर द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से शुरू हुई कवि गोष्ठी में विविध रंग रस की कविताएं प्रस्तुत की।

मुख्य अतिथि शायरा डॉ नसीमा निशा ने हिन्दुस्तान की गंगा जमनी संस्कृति पर अपनी रचना में कहा - देखो तो दीवार कहां है। दो धारी तलवार कहां है।

गंगा जल जो चाहे पीलें, मजहब पहरेदार कहां है। इसी तरह बेटियों पर प्रस्तुत आपकी यह रचना भी खूब सराही गई - बेटियां हैं तो घर निराला है।

घर में इनसे ही उजाला है।

प्रारंभ में संस्था के संस्थापक महासचिव ने स्वागत के साथ काव्य पाठ किया। विशिष्ट अतिथि डा प्रमिला सिंघवी सहित डाॅ निर्मल गर्ग, डा लईक हुसैन , डॉ विमल शर्मा, शाद उदयपुरी, मुकेश परवाना अजमेरी, इक़बाल सागर, ब्रजेश कुमार मिश्र, सबीरा रानी, सागर मल सर्राफ,शाहिद हुसैन शैदा, सुभाष शर्मा, रियाज़ अहमद कंधारी, डॉ राजगोपाल, रशीद जयपुरी, सरीता कंवर राव, गुलजार चित्तौड़गढ़ी, जगवीर सिंह कानावत, मुरलीधर गट्टानी, इन्दिरा सावधानी, मनोहर आदि ने काव्य पाठ किया ।

उदयपुर/23 सितंबर,2026 नगर की साहित्यिक संस्था नवकृति की ओर से बनारस से आई साहित्यकार शायरा डा नसीमा निशा के सम्मान में कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया ।

यह जानकारी देते हुए नवकृति अध्यक्ष रामदयाल मेहरा ने बताया कि आर्य समाज हिरण मगरी के सभागार में आयोजित गोष्ठी की अध्यक्षता कवि शायर डा हेमेंद्र चण्डालिया ने की ।

संचालन आसमा बेगम ने किया। मनमोहन मधुकर द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से शुरू हुई कवि गोष्ठी में विविध रंग रस की कविताएं प्रस्तुत की।

मुख्य अतिथि शायरा डॉ नसीमा निशा ने हिन्दुस्तान की गंगा जमनी संस्कृति पर अपनी रचना में कहा - देखो तो दीवार कहां है। दो धारी तलवार कहां है।

गंगा जल जो चाहे पीलें, मजहब पहरेदार कहां है। इसी तरह बेटियों पर प्रस्तुत आपकी यह रचना भी खूब सराही गई - बेटियां हैं तो घर निराला है।

घर में इनसे ही उजाला है।

प्रारंभ में संस्था के संस्थापक महासचिव ने स्वागत के साथ काव्य पाठ किया। विशिष्ट अतिथि डा प्रमिला सिंघवी सहित डाॅ निर्मल गर्ग, डा लईक हुसैन , डॉ विमल शर्मा, शाद उदयपुरी, मुकेश परवाना अजमेरी, इक़बाल सागर, ब्रजेश कुमार मिश्र, सबीरा रानी, सागर मल सर्राफ,शाहिद हुसैन शैदा, सुभाष शर्मा, रियाज़ अहमद कंधारी, डॉ राजगोपाल, रशीद जयपुरी, सरीता कंवर राव, गुलजार चित्तौड़गढ़ी, जगवीर सिंह कानावत, मुरलीधर गट्टानी, इन्दिरा सावधानी, मनोहर आदि ने काव्य पाठ किया ।