मार्च के आख़िरी दिन, वही भागता हुआ दौर, हर चेहरे पे ख़ामोशी, हर दिल में मेहनत का शोर।
काग़ज़ों में उलझे हुए ख्वाबों के सिलसिले, हर एक फ़ाइल में जैसे कई अरमान पले।
दिन भी छोटे लगे, रातें भी थक कर सो गईं, नींदें गिरवी रखीं, जिम्मेदारियाँ हो गईं।
हिसाबों के मौसम में जज़्बात नहीं दिखते, यहाँ आँकड़े ही अक्सर इंसानों को है लिखते।
किसी ने घर छोड़ा, किसी ने सुकून भुलाया, मार्च एंड ने हर किसी को बस काम सिखाया।
थकान को मुस्कुराहट में छुपाते रहे लोग, खुद से आगे बढ़कर निभाते रहे लोग।
ये सिर्फ़ गिनती नहीं, ये तपस्या का रंग है, हर हस्ताक्षर के पीछे एक अधूरा सा ढंग है।
हर पन्ने पे मेहनत का इतिहास लिखा है, हर आँकड़े में किसी का विश्वास छिपा है।
नमन है उन कर्मयोगियों को हर एक बार, जो खामोशी में भी करते रहे अपना विचार।
विशेष समर्पण उन सभी हाथों के नाम, जो भाकृअनुप-केंद्रीय मात्स्यिकी शिक्षा संस्थान को देते रहे अपना काम।
ये अंत नहीं, एक नई राह की शुरुआत है, हर संघर्ष के बाद ही सुकून की बात है।
मार्च का ये दौर सिखा जाता है हर बार, मेहनत ही असली जीत है, यही सच्चा आधार।