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मीरा कन्या महाविद्यालय में ज्ञान, कला और परंपरा का संगम—राजस्थान की मंदिर स्थापत्य कला पर सेमिनार

मुख्य बिंदु
  • उदयपुर : राजस्थान की समृद्ध कला धरोहर और भारतीय ज्ञान परंपरा को केंद्र में रखकर आयोजित एकदिवसीय सेमिनार “राजस्थान की मंदिर वास्तुकला एवं मूर्तिकला: एक परिशीलन” अकादमिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।
  • सेमिनार के मुख्य वक्ता प्रख्यात भारतीय ज्ञान परंपरा संरक्षक डॉ.
  • श्रीकृष्ण जुगनू रहे, जिन्होंने मेवाड़ अंचल के मंदिरों की स्थापत्य एवं मूर्तिकला पर गहन व्याख्यान प्रस्तुत किया।
  • यह आयोजन शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार तथा भारतीय ज्ञान परंपरा शोध केंद्र की शोध परियोजना के अंतर्गत, प्रधान अन्वेषक डॉ.
  • दीपक सालवी के निर्देशन में सम्पन्न हुआ।
  • कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो.
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मीरा कन्या महाविद्यालय में ज्ञान, कला और परंपरा का संगम—राजस्थान की मंदिर स्थापत्य कला पर सेमिनार

उदयपुर : राजस्थान की समृद्ध कला धरोहर और भारतीय ज्ञान परंपरा को केंद्र में रखकर आयोजित एकदिवसीय सेमिनार “राजस्थान की मंदिर वास्तुकला एवं मूर्तिकला: एक परिशीलन” अकादमिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। सेमिनार के मुख्य वक्ता प्रख्यात भारतीय ज्ञान परंपरा संरक्षक डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू रहे, जिन्होंने मेवाड़ अंचल के मंदिरों की स्थापत्य एवं मूर्तिकला पर गहन व्याख्यान प्रस्तुत किया।

यह आयोजन शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार तथा भारतीय ज्ञान परंपरा शोध केंद्र की शोध परियोजना के अंतर्गत, प्रधान अन्वेषक डॉ. दीपक सालवी के निर्देशन में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. दीपक माहेश्वरी, प्राचार्य राजकीय मीरा कन्या महाविद्यालय, उदयपुर ने की।

मुख्य वक्ता डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू ने अपने व्याख्यान में मेवाड़ क्षेत्र के प्रमुख मंदिरों—सास-बहू मंदिर, नागदा, जगत का अंबिका माता मंदिर, एकलिंगनाथ जी मंदिर, कीर्ति स्तंभ, चित्तौड़गढ़, विजय स्तंभ, चित्तौड़गढ़ तथा कुम्भलगढ़ के मंदिर—का उदाहरण देते हुए बताया कि ये स्मारक भारतीय शिल्पशास्त्रीय ज्ञान, प्रतीकवाद और आध्यात्मिक दर्शन के जीवंत दस्तावेज हैं।

सेमिनार में राष्ट्रीय स्तर पर 272 प्रतिभागियों ने भाग लिया।

सेमिनार में प्रो. चंद्रशेखर शर्मा, प्रो. मंजू त्रिपाठी, प्रो. तराना परवीन, प्रो. अनुपम, प्रो. सागर सांवरिया, प्रो. कहानी भागवत, प्रो. मुकेश, प्रो. नम्रता यादव, प्रो. प्रहलाद धाकड सहित अन्य विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों से प्रो. ममता पुर्बिया, प्रो. बिंदिया पवार, प्रो. कंचन राणावत, डाॅ. भावना झाला, रघुनाथ, युगल किशोर शर्मा, सुरेश पालीवाल, शक्ति सिंह राठौड़, दिलीप डामोर, पुरुषोत्तम आदि शामिल हुए।

मंच संचालन छवि चित्रोल ने किया। इसके अतिरिक्त महाविद्यालय के शोधार्थियों, अन्य संस्थानों के जिज्ञासु शोधार्थियों तथा छात्राओं ने भी सक्रिय सहभागिता करते हुए प्रश्नोत्तर सत्र को अत्यंत सार्थक बनाया।

समापन अवसर पर डॉ. दीपक सालवी ने भारत सरकार की शोध परियोजना के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मेवाड़ की मूर्तिकला भारतीय सांस्कृतिक निरंतरता और सौंदर्यबोध की अनूठी अभिव्यक्ति है। अंत में सभी प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए और भविष्य में भी ऐसे ज्ञानपरक आयोजनों को निरंतर जारी रखने की घोषणा की गई।