उदयपुर | उदयपुर में खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम के क्रियान्वयन को लेकर विवाद गहराता जा रहा है।
मैसर्स 'जेड.ए. कानोडवाला' सुखेर, उदयपुर के पार्टनर सैफुद्दीन द्वारा उदयपुर के सिविल न्यायाधीश दक्षिण के समक्ष मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी तथा अभिहित अधिकारी खाद्य सुरक्षा अशोक आदित्य के खिलाफ हर्जाने, घोषणा और स्थायी निषेधाज्ञा के लिए औपचारिक वाद दायर किया गया है।
वादी पक्ष का आरोप है कि अधिकारी अपने पद का दुरुपयोग कर रहे हैं और अपीलीय न्यायालय के आदेशों की जानबूझकर अवहेलना कर रहे हैं।
प्रमुख आरोप एवं घटनाक्रम: लाइसेंस निलंबन और अपीलीय आदेश अभिहित अधिकारी द्वारा 3 जून 2025 को फर्म के खाद्य अनुज्ञापत्र फूड लाइसेंस संख्या 12224042000400) को धारा 32 के तहत गलत दस्तावेज पेश करने के आरोप में निलंबित कर दिया गया था।
इसके विरुद्ध वादी ने आयुक्त, खाद्य सुरक्षा एवं औषधि नियंत्रण विभाग, राजस्थान जयपुर के समक्ष अपील दायर की।
दिनांक 9 जुलाई 2026 को अपीलीय अधिकारी डॉ. टी. शुभमंगला (IAS) ने अपील स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि ई-मित्र संचालक की टाइपिंग/गलती के कारण रिकॉल मैनेजमेंट प्लान में त्रुटिपूर्ण दस्तावेज सबमिट हो गए थे। अदालत ने पोर्टल पर सही दस्तावेज अपलोड कर प्रस्तुत करने की शर्त पर लाइसेंस बहाल करने का आदेश दिया था।
आदेश की अनुपालना रोकने और होल्ड रखने का आरोप: वादी का कहना है कि अपीलीय आदेश के अनुसार सभी औपचारिकताएं समय पर पूरी कर दी गईं और विभाग को कई बार नोटिस व रिमाइंडर भेजे गए, इसके बावजूद अधिकारी द्वारा दुर्भावनापूर्ण तरीके से लाइसेंस को बहाल नहीं किया जा रहा है और उसे होल्ड पर रखा गया है।
आपराधिक षडयंत्र और व्यक्तिगत द्वेष के आरोप: वाद और विधिक नोटिसों के माध्यम से गंभीर आरोप लगाए गए हैं कि सीएमएचओ/अभिहित अधिकारी कुतुबुद्दीनके साथ मिलकर आपराधिक षडयंत्र रच रहे हैं।
आरोप है कि निजी रंजिश के तहत वादी को प्रताड़ित करने के उद्देश्य से सार्वजनिक अवकाश के दिनों (जैसे 19 और 21 सितंबर 2026) में भी व्यावसायिक प्रतिष्ठान पर औचक निरीक्षण के नाम पर कर्मचारियों को भेजकर दबाव बनाया जा रहा है।
न्यायालय में कानूनी कार्रवाई और हर्जाने की मांग: अपीलीय आदेश की पालना न होने और मानसिक प्रताड़ना के चलते, अधिवक्ता धर्मेन्द्र कुमार श्रीवास्तव के माध्यम से प्रतिवादी अधिकारी को विधिक नोटिस भेजकर 10,000/- रुपये प्रतिदिन के हिसाब से हर्जाने की मांग की गई है।
अनुपालना सुनिश्चित न होने पर अब स्थानीय सिविल न्यायालय में वाद दायर कर अधिकारियों के कृत्यों को गैर-कानूनी घोषित करने और निषेधाज्ञा पारित करने की गुहार लगाई गई है।
