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Udaipur News

परमात्मा बनना है तो समस्त जीवों से करना होगा प्रेमःसाध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी

जड़ से मोह नहीं, जीवों के प्रति प्रेम ही अध्यात्म की सच्ची ऊंचाई

मुख्य बिंदु
  • वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में चल रहे आध्यात्मिक प्रवचन में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने बुधवार को धर्मसभा को संबोधित किया।
  • उन्होंने कहा कि परमात्मा महावीर ने समस्त कर्मों का क्षय कर केवलज्ञान प्राप्त किया और उस परम आनंद का अनुभव किया, जिसकी अनुभूति संसार का प्रत्येक जीव कर सकता है।
  • अध्यात्म की आधारशिला प्रेम है।
  • वात्सल्य और प्रेम से बढ़कर कोई अध्यात्म नहीं है।
  • साध्वी श्रीजी ने कहा कि यदि हमें वास्तव में परमात्मा बनने की दिशा में आगे बढ़ना है तो परमात्मा की इस विशाल दुनिया और उनके समस्त जीवों से प्रेम करना सीखना होगा।
  • हमारा परिवार सीमित है, जबकि परमात्मा का परिवार बहुत बड़ा है।
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उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में चल रहे आध्यात्मिक प्रवचन में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने बुधवार को धर्मसभा को संबोधित किया।

उन्होंने कहा कि परमात्मा महावीर ने समस्त कर्मों का क्षय कर केवलज्ञान प्राप्त किया और उस परम आनंद का अनुभव किया, जिसकी अनुभूति संसार का प्रत्येक जीव कर सकता है।

अध्यात्म की आधारशिला प्रेम है। वात्सल्य और प्रेम से बढ़कर कोई अध्यात्म नहीं है।साध्वी श्रीजी ने कहा कि यदि हमें वास्तव में परमात्मा बनने की दिशा में आगे बढ़ना है तो परमात्मा की इस विशाल दुनिया और उनके समस्त जीवों से प्रेम करना सीखना होगा।

हमारा परिवार सीमित है, जबकि परमात्मा का परिवार बहुत बड़ा है। समस्त जीवों के प्रति हमारे मन में कितना प्रेम है, यही हमारी आध्यात्मिक प्रगति को मापने का वास्तविक पैमाना है।

जब सभी जीवों के प्रति प्रेम जागृत हो जाए तो समझना चाहिए कि व्यक्ति अध्यात्म के क्षेत्र में ऊंचाई प्राप्त कर रहा है।उन्होंने कहा कि वर्तमान में हमारी रुचि जड़ पदार्थों में अधिक और जीवों के प्रति द्वेष में दिखाई देती है।

जड़ से प्रेम और जीव से द्वेष की भावना अध्यात्म के मार्ग में बाधक है। हमें अपने मन और दृष्टि को बाहरी संसार से धीरे-धीरे भीतर की ओर मोड़ना होगा।

संसार से विमुख होना नहीं, बल्कि अपनी दृष्टि को सही दिशा में डायवर्ट करना ही अध्यात्म का उद्देश्य है।साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी ने ज्ञान के विभिन्न स्वरूपों की चर्चा करते हुए कहा कि आर्त और रौद्र ज्ञान के अलावा धर्म ज्ञान और शुद्ध ज्ञान भी होते हैं।

धर्म ज्ञान में प्रवेश करना आसान नहीं है। उन्होंने उदाहरण देते हुए समझाया कि यदि दुकान पर ग्राहक मौजूद हो और अचानक बिजली चली जाए तो हमारा ध्यान ग्राहक पर रहेगा या गर्मी परकृयही हमारी मानसिक एकाग्रता को दर्शाता है।

मन को मारना नहीं, बल्कि उसे सही दिशा में मोड़ना आवश्यक है।उन्होंने कहा कि जड़ पदार्थों का त्याग करने में हम काफी पुरुषार्थ करते हैं, लेकिन छोटे से छोटे जीव को स्वीकार करने, उसके प्रति करुणा और प्रेम रखने में कितना पुरुषार्थ करते हैं, यह विचारणीय है।

समस्त जीवों के प्रति प्रेम और मैत्री की भावना विकसित होना ही सम्यक्त्व की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इस अवसर पर साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने भावपूर्ण गीत प्रस्तुत किया।