उदयपुर। श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, कुम्हारवाड़ा के तत्वावधान में देवेंद्र धाम स्थित महावीर समवशरण में आयोजित धर्मसभा में पूज्य डॉ. सुरेन्द्र मुनि जी ने प्रभु आदिनाथ की स्तुति स्वरूप भक्तामर अनुष्ठान का शुभारंभ किया।
इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव के साथ धार्मिक अनुष्ठान में भाग लिया।धर्मसभा में प्रवचन देते हुए डॉ. सुरेन्द्र मुनि ने जैन धर्म के अवसर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के जीवन-दर्शन पर प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि भगवान ऋषभदेव महान आदिकर्ता थे, जिन्होंने मानव समाज को सुव्यवस्थित जीवन जीने की प्रेरणा दी। उन्होंने पुरुषों के लिए 72 कलाएं तथा महिलाओं के लिए 64 कलाओं की स्थापना की।
साथ ही, असि, मसि और कृषि अर्थात शस्त्र, स्याही और खेती का ज्ञान देकर समाज को स्वावलंबन की राह दिखाई।मुनिश्री ने कहा कि भगवान ऋषभदेव के प्रतापी पुत्र चक्रवर्ती राजा भरत के नाम पर देश का नाम भारतवर्ष पड़ा।
भगवान ऋषभदेव ने कर्म और कर्तव्य का संदेश देते हुए स्वयं आध्यात्मिक साधना अपनाई तथा सिद्ध पद प्राप्त किया।भक्तामर स्तोत्र की महिमा बताते हुए उन्होंने कहा कि जैनाचार्य मानतुंग स्वामी ने विकट संकट के समय इस महास्तोत्र की रचना की थी।
भक्तामर अनुष्ठान कलियुग का कल्पवृक्ष है। श्रद्धा एवं आस्थापूर्वक इसका स्मरण करने से व्यक्ति को आत्मबल, मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है।धर्मसभा में प्रवर्तक डॉ. राजेन्द्र मुनि ने सभा को भक्तामर स्तोत्र में प्रतिदिन उपस्थित रहने की प्रेरणा प्रदान की।
श्री संघ के अध्यक्ष एडवोकेट रोशनलाल जैन, महामंत्री हिम्मत बड़ाला, दिनेश चौरडिया सहित पदाधिकारी के अलावा अनेक श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।
