उदयपुर। देवेंद्र धाम स्थित महावीर समवशरण में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए पूज्य डॉ. सुरेन्द्र मुनि ने वाणी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संसार में जीभ से बढ़कर कोई मीठी वस्तु नहीं है।
आश्चर्य की बात यह है कि मानव सुनना तो मीठा चाहता है, लेकिन बोलते समय कड़वे शब्दों का प्रयोग करता है। उन्होंने कहा कि समस्त धर्मों का सार मीठी वाणी में ही समाहित है और व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसकी वाणी से होती है।
मधुर वाणी से कड़वी वस्तु भी बिक जाती है, जबकि कटु वाणी के कारण मीठी वस्तु भी रखी रह जाती है।मुनि श्री ने रामायण और महाभारत का उदाहरण देते हुए कहा कि इतिहास के बड़े-बड़े संग्राम वाणी के कारण ही घटित हुए।
भगवान श्रीराम का वचन व्यवहार विनम्रता से परिपूर्ण था, जबकि रावण का व्यवहार कठोर वाणी से भरा था; फलस्वरूप एक का उत्थान हुआ और दूसरे का पतन। वहीं महाभारत का मूल कारण भी द्रौपदी के दो कड़वे बोल बने।
उन्होंने अष्टावक्र का दृष्टांत देते हुए कहा कि उनका शरीर भले ही टेढ़ा-मेढ़ा था, परंतु उनकी वाणी ज्ञानवान थी, जिसके चलते वे सर्वत्र पूजनीय बने।सभा में प्रवर्तक डॉ. राजेन्द्र मुनि ने कहा कि मित्रता और शत्रुता का मूल कारण यह जिह्वा ही है।
वर्षों के मित्र या शत्रु इसी जुबान के कारण बनते हैं। उन्होंने कहा कि पिस्तौल से निकली गोली और जुबान से निकली बोली कभी लौटकर वापस नहीं आती।
बोलना यदि चांदी है, तो मौन रहना सोना है। अतः हमें कर्कश और असत्य भाषा से बचते हुए सत्य को भी मिठास के साथ बोलना चाहिए।कार्यक्रम में उपाध्याय रमेश मुनि एवं दीपेश मुनि द्वारा मंगल भावना व्यक्त की गई।
इस अवसर पर श्रीसंघ द्वारा मुंबई, गुजरात और दिल्ली से पधारे समाजसेवियों का बहुमान किया गया। अंत में अध्या एडवोकेट रोशनलाल जैन एवं महामंत्री हिम्मत बडाला ने बताया कि 18 अक्टूबर से प्रारंभ होने वाली ओली जी की तप आराधना में सभी श्रद्धालुओं को भावभीना आमंत्रण दिया।