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Udaipur News

उदयपुर डायोसिस यूनिट में 56 वां कीर्तन दिवस समारोह संपन्न

उदयपुर . आनंद मार्ग प्रचारक संघ, उदयपुर डायोसिस यूनिट के टेकरी-मादरी रोड स्थित जागृति परिसर में दिनांक 1 अक्टूबर 2026 को 56वें कीर्तन दिवस के उपलक्ष्य में प्रारम्भ हुए एक प्रहरीय अष्टाक्षरी अखंड कीर्तन का समापन गुरुवार क

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उदयपुर डायोसिस यूनिट में 56 वां कीर्तन दिवस समारोह संपन्न

उदयपुर . आनंद मार्ग प्रचारक संघ, उदयपुर डायोसिस यूनिट के टेकरी-मादरी रोड स्थित जागृति परिसर में दिनांक 1 अक्टूबर 2026 को 56वें कीर्तन दिवस के उपलक्ष्य में प्रारम्भ हुए एक प्रहरीय अष्टाक्षरी अखंड कीर्तन का समापन गुरुवार कीर्तन दिवस दिनांक 8 अक्टूबर 2026 को हुआ. 'बाबा नाम केवलम' अष्टाक्षरी सिद्ध महामंत्र के अविरत गान के साथ यह कीर्तन, एक प्रहर अर्थात तीन घंटे की अवधि के लिए आयोजित किया गया और कीर्तन दिवस तक कुल 24 घंटे कीर्तन के साथ संपन्न हुआ. भुक्ति प्रधान डॉ. एस. के. वर्मा ने बताया की अष्टाक्षरी महामंत्र 'बाबा नाम केवलम', आनंद मार्ग के प्रवर्तक श्री श्री आनंदमूर्ति जी द्वारा सर्वप्रथम 8 अक्टूबर 1970 को अमझरिया, जिला लातेहार, राज्य झारखण्ड में दिया गया था और बाद में उसे सिद्ध किया गया. इस संस्था के लगभग 180 देशों के अनुयायियों की दैनिक जीवनचर्या में कीर्तन एक अभिन्न अंग है. कीर्तन के विभिन्न प्रकार होते हैं जैसे अखंड कीर्तन, आवर्त कीर्तन,कथा कीर्तन तथा नगर कीर्तन. ज्ञातव्य हो की उदयपुर जागृति में अनवरत रूप से चल रहे साप्ताहिक एक प्रहरी कीर्तन की शृंखला में यह 613 वां अखंड कीर्तन है जो उदयपुर जागृति के लिए एक गौरव की बात है ।

इस अवसर पर महिला डायोसिस सचिव अवधूतिका आनंद कृष्णा आचार्या ने बताया की कीर्तन करने से मानव मात्र का ही नहीं वरन चर-अचर, जीव-जंतु इत्यादि सभी का सर्वात्मक कल्याण होता है. यदि पूरे मनोयोग से ललित-मार्मिक मुद्रा में कीर्तन का गायन किया जाय तो कीर्तन की सिद्धि संभव है और उस अवस्था में भक्तगण ओंकार ध्वनि का श्रवण भी कर सकते हैं. कीर्तन दिवस समारोह की श्रृंखला के अंतिम दिवस गुरुवार 8 अक्टूबर को मेवाड़ी समाज के सभी भक्तगणों के अतिरिक्त समाज के अन्य लोगों ने भी अनवरत कीर्तन से उत्पन्न धनात्मक माइक्रोवाइटा से परिपूर्ण सकारात्मक हरिपरिमण्डल का आंनद उठाया. इसके साथ ही भींडर और कानोड़ यूनिट्स में भी कीर्तन दिवस पर एक प्रहरीय अखंड कीर्तन का आयोजन किया गया. तत्पश्चात सभी साधकों ने मिलित ईश्वर प्रणिधान, वर्णाध्यान, और स्वाध्याय किया. इसके साथ ही सभी ने कीर्तन के भक्ति प्रवाह को जन-जन तक पहुँचाने का संकल्प लिया.