उदयपुर। जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ डीम्ड टू यूनिवर्सिटी में पूर्व कुलपति के लंबे कार्यकाल और विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। कुलपति के रूप में करीब 14 वर्षों तक कार्यकाल रहने को लेकर शिक्षाविद् एवं राजस्थान विद्यापीठ से जुड़े रहे हेमेंद्र चंडालिया ने इसे यूजीसी के नियमों के संदर्भ में गंभीर विषय बताया है।
एक साक्षात्कार में चंडालिया ने कहा कि किसी व्यक्ति का एक ही विश्वविद्यालय में दो कार्यकाल से अधिक रहना यूजीसी के नियमों के अनुरूप नहीं है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में सामने आई कथित अनियमितताओं को केवल किसी एक व्यक्ति के कार्यकाल तक सीमित करके देखने के बजाय संस्थागत व्यवस्था की गहराई से समीक्षा की आवश्यकता है।
‘विद्यापीठ की मूल पहचान कमजोर हुई’
चंडालिया के अनुसार राजस्थान विद्यापीठ की स्थापना शिक्षा को समाज के वंचित और श्रमजीवी वर्ग तक पहुंचाने के उद्देश्य से हुई थी। श्रमजीवी महाविद्यालय से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में प्रौढ़ शिक्षा और साहित्य एवं संस्कृति के संरक्षण तक विद्यापीठ ने लंबे समय तक अपनी अलग पहचान बनाई।
उन्होंने कहा कि विद्यापीठ की एक बड़ी विशेषता उसका लोकतांत्रिक और सहभागी प्रशासनिक ढांचा था, जिसमें स्टाफ काउंसिल, विभिन्न इकाइयों और प्रतिनिधि संस्थाओं के माध्यम से निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी होती थी।
उनका आरोप है कि समय के साथ इस व्यवस्था में बदलाव आया और विद्या प्रशासन तथा सामाजिक प्रशासन जैसी व्यवस्थाएं कमजोर या समाप्त हो गईं, जबकि प्रबंध प्रशासन का प्रभाव बढ़ गया।
पारदर्शिता खत्म होने पर बढ़ती हैं अनियमितताएं
चंडालिया ने कहा कि किसी भी संस्था में भ्रष्टाचार या कुप्रबंधन को केवल व्यक्तियों के स्तर पर नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार जब पारदर्शिता कम होती है, लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर होती हैं और निर्णय लेने की शक्ति एक व्यक्ति या सीमित व्यवस्था में केंद्रित हो जाती है, तब अनियमितताओं की संभावना बढ़ती है।
उन्होंने विश्वविद्यालय में प्रशासनिक शक्तियों के विकेंद्रीकरण की जरूरत बताते हुए कहा कि अलग-अलग संस्थानों के प्रमुखों को आवश्यक वित्तीय अधिकार मिलने चाहिए और हर निर्णय के लिए केवल कुलपति पर निर्भरता नहीं होनी चाहिए।
स्वतंत्र जांच समिति की मांग
विश्वविद्यालय की पिछली कार्यप्रणाली और कथित अनियमितताओं की जांच को लेकर चंडालिया ने स्वतंत्र तीन सदस्यीय जांच समिति गठित करने की मांग की।
उनके अनुसार कुलाधिपति के पास विश्वविद्यालय के कामकाज की जांच कराने का अधिकार है और लंबे समय की कार्यप्रणाली की स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके।
उन्होंने कहा कि जांच के बाद तथ्य स्पष्ट होंगे और “दूध का दूध और पानी का पानी” हो जाएगा।
‘सिर्फ 14 साल पर फोकस करना सही नहीं’
चंडालिया ने यह भी कहा कि विद्यापीठ के इतिहास को केवल पिछले 14 वर्षों तक सीमित करके देखना उचित नहीं होगा। उनके अनुसार संस्था की यात्रा 1937 से शुरू हुई और अनेक लोगों ने दशकों तक इसके निर्माण और विकास में योगदान दिया।
उन्होंने कहा कि वर्तमान चुनौतियों का समाधान केवल अतीत में दोष तलाशने से नहीं, बल्कि संस्था की मूल लोकतांत्रिक और सहभागी व्यवस्थाओं को समझकर उन्हें मजबूत करने से होगा।
नए नेतृत्व के सामने बड़ी चुनौती
साक्षात्कार में विश्वविद्यालय के वर्तमान नेतृत्व के सामने भी बड़ी जिम्मेदारी की बात सामने आई। चंडालिया का मानना है कि यदि संस्थागत व्यवस्थाओं को मजबूत और विकेंद्रीकृत नहीं किया गया तो भविष्य में भी पुराने संकट दोहराए जा सकते हैं।
उन्होंने उम्मीद जताई कि विश्वविद्यालय की मूल संरचना, पारदर्शिता, सहभागिता और प्रशासनिक संतुलन को पुनर्जीवित करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे।
अब व्यापक ऑडिट की मांग
कार्यक्रम में इस बात पर भी चर्चा हुई कि विश्वविद्यालय की वर्तमान स्थिति को समझने के लिए व्यापक (Comprehensive) Audit की जरूरत हो सकती है। ऐसी समीक्षा से वित्तीय, प्रशासनिक और संस्थागत स्तर पर सामने आई कमियों की पहचान कर भविष्य के लिए बेहतर व्यवस्था तैयार की जा सकती है।
जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ का गौरवशाली इतिहास, वर्तमान विवाद और भविष्य की प्रशासनिक दिशा—अब इन तीनों को साथ रखकर देखने की जरूरत है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि अतीत में क्या हुआ, बल्कि यह भी है कि भविष्य में ऐसी परिस्थितियां दोबारा न बनें, इसके लिए क्या बदला जाएगा।
