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जनगणना में अजजा के कॉलम में उन्हीं व्यक्तियों को दर्ज करें जो मूल अस्मिता-आस्था, संस्कृति और रूढी-परंपराओं से जीवन जी रहे : सांसद डॉ रावत

-सांसद ने नियम 377 के अधीन संसद में रखा मामला

मुख्य बिंदु
  • सांसद डॉ मन्नालाल रावत ने सोमवार को संसद में नियम 377 के अधीन मामला रखते हुए वर्ष 2026-27 की जनगणना में अनुसूचित जनजाति के कॉलम में केवल उन्हीं व्यक्तियों को दर्ज करने का आग्रह किया जो अपनी मूल अस्मिता-आस्था, संस्कृति और रूढी-परंपराओं के अनुसार जीवन जी रहे हैं।
  • सांसद डॉ रावत ने इस विषय पर कहा कि किसी समाज के विकास के लिए अस्मिता मूलाधार है।
  • जब अस्मिता पर प्रश्न खड़ा होता है, तब संवैधानिक रूप से सुपात्र सदस्यों की सही पहचान नहीं हो पाती है।
  • इस दिग्भ्रमित स्थिति में विकास की प्रक्रिया प्रभावित होती है।
  • ऐसी प्रवृत्ति जनजाति समाज के संदर्भ में सटीक है।
  • संसद द्वारा वर्ष 1955 में पारित द प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स एक्ट की धारा 3 के अनुसार आदिवासी हिंदू हैं, किंतु विवाह एवं उत्तराधिकार संबंधी विधानों की अस्पष्टता तथा न्यायालयों के विभिन्न निर्णयों ने भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर दी है।
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जनगणना में अजजा के कॉलम में उन्हीं व्यक्तियों को दर्ज करें जो मूल अस्मिता-आस्था, संस्कृति और रूढी-परंपराओं से जीवन जी रहे : सांसद डॉ रावत

उदयपुर। सांसद डॉ मन्नालाल रावत ने सोमवार को संसद में नियम 377 के अधीन मामला रखते हुए वर्ष 2026-27 की जनगणना में अनुसूचित जनजाति के कॉलम में केवल उन्हीं व्यक्तियों को दर्ज करने का आग्रह किया जो अपनी मूल अस्मिता-आस्था, संस्कृति और रूढी-परंपराओं के अनुसार जीवन जी रहे हैं।

सांसद डॉ रावत ने इस विषय पर कहा कि किसी समाज के विकास के लिए अस्मिता मूलाधार है। जब अस्मिता पर प्रश्न खड़ा होता है, तब संवैधानिक रूप से सुपात्र सदस्यों की सही पहचान नहीं हो पाती है।

इस दिग्भ्रमित स्थिति में विकास की प्रक्रिया प्रभावित होती है। ऐसी प्रवृत्ति जनजाति समाज के संदर्भ में सटीक है।

संसद द्वारा वर्ष 1955 में पारित द प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स एक्ट की धारा 3 के अनुसार आदिवासी हिंदू हैं, किंतु विवाह एवं उत्तराधिकार संबंधी विधानों की अस्पष्टता तथा न्यायालयों के विभिन्न निर्णयों ने भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर दी है।

ऐसे में द कैथोलिक चर्च ऑफ रांची के आदिवासी धर्मकोड की मांग पर झारखंड विधानसभा के एक संकल्प ने एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है।

सांसद डॉ रावत ने आग्रह किया कि वर्ष 2026-27 की जनगणना में अनुसूचित जनजाति के कॉलम में केवल उन्हीं व्यक्तियों को दर्ज करें जो अपनी मूल अस्मिता-आस्था, संस्कृति और रूढी-परंपराओं के अनुसार जीवन जी रहे हैं।

सांसद डॉ रावत ने कहा कि इसके साथ ही स्वतंत्रता उपरांत प्रथम जनगणना, 1951 में दर्ज पारिवारिक अभिलेखों को आधार मानकर ही एसटी की पात्रता मानी जाए।

एक भारत श्रेष्ठ भारत के साथ ही देश की 720 जनजाति समुदायों के विकसित भारत में यथोचित विकास के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव होगा।