“इंडियन केमिस्ट्री के पिता” के नाम से मशहूर,आचार्य प्रफुल्ल चंद्र रे विज्ञान और स्वराज के विग्रह और बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी एक जाने-माने भारतीय वैज्ञानिक और शिक्षक थे और पहले “मॉडर्न” इंडियन केमिकल रिसर्चर में से एक और रसायनके पहले प्रोफेसर थे।
उन्होंने 1896 में स्टेबल कंपाउंड मरक्यूरस नाइट्राइट की खोज की और 1901 में कलकत्ता में भारत की पहली फार्मास्युटिकल कंपनी बंगाल केमिकल एंड फार्मास्युटिकल वर्क्स लिमिटेड की शुरूआत की। और इसके जनक बन भारत को औषधियों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की नींव रखी।
वे एक बहुत ही जोशीले और समर्पित सोशल वर्कर भी थे, उन्होंने जाति व्यवस्था का कभी सपोर्ट नहीं किया।
शुरुआती जीवन और शिक्षा: प्रफुल्ल चंद्र रे का जन्म 2 अगस्त 1861 को हुआ था, वे दो भाइयों में छोटे थे, रारुली-कटीपारा गांव बंगाल रेसीडेंसी में, जो अब जिला खुलना बांग्लादेश में है। उनके पिता, हरीश चंद्र रे एक ज़मींदार थे जिन्हें सीखना बहुत पसंद था और उन्होंने अपने घर में एक बड़ी लाइब्रेरी बनवाई थी। प्रफुल्ल की माँ, भुबनमोहिनी देवी पढ़ी-लिखी थीं और लिबरल विचारों वाली थीं।
जब प्रफुल्ल नौ साल के थे, तब परिवार कोलकाता चला गया और उन्होंने हेयर स्कूल में पढ़ाई की। बदकिस्मती से, प्रफुल्ल बीमार पड़ गए और 1874 में अपने गांव लौट आए।
प्रफुल्ल को ठीक होने में दो साल लगे और वे पाचन की दिक्कतों और नींद न आने की समस्या से हमेशा के लिए कमज़ोर हो गए। ठीक होने के दौरान उन्हें अपने पिता की अच्छी तरह से तैयार लाइब्रेरी में पढ़ने में मज़ा आता था।
उस समय का सदुपयोग करते हुए बिस्तर पर खूब पढ़ाई की, उन्होंने प्रसिद्ध वैज्ञानिकों जैसे न्यूटन, गैलीलीयो आदि की जीवनीओं को पढ़ लिया साथ ही फ्रेंच,जर्मन, लेटिन, ग्रीक, संस्कृत पर भी अधिकार कर लिया।
कहते है कि 'होनहार बिरवान के होते हैं चिकने पात' जिसे इन्होंने चरितार्थ किया।
वे कोलकाता लौट आए और अल्बर्ट स्कूल में पढ़े और 1879 में एंट्रेंस एग्ज़ाम पास करने के बाद, मेट्रोपॉलिटन कॉलेज (अब विद्यासागर कॉलेज) में पढ़ाई शुरू की। प्रफुल्ल ने प्रेसीडेंसी कॉलेज में केमिस्ट्री भी पढ़ी और यह जल्द ही उनका पसंदीदा सब्जेक्ट बन गया; उन्होंने घर पर एक लैब बनाई और एक्सपेरिमेंट करना शुरू कर दिया।
1882 में, प्रफुल्ल ने बहुत ही मुश्किल परीक्षा पास कर स्कॉटलैंड UK की एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी में स्कॉलरशिप प्राप्त की और उन्होंने 1885 में वहीं से डिग्री हासिल की। रिसर्च करने के लिए एडिनबर्ग में रहकर, उन्हें 1887 में डॉक्टर ऑफ साइंस (D.Sc.) और “कॉपर-मैग्नीशियम ग्रुप के कॉन्जुगेटेड सल्फेट्स: आइसोमॉर्फस मिक्सचर और मॉलिक्यूलर कॉम्बिनेशन का एक अध्ययन” पर उनकी थीसिस के लिए “होप प्राइज़” से सम्मानित किया गया।
योगदान और उपलब्धियां:: प्रफुल्ल रे 1888 में कलकत्ता लौट आए और 1889 में कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में केमिस्ट्री के 250 रुपये मासिक पर असिस्टेंट प्रोफेसर बन गए। उन्होंने एक रिसर्च लैब बनाई और धीरे-धीरे ऐसे समर्पित छात्रों का एक समुह बनाया जो उनके साथ शोध करते थे।
उन्होंने अपनी ज़िंदगी में लगभग 150 रिसर्च पेपर पब्लिश किए। साइंस पर उनके कई लेख उस समय के जाने-माने जर्नल्स में पब्लिश हुए। उनकी रिसर्च में 1896 में नाइट्राइट और हाइपोनाइट्राइट कंपाउंड्स और उनके कंपाउंड्स की शोध करते हुए स्टेबल कंपाउंड मरक्यूरस नाइट्राइट की खोज शामिल थी। उनकी इन खोजों पर प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रोफेसर आर्मस्ट्रांग ने उन्हें मास्टर ऑफ नाइट्राइट और हाइपोनाइट्राइट कहा था।
उन्होंने सल्फर, डबल सॉल्ट, होमोमोर्फिज्म और फ्लोरिनेशन वाले ऑर्गेनिक कंपाउंड्स पर भी रिसर्च की। उन्होनें अल्फा -नेफथालीन, पेरा- नाइट्रोटोल्यूइन आदि की भी खोज की जो आज भी कई रासायनिक क्रियाओं में काम आते हैं।
1892 में 700 रुपयों की छोटी सी शुरुआती धनराशि के साथ, अपने घर में उन्होंने बंगाल केमिकल वर्क्स शुरू किया। यह उनके मैनेजमेंट में खूब फली-फूली। कंपनी ने शुरू में हर्बल प्रोडक्ट्स और देसी दवाएं बनाईं। 1901 में यह एंटरप्राइज एक लिमिटेड कंपनी, बंगाल केमिकल एंड फार्मास्युटिकल वर्क्स लिमिटेड (BCPW) और भारत की पहली फार्मास्युटिकल कंपनी बन गई। धीरे-धीरे, कंपनी बढ़ी और केमिकल और दवा बनाने वाली एक जानी-मानी कंपनी बन गई।
ये कंपनी मलेरिया की दवा हाइड्रोक्सी क्लोरोक्विन बनाने के लिये प्रसिद्ध हैं।
प्रफुल्ल रे को पुरानी किताबों में दिलचस्पी थी और बहुत रिसर्च के बाद उन्होंने 1902 और 1908 में दो वॉल्यूम में “द हिस्ट्री ऑफ़ हिंदू केमिस्ट्री” पब्लिश की। इस काम में पुराने भारत में मेटलर्जी और दवा के बारे में बहुत ज़्यादा जानकारी दी गई थी। उन्होंने रसायन के अलावा पेड़ पौधों के बारे में भी बहुत शोध किये और प्रति वर्ष भारत के श्रेष्ठ रसायनज्ञ और जीव वैज्ञानिकों को पुरस्कार प्रदान करते थे।
1916 में प्रफुल्ल रे प्रेसिडेंट कॉलेज से रिटायर हुए और कलकत्ता यूनिवर्सिटी जॉइन कर ली, जहाँ उन्होंने 20 साल से ज़्यादा निःशुल्क काम किया। वहां पर ही वे एक छोटे से कमरे में रहते थे जहाँ टेबल कुर्सी और बिस्तर लगा था जो किताबों से भरा हुआ था।
वो कहते थे कि बदलती हुई दुनिया में हिन्दुस्तान को भी बदलना होगा, अगर हम तेजी से नहीं बदलेंगे तो पिछे रह जाएंगे। हमें तेजी से बदलना है और विज्ञान को बढ़ावा देना है हमें कड़ी मेहनत से भारत को आत्मनिर्भर और विकसित बनाना है।
उनका मानना था कि असली संपत्ति जमीन नहीं ज्ञान है।
उन्होंने इंटरनेशनल सेमिनार और कांग्रेस में कई इंडियन यूनिवर्सिटी को रिप्रेजेंट किया। उन्हें 1920 में इंडियन साइंस कांग्रेस का प्रेसिडेंट चुना गया।
उनकी ऑटोबायोग्राफी “लाइफ एंड एक्सपीरियंसेज़ ऑफ़ ए बंगाली केमिस्ट”, जो 1932 और 1935 में दो वॉल्यूम में पब्लिश हुई, एक वैज्ञानिक के तौर पर उनके अपने मोटिवेशन और उनके जीवनकाल में भारत में हो रहे बड़े बदलावों को डॉक्यूमेंट करती है।
प्रफुल्ल रे साइंस के चमत्कारों का इस्तेमाल आम लोगों को ऊपर उठाने के लिए करना चाहते थे।
वह एक बहुत ही पैशनेट और डेडिकेटेड सोशल वर्कर थे और उन्होंने 1920 के दशक की शुरुआत में बंगाल में अकाल और बाढ़ से परेशान लोगों की मदद करने में जोश और सक्रियता के साथ हिस्सा लिया और बाढ़ग्रस्त लोगों के लिए 3 लाख रुपये इकठ्ठे किए जो अपने आप में उस वक्त चमत्कार से कम नहीं था।
उन्होंने खादी को बढावा दिया और बंगाल इनेमल वर्क्स, नेशनल टेनरी वर्क्स और कलकत्ता पॉटरी वर्क्स जैसी 37 कई दूसरी इंडस्ट्री भी शुरू कीं। वह एक सच्चे रैशनलिस्ट थे और वह कास्ट सिस्टम और दूसरे इर्रेशनल सोशल सिस्टम के पूरी तरह खिलाफ थे।
उन्होंने सोशल रिफॉर्मेशन का यह काम अपनी मौत तक लगातार जारी रखा।
ब्रिटिश शासन ने इन्हें CIE और नाइट (सर) की उपाधि से भी नवाजा था पर स्वतंत्रता आंदोलन में उन्होंने सर की उपाधि त्याग दी थी। क्रांतिकारी भी उनके पास सीखने आते थे।
जीवन भर कुंवारे रहने के बाद, प्रफुल्ल रे 1936 में 75 साल की उम्र में प्रोफेसर एमेरिटस बनकर रिटायर हुए। 16 जून 1944 को 82 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।
उनके प्रमुख शिष्य सत्येंद्र नाथ बोस, मेघनाथ साहा और सुभाष चंद्र बोस थे। उनके गुरु सुरेंद्र नाथ बैनर्जी थे।
ये आत्मनिर्भर भारत के अग्रदूत थे। सादा जीवन उच्च विचार को मानते थे।
गांधी जी इनकी सादगी और शुद्ध भारतीय पहनावे से बहुत प्रभावित हुए और जब यह जाना कि रे अपनी 800 रुपये की मासिक वेतन में से अपने ऊपर सिर्फ 40 रुपये खर्च करते है बाकी विद्यार्थियों, गरीबों और विज्ञान के विकास के लिए खर्च कर देते हैं तो नतमस्तक हो गए।
उन्होंने अपनी सारी आमदनी भारत में रसायन और प्रौद्योगिकी के विकास के लिए समर्पित कर दिये और विज्ञानमय भारत बनाने में योगदान दिया। आज भी उनकी याद में प्रेसीडेंसी कॉलेज में एक कमरा समर्पित किया हुआ है जहाँ वह रहकर शोध कार्य करते रहे।
वे चाहते तो आरामदायक जीवन शैली अपना सकते थे लेकिन उन्होंने मितव्ययी और सादी शैली अपनायी, अतुलनीय धन होते हुए भी और विदेश में रहते हुए भी जल में कमलवत हृदय से शुद्ध भारतीय बने रहे।
उनका मानना था कि "सर्वतो जयमिच्छेत पुत्राच्छिष्यात्पराजयम्।" (सब जगह विजय की इच्छा रखनी चाहिए, किंतु पुत्र और शिष्य से हार की कामना करनी चाहिए)।
आचार्य रे भारतीयों के लिए सदैव वंदनीय रहेंगे।
