उदयपुर : 60 वें विश्व शिक्षक दिवस के अवसर पर शान्तिपीठ द्वारा एक परिचर्चा आयोजित की गई जिसमें विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोगों ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान शताब्दी को उल्लास की शताब्दी बनानीं है तो शिक्षकों को नि: संकोच आगे आना चाहिए और समाज की उनसे अपेक्षाओं को पूरा करने बीड़ा उठाना चाहिए।
राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शिक्षक डा. श्रीकृष्ण जुगनू ने कहा कि शिक्षक ऐसा कुछ कर जाए कि शताब्दियां पढ़ें और कईं पीढ़ियां आगे बढ़ें। उन्होंने कहा कि जीवन एक लेकिन आयाम अनेकों हों, हर आयाम सबके लिए प्रेरक और अनुसरणीय हो। शिक्षक शिक्षण और प्रशिक्षण को सदा प्रासंगिक बनाए रखने के लिए समकालीन स्थितियों पर दृष्टि रखना आवश्यक समझे,और ऐसी पहल सबको करनी चाहिए।
पूर्व नगर निगम आयुक्त दिनेश कोठारी ने कहा कि यूएन द्वारा स्थापित यह दिवस केवल शिक्षकों के लिए ही नहीं बल्कि उनके साथ हम सबको खड़े होना चाहिए,यह भी विश्व संगठन ने उम्मीद जताई है। उन्होंने कहा कि कोई शासन रहा हो, राजा ने गुरू की वंदना ही की है।
पूर्व आईएएस सुमति लाल बोहरा ने रेखांकित किया कि गुरु के मार्ग दर्शन में ही हम अपने जीवन का निर्माण करते हैं। पारिवारिक जीवन में भी गुरु को आमंत्रित करना आवश्यक माना जाता है।
डा कमल सिंह राठौड़ ने कहा कि शिक्षक पाठ्यक्रम पढ़ाने तक ही सीमित नहीं होते वे हमारा भविष्य गढ़ते हैं।आज इस एआई और डिजिटल युग में शिक्षक की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो चुकी है।
शान्तिपीठ संस्थापक अनन्त गणेश त्रिवेदी ने 'स्वदेशे पुज्यते राजा विद्वान सर्वत्र पुज्यते' का संदर्भ देते हुए कहा कि शिक्षक को स्वतंत्र चेता के रुप में अपनी भूमिका निभानी चाहिए, किसी भी दबाव में नहीं ।
उन्होंने कहा कि समाज का इको सिस्टम हमेशा परिवर्तनशील है किन्तु जो इसे निरंतर सकारात्मक दिशा दे सके वहां प्राथमिक भूमिका शिक्षक की है। दुनियां की सकारात्मक शक्तियों को एकजुट करते हुए आशावादी माहौल बनाने शिक्षकों को साहसी हो कर आगे आना चाहिए।
