जैसलमेर । जिला एवं सेशन न्यायाधीश एवं अध्यक्ष, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण ओमी पुरोहित के निर्देशन में लाणेला गांव में ‘’दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 के विधिक प्रावधान’’ विषय पर सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण श्री ललित पुरोहित द्वारा विधिक जागरूकता षिविर का आयोजन किया गया।
शिविर का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को दहेज प्रतिषेध अधिनियम के विधिक प्रावधानों के बारे में बताते हुए अवगत कराया कि दहेज का अर्थ किसी भी सम्पत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से देना या दिये जाने के लिए सहमत होना दहेज के दायरे में आता है।
उन्होंने बताया कि दहेज प्रथा भारतीय समाज की एक गंभीर समाजिक बुराई रही है। दहेज के कारण अनेक महिलाओं को मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है।
कई बार दहेज की मांग पूरी न होने पर महिलाओं के साथ हिंसा, उत्पीड़न तथा मृत्यु जैसी घटनाएं भी घटित होती हैं। इसी सामाजिक बुराई को समाप्त करने के लिए भारत सरकार ने दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 लागू किया है।
इस कानून का मुख्य उद्देष्य विवाह के समय दहेज लेने और देने और उसकी मांग पर रोक लगाना तथा महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करना है।
शिविर में भारतीय न्याय संहिता में दहेज मृत्यु व कू्ररता के सम्बंध में प्रावधान, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण, लैंगिक हिंसा से संरक्षण के साथ रालसा की जागृति स्कीम के तहत सषक्त युवा - सषक्त भारत के अनुसरण में बालिकाओं को सषक्त बनाने व अत्याचार के विरूद्ध आवाज उठाने की बात कही।
उन्होंने बताया कि कोई भी व्यक्ति दहेज लेना - देना या लेन देन के लिए दुष्प्रेरित करने वाला इस अधिनियम के तहत अपराधी होगा, ऐसे व्यक्तियों को कारावास की सजा दी जाएगी जिसकी अवधि 5 वर्ष से कम नहीं होगी, और जुमाने से जो 15000 रूपये से या ऐसे दहेज मूल्य की रकम तक का, इनमें से जो भी अधिक हो, कम नहीं होगा से दंडनीय होगा।
इस अधिनियम के तहत अपराध अजमानतीय और अषमनीय है। कार्यक्रम के दौरान मुफ्त कानूनी सहायता, नालसा की विभिन्न योजनाओं पर भी विस्तृत जानकारी दी गई।
