राजस्थान के नगरीय निकाय चुनावों में शुक्रवार को सामने आए परिणामों ने प्रदेश के तीन बड़े नगर निगमों राजधानी जयपुर, प्रदेश के दूसरे बड़े नगर जोधपुर और शिक्षा नगरी कोटा में भारतीय जनता पार्टी को महापौर पद दिलाकर शहरों की नई राजनीतिक तस्वीर साफ कर दी।
इसी के साथ कोटा जिले की नवगठित सुकेत नगरपालिका में भी भाजपा ने अध्यक्ष पद पर कब्जा किया है, हालांकि वहां जीत का अंतर महज एक वोट रहा।
इन चारों परिणामों में एक तरफ पार्टी के संगठनात्मक संख्याबल की भूमिका दिखाई दी, तो दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर पार्षदों के समीकरण और क्रॉस वोटिंग की अहमियत भी सामने आई।
जयपुर नगर निगम में भाजपा के सुनील कोठारी ने कांग्रेस की सुनीता मावर को 89-60 मतों से हराया। 150 सदस्यीय सदन में भाजपा के 78 पार्षद थे, जबकि कांग्रेस के 57 और निर्दलीयों के 15 पार्षद थे। कोठारी को मिले 89 मतों से यह स्पष्ट हुआ कि भाजपा के मूल संख्या बल के अतिरिक्त उन्हें निर्दलीय पार्षदों का भी समर्थन मिला।
कोटा में मुकाबला और अधिक राजनीतिक संदेश वाला रहा। 100 सदस्यीय निगम में भाजपा के 57, कांग्रेस के 39 और चार निर्दलीय पार्षद थे। भाजपा की अनुसुइया गोस्वामी को 65 और कांग्रेस की सुनीता सुमन को 35 मत मिले। यानी भाजपा के घोषित संख्या बल से भी आठ अधिक मत गोस्वामी के पक्ष में गए जबकि कांग्रेस के उम्मीदवार को पार्टी के संख्या बल से चार वोट कम मिले को। इससे स्थानीय स्तर पर क्रॉस वोटिंग और दलगत अनुशासन का मुद्दा प्रमुख हो गया।
जोधपुर में तस्वीर सबसे ज्यादा दिलचस्प रही। पुनर्मतदान के बाद भाजपा के 45 और कांग्रेस के 44 पार्षद थे, जबकि 10 निर्दलीय तथा एक आरएलपी पार्षद भी सदन में थे।
बहुमत का आंकड़ा 51 था। भाजपा ने निर्दलीयों के समर्थन का दावा किया था।
मतदान में भाजपा के प्रसन्नचंद मेहता को 53 और कांग्रेस के राजेंद्र सोलंकी को 47 वोट मिले। इस तरह छह मतों के अंतर से भाजपा ने महापौर पद हासिल किया।
कुल मिला कर भाजपा और कांग्रेस को अपने संख्या बल से अधिक वोट मिले।
इधर सुकेत नगरपालिका का परिणाम इन तीन बड़े निगमों से एक अलग संदेश देने वाला रहा है। 25 सदस्यीय नवगठित नगरपालिका में भाजपा के जितेंद्र चोपड़ा ने कांग्रेस के उमरदीन खान को 13- के मुकाबले 12 मतों से यानी एक वोट के अन्तर से हराया। यहां बहुमत के लिए 13 वोट जरूरी थे। महज एक वोट के अंतर का यह परिणाम बताता है कि छोटे निकायों में एक-एक पार्षद का रुख किस तरह सत्ता का फैसला कर सकता है।
वैसे इन चुनाव परिणामों को केवल पार्टी की जीत-हार के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। हालिया निकाय चुनावों में भाजपा को 10,244 वार्डों में 4,179 सीटें मिली थीं, जबकि कांग्रेस को 3,613 और निर्दलीयों को 2,273 सीटें मिली थीं।
इससे स्पष्ट था कि कई निकायों में बोर्ड गठन का अंतिम गणित केवल भाजपा-कांग्रेस के घोषित आंकड़ों से तय नहीं होना था। अब चुनौती चुनाव जीतने के बाद शुरू होती है।
जयपुर, जोधपुर और कोटा जैसे बड़े शहरों में यातायात, सफाई, पेयजल, सीवरेज, सड़क, आवारा पशु, कचरा प्रबंधन और शहरी विस्तार जैसी समस्याएं नई नगर सरकारों की प्राथमिक परीक्षा होंगी।
राजनीतिक बहुमत को प्रशासनिक परिणामों में बदलना इन महापौरों के सामने अगला महत्वपूर्ण चरण होगा। कुल मिलाकर 25 सितंबर के परिणामों ने राजस्थान के प्रमुख शहरी केंद्रों में भाजपा की मजबूत स्थिति को सामने रखा है, जबकि सुकेत का एक वोट वाला मुकाबला यह याद दिलाता है कि स्थानीय राजनीति में अंतिम फैसला कई बार बड़े राजनीतिक दावों से नहीं, बल्कि बेहद छोटे और स्थानीय समीकरणों से होता है।