उदयपुर। वासुपूज्य मंदिर दादाबाड़ी में शनिवार को आयोजित नियमित प्रवचन में साध्वी विद्युतप्रभा श्रीजी आदि ठाणा-6 ने श्रावक-श्राविकाओं को संबोधित करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति के पर्वों का वास्तविक उद्देश्य आत्मकल्याण और आत्मजागृति है।
व्यवहार की दृष्टि से हम धनतेरस मनाते हैं, लेकिन अध्यात्म की दृष्टि से यह ‘धन्य तेरस’ है। धन-संपत्ति से नहीं, बल्कि आत्मबोध और श्रेष्ठ आचरण से मनुष्य का जीवन धन्य बनता है।उन्होंने कहा कि सभी को धन की चाह है, इसलिए तेरस को धनतेरस कहा जाने लगा।
इसी प्रकार रूप चौदस भी वास्तव में ‘स्वरूप चौदस’ है। मनुष्य बाहरी रूप-सौंदर्य के पीछे भागता है, जबकि उसे अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने का प्रयास करना चाहिए।
प्रत्येक व्यक्ति को अपने आचरण और क्रियाओं का आत्मनिरीक्षण करना चाहिए कि उसने ऐसा कौन-सा कार्य किया है, जिससे उसका जीवन सार्थक और धन्य बन सके।
जिसने अपनी आत्मा का बोध कर लिया, उसका जीवन वास्तव में धन्य हो गया।साध्वीश्री ने भगवान महावीर के निर्वाण दिवस का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान महावीर अंतिम समय तक अपनी देशना देते रहे।
अन्य तीर्थंकरों ने अंतिम समय में मौन धारण किया, लेकिन महावीर प्रभु ने अंतिम क्षण तक धर्म का संदेश दिया। उनके निर्वाण का समय निकट आने पर लोगों में उनकी वाणी सुनने की उत्सुकता बढ़ गई थी।
अनेक लोगों ने मासक्षमण की साधना की। भगवान महावीर ने आने वाले समय की कठिनाइयों को पहले ही भांप लिया था।
इसी कारण वे अंतिम समय तक जीवों के कल्याण के लिए देशना देते रहे।उन्होंने भगवान महावीर के जीवन के विभिन्न कल्याणकों की विशेष परिस्थितियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनके जीवन में च्यवन, जन्म, दीक्षा, देशना और निर्वाण जैसे महत्वपूर्ण प्रसंग भी विशिष्ट परिस्थितियों से जुड़े रहे।
भगवान महावीर के जन्म के समय इंद्र महाराज के मन में भी शंका उत्पन्न हुई। उनके साथ किसी ने दीक्षा ग्रहण नहीं की, जबकि अन्य तीर्थंकरों के समय किसी न किसी ने दीक्षा ली थी।
किसी तीर्थंकर की देशना खाली नहीं गई, लेकिन महावीर प्रभु की देशना भी कई बार खाली गई।
निर्वाण कल्याणक के समय भस्म ग्रह का प्रभाव रहा और निर्वाण के बाद लगभग 2500 वर्षों तक उनकी महिमा अपेक्षित रूप से नहीं बढ़ पाई।साध्वीश्री ने कहा कि भगवान महावीर के जीवन और उनकी देशना का गहराई से विश्लेषण करने की आवश्यकता है।
उनके संदेशों को आत्मसात कर जीवन में संयम, आत्मनिरीक्षण और आध्यात्मिक जागृति लाना ही सच्ची आराधना है। इस अवसर पर साध्वी प्रज्ञानजना श्रीजी, साध्वी नमन रुचि श्रीजी, साध्वी योगरुचि श्रीजी एवं साध्वी तन्मय रुचि श्रीजी ने भक्ति गीत प्रस्तुत किया।