उदयपुर। गणपति उत्सव आस्था और भक्ति का पर्व है, लेकिन जब यही आस्था प्रकृति के संरक्षण का संदेश देने लगे तो उसका महत्व और भी बढ़ जाता है। उदयपुर के संस्कृति कर्मी और हरियाली प्रेमी विलास जानवे पिछले दस वर्षों से गणेश उत्सव के दौरान पर्यावरण संरक्षण की ऐसी ही अनूठी परंपरा निभा रहे हैं।
जानवे के घर हर वर्ष माटी के गणेश बनाए जाते हैं। विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद इन गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन किसी झील या जलाशय में करने के बजाय घर पर ही बाल्टी में किया जाता है। प्रतिमा के घुलने के बाद बाल्टी में बची माटी मिश्रित पानी को आसपास लगे पेड़-पौधों में डाल दिया जाता है।
इस तरह जिस माटी से भगवान गणेश का स्वरूप तैयार होता है, वही माटी विसर्जन के बाद प्रकृति में लौटकर पेड़-पौधों के लिए उपयोगी बन जाती है। जानवे की यह पहल आस्था के साथ पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का भी संदेश देती है।
विलास जानवे का मानना है कि परंपराओं को प्रकृति के अनुकूल बनाकर भी श्रद्धा और भक्ति को पूरी तरह निभाया जा सकता है। उनका कहना है कि घर पर माटी के गणेश बनाकर बाल्टी में विसर्जन करना एक सरल और पर्यावरण हितैषी तरीका है, जिसे हर परिवार अपनी सुविधा के अनुसार अपना सकता है।
उनकी दस वर्षों से चली आ रही यह परंपरा एक खूबसूरत संदेश देती है—गणपति का विसर्जन हो, लेकिन प्रकृति का संरक्षण भी साथ हो।
इस भाव को इन पंक्तियों में यूं कहा जा सकता है—
बाल्टी में हुए विसर्जित, माटी के गणेश,
पर्यावरण सुरक्षा का दे गए संदेश।
माटी में घुल पेड़-पौधों पर,
फल-फूल खिलाएंगे,
सब जीवों पर कर कृपा,
जीवन सरस बनाएंगे।
विलास जानवे की अपील है कि गणेश उत्सव में माटी के गणपति अपनाएं, घर पर ही बाल्टी में विसर्जन करें और माटी मिले पानी को पेड़-पौधों में अर्पित करें। इससे आस्था भी बनी रहेगी और प्रकृति की हरियाली भी।
