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इंटरनेशनल डे ऑफ क्लिन एयर फॉर ब्लू स्काइज, 7 सितंबर की पूर्व संध्या पर संवाद

पर्यटन के एयर वॉटर इकोलॉजिकल फुटप्रिंट का आकलन जरूरी

पर्यटन के एयर वॉटर इकोलॉजिकल फुटप्रिंट का आकलन जरूरी

मुख्य बिंदु
  • उदयपुर, अंतरराष्ट्रीय नीले आकाश के लिए स्वच्छ वायु दिवस, इंटरनेशनल डे ऑफ क्लिन एयर फॉर ब्लू स्काइज ,7 सितंबर की पूर्व संध्या पर आयोजित रविवारीय झील संवाद में उदयपुर में बढ़ते पर्यटन से उत्पन्न वायु प्रदूषण और उसके झीलों तथा जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले प्रभाव पर चिंता जताई गई।
  • विद्या भवन पॉलिटेक्निक के प्राचार्य एवं झील-नदी विशेषज्ञ डॉ.
  • अनिल मेहता ने कहा कि उदयपुर के भविष्य के लिए नीला आसमान और नीली झील, दोनों बचाने होंगे।
  • पर्यटन की वृद्धि को केवल होटल, कमरों, पर्यटकों और राजस्व की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता।
  • पर्यटन का एक महत्वपूर्ण वायु-जल पारिस्थितिक पदचिह्न, एयर वॉटर इकोलॉजिकल फुटप्रिंट भी है, जिसका अब वैज्ञानिक आकलन जरूरी है।
  • मेहता ने कहा कि पर्यटक वाहनों की बढ़ती संख्या केवल यातायात की समस्या नहीं है।
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इंटरनेशनल डे ऑफ क्लिन एयर फॉर ब्लू स्काइज, 7 सितंबर की पूर्व संध्या पर संवाद
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उदयपुर, अंतरराष्ट्रीय नीले आकाश के लिए स्वच्छ वायु दिवस, इंटरनेशनल डे ऑफ क्लिन एयर फॉर ब्लू स्काइज ,7 सितंबर की पूर्व संध्या पर आयोजित रविवारीय झील संवाद में उदयपुर में बढ़ते पर्यटन से उत्पन्न वायु प्रदूषण और उसके झीलों तथा जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले प्रभाव पर चिंता जताई गई।

विद्या भवन पॉलिटेक्निक के प्राचार्य एवं झील-नदी विशेषज्ञ डॉ. अनिल मेहता ने कहा कि उदयपुर के भविष्य के लिए नीला आसमान और नीली झील, दोनों बचाने होंगे। पर्यटन की वृद्धि को केवल होटल, कमरों, पर्यटकों और राजस्व की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। पर्यटन का एक महत्वपूर्ण वायु-जल पारिस्थितिक पदचिह्न, एयर वॉटर इकोलॉजिकल फुटप्रिंट भी है, जिसका अब वैज्ञानिक आकलन जरूरी है।

मेहता ने कहा कि पर्यटक वाहनों की बढ़ती संख्या केवल यातायात की समस्या नहीं है। वाहनों से निकलने वाले सूक्ष्म कण, नाइट्रोजन ऑक्साइड तथा अन्य प्रदूषक वातावरण में फैलते हैं और झीलों में भी पंहुचते हैं। इसलिए हर पर्यटक वाहन का केवल कार्बन फुटप्रिंट नहीं, उसका वेटलैंड फुटप्रिंट भी देखना होगा।

उन्होंने कहा कि हम झील में जाने वाले सीवेज की गणना करते हैं, लेकिन झील के ऊपर और आसपास के वातावरण से आने वाले प्रदूषकों की गणना नहीं करते। अब वायु और जल प्रदूषण के आपसी संबंध को समझना होगा।

फतेहसागर, पिछोला, बड़ी, गोवर्धन सागर और उदयसागर जैसी झीलों के आसपास सड़कें, होटल, रेस्टोरेंट और अन्य पर्यटन गतिविधियां पानी के बेहद करीब हैं।

इसलिए झील के आसपास के वायुमंडलीय क्षेत्र को भी उसके पारिस्थितिक जलग्रहण क्षेत्र का हिस्सा मानकर नियम बनाने जरूरी है।

डॉ. मेहता ने कहा कि झील किनारे स्थित होटल एवं रेस्टोरेंट के रसोईघर से निकलने वाला धुआं, डीजल जनरेटर, बॉयलर, लॉन्ड्री तथा अन्य गतिविधियों से होने वाले उत्सर्जन का प्रभाव आसपास के नागरिकों और झील के पर्यावरण पर पड़ सकता है। बड़े होटल एवं पर्यटन प्रतिष्ठानों का नियमित वायु प्रदूषण ऑडिट होना चाहिए तथा उनके उत्सर्जन नियंत्रण तंत्र की निगरानी की जानी चाहिए।

उन्होंने प्रशासन और पर्यटन उद्योग से उदयपुर के लिए पर्यटन वायु-जल प्रभाव आकलन, टूरिज्म एयर वॉटर इंपैक्ट असेसमेंट तथा पर्यटन प्रदूषण नियंत्रण योजना तैयार करने की मांग की, जिसमें पर्यटक वाहनों, होटल उत्सर्जन, ऊर्जा उपयोग, कचरा, जल उपयोग और झीलों पर पड़ने वाले संयुक्त पर्यावरणीय दबाव का आकलन हो तथा आवश्यक उपाय हो।

झील विकास प्राधिकरण के पूर्व सदस्य तेज शंकर पालीवाल ने कहा कि पर्यटकों, महंगी शादियों और पार्टियों के आकर्षण के लिए झील किनारे होने वाली आतिशबाजी को केवल शोर के नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए। पटाखों से पीएम 2.5, पीएम 10 तथा विभिन्न रासायनिक और धातुयुक्त कण वातावरण में पहुंचते हैं और उनके अवशेष झीलों को खराब करते हैं।पालीवाल ने कहा कि झीलों और पक्षी आवासों के आसपास आतिशबाजी पर कठोर नियंत्रण होना चाहिए।

सामाजिक कार्यकर्ता नंद किशोर शर्मा ने कहा कि झीलें, अरावली, जंगल और स्वच्छ हवा उदयपुर के पर्यटन की जीवनरेखा हैं। यदि पर्यटन के साथ वाहन प्रदूषण, होटल उत्सर्जन, कचरा, जल खपत और झीलों पर दबाव लगातार बढ़ता गया तो पर्यटन उद्योग अंततः उसी प्राकृतिक पूंजी , क्षमता को कमजोर करेगा जिसके कारण पर्यटक उदयपुर आते हैं।

शिक्षाविद कुशल रावल ने कहा कि उदयपुर को अति पर्यटक नहीं, बेहतर और अधिक जिम्मेदार पर्यटन चाहिए। पर्यटन की सफलता केवल यह नहीं कि कितने लोग शहर में आए; सफलता यह भी है कि उनके जाने के बाद उदयपुर की हवा, पानी, झीलें, पहाड़ और पक्षी कितने स्वस्थ बने रहते है।

वरिष्ठ नागरिक द्रुपद सिंह तथा झील प्रेमी विनोद कुमावत ने कहा कि उदयपुर के प्रवासी पक्षी ही शहर के सबसे सच्चे और प्राकृतिक पर्यटक हैं। वे हजारों किलोमीटर की यात्रा कर यहां इसलिए आते हैं क्योंकि झील रूपी वेटलैंड उन्हें भोजन, विश्राम, आवास और प्रजनन का सुरक्षित वातावरण देते हैं। यदि प्रवासी पक्षियों की प्रजातियां और संख्या घटती हैं तो इसे उदयपुर के पर्यटन और पारिस्थितिकी—दोनों के लिए गंभीर चेतावनी माना जाना चाहिए।

संवाद में आशा कुंवर चौहान,ललिता बिंदराबंद ने भी विचार रखे