उदयपुर। मानव जीवन की सार्थकता केवल व्यक्तिगत उन्नति में नहीं, अपितु समाज और राष्ट्र के व्यापक हित में निहित है।
मानवता की प्रगति के लिए उत्कृष्ट समझ, पारस्परिक सहयोग, सामाजिक उत्तरदायित्व एवं नागरिक कर्तव्यों के प्रति सजगता अत्यंत आवश्यक है।
यह विचार पाणिनी आर्ष विद्याकुलम, बढ़ेड़ी, मुजफ्फरनगर के कुलपति आचार्य योगेश भारद्वाज ने श्रमजीवी महाविद्यालय के संस्कृत विभाग द्वारा आयोजित विशेष व्याख्यान सत्र में विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
आचार्य भारद्वाज ने कहा कि आज के विद्यार्थी ही देश के भावी कर्णधार हैं। उनमें ज्ञान के साथ-साथ संस्कार, नैतिक चेतना, सामाजिक संवेदनशीलता और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित होना आवश्यक है।
उन्होंने विद्यार्थियों का आह्वान करते हुए कहा कि वे अपने नागरिक कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करते हुए समाज एवं राष्ट्र के विकास में सक्रिय भागीदारी निभाएं।
शिक्षा का उद्देश्य केवल उपाधि प्राप्त करना नहीं, बल्कि जीवन को संस्कारित एवं समाजोपयोगी बनाना है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो. धीरज प्रकाश जोशी ने कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान, संस्कृति, दर्शन और जीवन-मूल्यों की समृद्ध परंपरा की संवाहक है।
वर्तमान समय में संस्कृत के अध्ययन को आधुनिक जीवन की आवश्यकताओं से जोड़ते हुए विद्यार्थियों में भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति गौरव और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि ऐसे विशेष व्याख्यान विद्यार्थियों के ज्ञान-विस्तार के साथ-साथ उनके व्यक्तित्व निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इस अवसर पर आर्य समाज हिरण मगरी के मंत्री डॉ. वेद मित्र आर्य, उपमंत्री भूपेंद्र शर्मा, महिला प्रकोष्ठ संयोजिका चंद्रकांता वैदिका, योगाचार्य जिग्नेश शर्मा, सह संयोजिका बेला सिसोदिया तथा वेदाचार्य शंकरलाल विद्यावाचस्पति द्वारा महर्षि दयानंद सरस्वती की कालजयी कृति ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की प्रति महाविद्यालय के पुस्तकालय हेतु संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो. धीरज प्रकाश जोशी को भेंट की गई।
इस अवसर पर पुस्तक के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए वक्ताओं ने कहा कि सत्यार्थ प्रकाश भारतीय समाज में वैचारिक जागरण, तर्कशीलता और सामाजिक सुधार की दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है।
कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि वानप्रस्थी मुनि नरेंद्र आर्य उपस्थित रहे। उन्होंने भारतीय संस्कृति, वैदिक चिंतन एवं नैतिक जीवन-मूल्यों की प्रासंगिकता पर अपने विचार व्यक्त किए तथा विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़कर अपने जीवन को सार्थक बनाने का संदेश दिया।
कार्यक्रम का मंच संचालन संस्कृत विभाग के डॉ. नारायण सिंह राव ने प्रभावपूर्ण एवं गरिमापूर्ण ढंग से किया। उन्होंने अतिथियों का परिचय प्रस्तुत करते हुए कार्यक्रम की विषयवस्तु पर प्रकाश डाला तथा विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति एवं संस्कृत भाषा के अध्ययन के लिए प्रेरित किया।
कार्यक्रम के अंत में संस्कृत विभाग की डॉ. कुसुम लता ने अतिथियों, वक्ताओं, महाविद्यालय प्रशासन, विभागीय सदस्यों एवं उपस्थित छात्र-छात्राओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायी व्याख्यान विद्यार्थियों को अपने शैक्षणिक जीवन के साथ-साथ सामाजिक एवं सांस्कृतिक दायित्वों के प्रति जागरूक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
विशेष व्याख्यान सत्र में संस्कृत विभाग के विद्यार्थियों सहित महाविद्यालय के अनेक छात्र-छात्राएं एवं शिक्षकगण उपस्थित रहे। कार्यक्रम का वातावरण ज्ञान, संस्कार एवं भारतीय संस्कृति के प्रति श्रद्धा से ओत-प्रोत रहा।
