उदयपुर। स्थानीय महावीर समवशरण में आयोजित भक्तामर अनुष्ठान की पूर्णता के अवसर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए डॉ. सुरेन्द्र मुनि जी ने कहा कि किसी भी व्यक्ति की पहचान उसके स्वभाव से ही होती है।
बचपन में मिले अच्छे संस्कारों से ही श्रेष्ठ स्वभाव का निर्माण होता है। एक व्यक्ति अपने मधुर व्यवहार से हजारों मित्र बना लेता है, वहीं दूसरा अपने कटु स्वभाव के कारण कई दुश्मन खड़े कर लेता है।
मधुर व सरल स्वभाव वाला व्यक्ति ही जीवन में तरक्की करता है।मुनिश्री ने कहा कि अपने स्वभाव को सुधारना या बिगाड़ना पूरी तरह हमारे हाथों में है। बात-बात पर उलझना, विवाद करना, क्रोधित होना और दूसरों का अहित सोचना जीवन के पतन का कारण बनता है।
बुरी आदतें तुरंत लग जाती हैं, लेकिन उन्हें छोड़ने में वर्षों बीत जाते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि पिता की अर्जित करोड़ों की संपत्ति को व्यसनी पुत्र कुछ ही महीनों में बर्बाद कर देता है।
इसीलिए कहावत हैकृश्जैसा अन्न वैसा मन, जैसी संगत वैसी रंगतश्। अतः हमें सदैव अपने स्वभाव और आदतों पर ध्यान देना चाहिए।सभा को संबोधित करते हुए प्रवर्तक डॉ. राजेन्द्र मुनि जी ने ‘स्वभाव’ और ‘परभाव’ की व्याख्या की।
उन्होंने कहा कि स्वभाव आत्मिक होता है और परभाव शारीरिक। हमारा अधिकांश समय परभाव में बीतने के कारण ही हमें दुखों और कष्टों का सामना करना पड़ता है।
प्रभु महावीर ने आत्मदृष्टि, आत्मभाव और आत्मज्ञान में लीन रहने का संदेश दिया है। हमें दूसरों की आलोचना करने के बजाय अपने अवगुणों को देखकर उन्हें दूर करने का प्रयास करना चाहिए।अनुष्ठान की पूर्णाहुति पर आज देवेंद्र धाम में गुरु भक्तों का उत्साह देखते ही बनता था।
प्रातः 8 बजे से ही संपूर्ण उदयपुर के उप नगरों से जनता जनार्दन भक्तामर अनुष्ठान दरबार में आना प्रारंभ हो गई।
8.30 बजे तक तो संपूर्ण भक्तामर दरबार फुल हो गया भक्तामर अनुष्ठान पूर्ण हुती पर महेन्द्र-मीना तलेसरा परिवार द्वारा लाभ लेकर सभी उपस्थित जनों को भक्तामर पट्ट भेंट किए गए एवं प्रभावना वितरित कर सम्मानित किया गया।
श्रावक संघ द्वारा सभी का आभार व्यक्त किया गया। साथ ही जानकारी दी गई कि 4 नवंबर से भगवान महावीर की अंतिम वाणी उत्तराध्ययन सूत्र की देशना प्रारंभ होगी।
